सेहत के लिए क्यों जरूरी है फाइबर? जानें आपके रोज के खाने में कितना फाइबर होना चाहिए

Updated at: Nov 26, 2020
सेहत के लिए क्यों जरूरी है फाइबर? जानें आपके रोज के खाने में कितना फाइबर होना चाहिए

आपके रोज के खाने में फाइबर (रेशेदार आहार) जरूर होने चाहिए। ये फाइबर आपको डायबिटीज, हार्ट अटैक, पेट के कैंसर और कब्ज जैसी बीमारियों से बचाता है।

Kishori Mishra
स्वस्थ आहारWritten by: Kishori MishraPublished at: Nov 26, 2020

डॉक्टर्स या डायटिशियन अक्सर जब आपको खाने की सलाह देते हैं, तो एक शब्द का खूब इस्तेमाल करते हैं, वो है "फाइबर"। फाइबर को बोलचाल की भाषा में हम "रेशेदार" कह सकते हैं। फाइबर एक ऐसा घटक है, जो शरीर में पाचनतंत्र को दुरुस्त रखने का काम करता है। यह आंतों में जमा अपशिष्ट पदार्थों (Waste Materials) को बाहर निकालने में आपकी मदद करता है। इतना ही नहीं भोजन में फाइबर की मात्रा अच्छी रहने से हर्निया, कब्ज, डायवर्टीकुलोसिस, मेटाबॉलिक सिंड्रोम, आंतों के कैंसर और टाइप-2 डायबिटीज जैसी बीमारियों से बचाव होता है। फाइबर दरअसल वो रेशे होते हैं, जो भोजन में पाए जाते हैं। 

कार्बोहाइड्रेट की अपेक्षा फाइबर को पचाने में पेट को ज्यादा समय लगता है और ज्यादा मेहनत लगती है, इसलिए फाइबर को पचाते समय पेट ज्यादा ऊर्जा खर्च करता है। यही कारण है कि जो लोग अच्छी मात्रा में फाइबर खाते हैं, उनके शरीर में एक्स्ट्रा कैलोरीज नहीं जमा होती हैं, क्योंकि ये कैलोरीज फाइबर को पचाने में खर्च हो जाती हैं। फाइबर खाने का दूसरा फायदा यह भी है कि जब पेट इसे धीरे-धीरे पचाता है, तो आपके ब्लड में ग्लूकोज का लेवल भी धीरे-धीरे बढ़ता है। जबकि अगर आप कार्ब्स खाते हैं, तो आपका पेट इसे जल्दी पचाता है और ब्लड में शुगर अचानक बढ़ जाता है। इस कारण से फाइबर को डायबिटीज मरीजों के लिए भी फायदेमंद माना जाता है। आइए आपको बताते हैं फाइबर के बारे में और ढेर सारी बातें।

फाइबर क्या होता है? (What is Fiber)

फाइबर कार्बोहाइड्रेट का ही एक रूप है, लेकिन ये ज्यादा कॉम्पलेक्स होता है, इसलिए इसे पेट तुरंत नहीं पचा पाता है, बल्कि धीरे-धीरे पचाता है। धीरे-धीरे पचने के कारण फाइबर आपके पेट में देर तक रहता है, तो इस वजह से आपको भूख भी कम लगती है। सबसे खास बात ये है कि फाइबर को जीरा कैलोरी माना जाता है। जीरो कैलोरी का मतलब यह नहीं है कि इसमें कैलोरीज नहीं होती हैं। बल्कि इसका अर्थ यह है कि फाइबर खाने से आपके शरीर को जितनी कैलोरीज मिलती हैं, उतनी सारी कैलोरीज इसे पचाने में ही शरीर खत्म कर देता है। तो अंत में आपके शरीर में अतिरिक्त कैलोरीज नहीं बचती हैं। इसीलिए फाइबर वाले आहार मोटापे से ग्रस्त लोगों का वजन घटाने में भी मदद करते हैं। 

फाइबर की मात्रा खाने में कितनी होनी चाहिए?

एक सामान्य व्यक्ति को दिन में करीब 38 ग्राम फाइबर का सेवन करना चाहिए। 1 कटोरी दलिया में लगभग 12 ग्राम फाइबर होता है। इसी तरह एक मीडियम साइज सेब में लगभग 3.4 ग्राम फाइबर होता है। आजकल फास्ट फूड्स, जंक फूड्स और प्रॉसेस्ड फूड्स के सेवन के कारण लोगों के खाने में फाइबर की मात्रा बहुत कम हो गई है। ज्यादातर लोग एक दिन में 15-20 ग्राम फाइबर का ही सेवन करते हैं। याद रखें आपको रोज के खाने में उतना ही कार्बोहाइड्रेट लेना चाहिए, जितना आप एक दिन में फाइबर ले रहे हैं। अधिक कार्बोहाइड्रेट के सेवन से कई समस्याएं हो सकती हैं। फाइबर दो तरह के होते हैं। एक है घुलनशील और दूसरा है अघुलनशील।

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घुलनशील और अघुलनशील में क्या है अंतर? (different between Soluble and insoluble fiber )

घुलनशील फाइबर

घुलनशील फाइबर पानी में आसानी से घुल जाता है और यह गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल  (Gastrointestinal tract ) ट्रैक्ट में पहुंचने पर जेल के रूप में बदल जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान पाचन धीमा हो जाता है। धीमी गति में पाचन की क्रिया के दौरान विटामिंस और खनिज सहित भोजन में मौजूद अन्य पोषक तत्व अलग करके जरूरी अंगों को भेज दिए जाते  हैं। घुलनशील फाइबर मुख्य रूप से ओट्स, भिंडी, जौ, नट्स, बीज, जई चोकर, मसूर, सेम, मटर, और कुछ अन्य फलों और सब्जियों में पाया जाता है। घुलनशील फाइबर के सेवन से टाइप-2 डायबिटीज के खतरे को कंट्रोल किया जा सकता है।    

अघुलनशील फाइबर

अघुलनशील फाइबर पानी में नहीं घुलता है। ये मुख्य रूप से चोकर, साबुत अनाज, मकाई (भुट्टा) और रेशेदार सब्जियों में पाया पाया जाता है। अघुलनशील फाइबर अपेक्षाकृत गैर-प्रतिक्रियाशील रहता है। यह पाचनतंत्र से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने में मददगार होता है। अघुलनशील फाइबर के सेवन से मल त्यागने में होने वाली परेशानी दूर होती है। इसके अलावा पेट के कैंसर से भी बचाव करने में मददगार साबित होता है।

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