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शिशुओं से ठीक प्रकार बात करना है बेहद जरूरी

परवरिश के तरीके By Rahul Sharma , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Apr 02, 2014
शिशुओं से ठीक प्रकार बात करना है बेहद जरूरी

शोध से पता चलता है कि शिशु से बात करने के लहज़े और तरीके का सीधा-सीधा प्रभाव उसके शैक्षिक आई क्यू और उसकी शब्दावली की गुणवत्ता पर पड़ता है।

यूं तो हम किसी से भी बड़े आराम से बात कर लेते हैं, लेकिन जब हम किसी बच्चे से मुखातिब होते हैं तो उनसे बात करने के लिए उसी की भाषा चुनते हैं। हम इस बात को नहीं समझते हैं कि जो भाषा बच्चा सुनता है, उसका उसके आई क्यू और चरित्र निर्माण में बड़ा योगदान होता है। इसलिए उससे ठीक तरीके से बात करना बेहद जरूरी है। चलिए इस संदर्भ में विस्तार से बात करते हैं और कुछ शोध और अध्ययन खंगालते हैं, ताकि आप इस बात और इसकी अहमियत को बेहतर ढंग से समझ पाएं।

 

 

शिशु की ज़िंदगी में एक दौर ऐसा आता है जब उसमें कुछ बातों को फौरन सीखने और समझने की काबिलीयत पैदा होती है। मगर यह दौर कुछ समय के लिए ही होता है। मिसाल के तौर पर, नन्हा बच्चा बड़ी आसानी से एक भाषा सीख लेता है, और कभी-कभी एक-से-ज़्यादा भी। लेकिन पांच साल के होते-होते उसकी यह काबिलीयत कम होने लगती है। इस बात में उसके पालन-पोषण का वाले वर्ग का फर्क भी पड़ता है।

 

 

आखिर शिशु बोलना कैसे सीख लेता है, जो उसके दिमागी विकास के लिए बेहद जरूरी है। खासकर शिशु के माता-पिता उससे बात करते हैं तब वह बोलना सीखता है। शिशु, आम तौर पर इंसानों की बातों का जवाब देता है। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेकनॉलजी के बैरी ऐरन्स के अनुसार बच्चा अपनी मां की आवाज़ सुनकर उसकी नकल करता है। दिलचस्पी की बात यह है कि वह हर तरह की आवाज की नकल नहीं करता। वह पालने की आवाज़ की नकल नहीं करता जो वह अपनी मां की आवाज़ के साथ-साथ सुनता है।

 

Talk To Baby

 

 

बात करने का तरीका

माता-पिता चाहे किसी भी देश के हों और उनकी संस्कृति चाहे जो भी हो, जब वे अपने बच्चे से बात करते हैं तो अकसर एक सुरीले अंदाज़ में करते हैं। और उनकी प्यार-भरी बातें सुनते वक्‍त बच्चे के दिल की धड़कन तेज़ हो जाती है। माना जाता है कि इस ठीक लहज़े में बात करने से, बच्चे जल्द ही चीजें और लोगों को पहचानने लगते हैं और समझते हैं कि कौन-सा शब्द किस चीज़ के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

 

बच्चे 18 महीने का होने तक कम से कम एक दर्जन शब्द सीखते हैं। लेकिन जब वह बारह-चौदह साल का होता है, तब उसके लिए नयी भाषा सीखना बहुत मुश्किल हो जाता है। बाल-विशेषज्ञ और तंत्रिका विज्ञानी, पीटर हुटनलॉकर के मुताबिक इसी उम्र में मस्तिष्क का जो हिस्सा भाषा सीखने में मदद देता है, उसमें पाए जानेवाले सिनैप्सिस की सघनता घट जाती है और उनकी गिनती कम हो जाती है। इससे साफ ज़ाहिर होता है कि भाषा सीखने में शिशु के पहले कुछ साल कितनी ज़्यादा अहमियत रखते हैं।

 

 

क्या कहते हैं शोध

बच्चे जितने शब्द सुनते हैं उन्हीं से सीखने की कोशिश करते हैं। एक वैज्ञानिक अनुसन्धान से भी इस बात पता की पुष्टि हुई थी कि बच्चा भी उसी तरह सीखता है, जिस तरह पालतू पक्षी बोलना सीखते हैं। वे आस-पास के लोगों की बोली की नकल करते हैं और भाव - भंगिमाओं को गौर से देखकर उनसे प्रेरित होते हैं। दरअसल अमरीका के पैनसिल्वेनिया स्थित फ़्रैंकलिन एंड मार्शल कॉलिज के माइकेल गोल्डश्टाइन और उनके साथी शोधकर्त्ताओं ने क्रीड़ा-काल के दौरान 8 महीनों के शिशुओं और उनकी माताओं के व्यवहार का अध्ययन किया। इसके लिए पहले तो उन्होंने शिशुओं की मुंह से निकलने वाली आवाज़ों और उन ध्वनियों को लेकर की गई उनकी माताओं की प्रतिक्रियाओं का सामूहिक अध्ययन किया।


 

बाद में उन्होंने मांओं के दो वर्ग बनाये। एक वर्ग की मांओं से अपने बच्चे की आवाज़ों के जवाब में मुस्कुराने को कहा गया, और कहा गया कि वे ऐसे में  उसके निकट जाएं और उसे छुएं या अपना साथ लगाएं। वहीं दूसरे वर्ग की माताओं की प्रतिक्रियाओं को सामान्य रूप से होने दिया गया। शोधकर्त्ताओं ने इन सबका विश्लेषण करने पर पाया कि पहले वर्ग के शिशुओं ने जल्दी बोलना सीखा। इन शिशुओं की आवाज़ों में वर्णमाला के अक्षर अपेक्षाकृत ज़्यादा थे और वे व्यंजनों से स्वरों की ओर तेज़ी से जा रहे थे।

 

Talking To Kids

 

 

शोधकर्ताओं ने इस संदर्भ में कहा था कि अगर बच्चों को बोलते समय प्रोत्साहन न दिया जाए, तो वे देर से भाषा सीख पाते हैं। इसलिए बच्चों के बोलने के जवाब में उनसे बोलना और मुस्कुराना चाहिए, उन्हें छूना और हाव-भाव आदि का भी प्रदर्शन करना चाहिए। गौरतलब है कि बचपन में मां-बाप द्वारा शिशुओं से बातचीत का गलत तरीका, उनके बड़े होने पर कमजोर आई क्यू और सीखने में समस्या का कारण बन सकता है।


 

समाधान

इस समस्या का हल बच्चों के लिए बेहतर प्राथमिक स्कूल की सुविधाओं को विकसित करना है। अच्छी स्कूली शिक्षा कम से कम व्यक्तिगत असफलताओं से जूझ रहे बच्चों को इससे सामना करने में मदद करेंगी और इन बच्चों को बेहतर सीखने के लिए यह सुनिश्चित मौका देंगी। प्रीस्कूल कार्यक्रम अच्छे होते हैं क्योंकि यह बच्चे के संख्यात्मक कार्यो व सामाजिक कौशल को विकसित करता है और बच्चे को असली स्कूली शिक्षा के अनुभव के लिए एक तैयार करता है। लेकिन सबसे जरूरी है समाज के गरीब वर्गों के बीच बेहतर सामाजिक आर्थिक सुधारों की। और सबसे खास बात, बच्चों के साथ सीधी बातचीत ही एकमात्र रास्ता है जो उन्हें शब्दों को पकड़ने और बेहतर शब्दावली सीखने में मद करता है और उनके भविष्य शैक्षिक संभावना व आई क्यू में सुधार करता है।



तो यदि आप अब भी अपने शिशु से बच्चों जैसी भाषा में बात कर रहे हैं तो अभी रुक जाएं। आपका आपके शिशु से सीधे और उचित भाषा में बात करना बहुत महत्वपूर्ण है। जितना जल्दी आप ऐसा करना शुरू करेंगे, आपके शिशु के लिए उतना बेहतर होगा।

 

 

 

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