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जानें पोस्‍टपार्टम डिप्रेशन से जुड़ी सभी बातें

महिला स्‍वास्थ्‍य By Pooja Sinha , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Nov 06, 2013
जानें पोस्‍टपार्टम डिप्रेशन से जुड़ी सभी बातें

पोस्‍टपार्टम डिप्रेशन किसी भी महिला को बड़ा मा‍नसिक आघात पहुंचा सकता है। इन हालात में महिला निराशा के बादलों से घिर जाती है और उसे स्‍वयं के प्रति बिल्‍कुल भी मोह नहीं रह जाता।

Quick Bites
  • बहुत गंभीर रोग है पोस्‍टपार्टम डिप्रेशन, इसे हल्‍के में न लें।
  • इसकी शिकार महिला बच्‍चे का पूरा ध्‍यान नहीं रख पाती।
  • हालात बिगड़ने पर बच्‍चे और महिला के लिए खतरा।
  • सही समय पर इलाज से इसके दुष्‍प्रभावों से हो सकता है बचाव।

 

पोस्‍टपार्टम डिप्रेशन एक गंभीर बीमारी है जो बच्‍चे के जन्‍म के कुछ महीनों बाद मां को हो सकता है। यह परिस्थिति तब भी हो सकती है, जब किसी कारण महिला का गर्भपात हो जाए अथवा उसका बच्‍चा मृत पैदा हुआ हो। ये हालात किसी भी महिला के लिए अंदरूनी तौर पर झकझोर कर रखने वाले होते हैं।

पोस्‍टपार्टम डिप्रेशन आपको काफी दुखी कर सकता है। इन हालात में महिला निराशा के बादलों से घिर जाती है और उसे स्‍वयं के प्रति बिल्‍कुल भी मोह नहीं रह जाता। इस दौरान महिला अपने बच्‍चे की ओर किसी तरह का ध्‍यान नहीं देती और अपने बच्‍चे के साथ उसका भावनात्‍मक जुड़ाव भी नहीं रहता।

postpartum depression in hindi

'बेबी ब्‍लूज' नहीं है पोस्‍टपार्टम डिप्रेशन

पोस्‍टपार्टम अवसाद और "बेबी ब्‍लू", दोनो ही स्‍थितियां एक दूसरे से अलग हैं, इन दोनों प्राकर के अवसाद के लक्षण भिन्‍न है। "बेबी ब्‍लू" प्रसव पूर्व होने वाली ऐसी अवस्था है जो सबसे सामान्य है और हर तीन में से एक महिला में यह स्‍थिति पायी जाती है। प्रसव के बाद कुछ हफ्तों में शरीर में हुए हार्मोनल परिवर्तन की वजह से ये विकार होता है। प्रसव के बाद नई माँ अक्सर भावनात्मक रुप से संवेदनशील हो जाती है, कुछ ही क्षण में वह खुश हो जाती है और अगले कुछ क्षणों में दुखी।"बेबी ब्‍लू"  विकार से और भी समस्‍याएं आ सकती हैं, लेकिन इससे आमतौर पर एक मां की जिम्मेदारी और कार्य में हस्तक्षेप नही होता और कुछ सप्ताह बाद यह बीमारी खत्म हो जाती है।

 

क्‍या है पोस्‍टपार्टम डिप्रेशन

पोस्‍टपार्टम अवसाद एक अलग स्‍थिति है। यह समस्‍या प्रसव के पहले, दूसरे या तीसरे महीनों मे किसी भी समय शुरू हो सकता है। इसमें दुख और निराशा महसूस होती है,या मां कभी-कभी खुद को बेकार और दोषी मानने लगती है। नई मां किसी भी कार्य या बात में एकाग्रता या रुचि लेने मे असमर्थ हो जाती है। यहां तक कि वह अपने बच्‍चे की जरूरतों का भी ध्‍यान नहीं रख पाती। वह बहुत चिंतायुक्त, संवेदनशील बन जाती है और उसके मन में इस तरह के परेशान करने वाले विचार बार-बार आनेसे उसको बच्चे के स्वास्थ्‍य की भी चिंता होने लगती है। ऐसे में नई मां बारबार एक ही कार्य करती है, जैसे बच्चे कि बारबार जाँच करती है, या फिर लगातार बच्चो के चिकित्सक को फोन करके सवाल पूछती है।

 

हालात बिगड़ भी सकते हैं

कुछ दुर्लभ मामलों में महिला को गंभीर अवसाद भी हो सकता है जिसे पोस्‍टपार्टम साइकोसिस कहते हैं। इस दौरान महिला काफी अजीब व्‍यवहार कर सकती है। उसे वे आवाजें सुनाई दे सकती हैं, जो वास्‍तव में वहां मौजूद ही न हों। साथ ही वे गैरमौजूद चीजों को देखने का दावा भी कर सकती है। ये हालात स्‍वयं उसके और उसके बच्‍चे दोनों के लिए खतरनाक हो सकते हैं। यह एक आपातकालीन स्थिति है और इसे काफी गंभीरता से लेने की जरूरत होती है। इस हल्‍के में नहीं लेना चाहिए क्‍योंकि ये परिस्थितियां काफी तेजी से और खराब हो सकती हैं। इससे न केवल महिला बल्कि उसके आसपास के लोगों के लिए भी काफी खतरनाक हालात पैदा हो सकते हैं।

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अवसाद का सही इलाज करवाना जरूरी

अवसाद का सही इलाज करवाना बेहद जरूरी है। जितनी जल्‍दी आप इस बीमारी का इलाज करवाएंगी, उतनी जल्‍दी आप स्‍वयं को लेकर बेहतर महसूस करेंगी। इसके बाद आप अपने बच्‍चे और भावी जीवन का बेहतर आनंद उठा पाएंगी।

 

क्‍या कहते हैं शोध

नॉर्थवेर्स्‍टन मेडिसन के शोधकर्ताओं ने जामा (जेएएमए) साइकेट्री के शोधकर्ताओं ने कहा कि पोस्‍टपार्टम डिप्रेशन सात में से एक नयी मां को प्रभावित करता है। अपने शोध में उन्‍होंने पाया कि जिन 10 हजार मांओं पर उन्‍होंने शोध किया था, जब 12 महीने बाद उनकी जांच की गयी तो, उनमें से करीब 22 फीसदी को अवसाद की शिकायत हुई थी। इस शोध के प्रमुख शोधकर्ता डॉकटर कैथरीन एल विस्‍नर ने सलाह दी है कि न केवल नयी मांओं बल्कि सभी गर्भवती महिलाओं में अवसाद के लक्षणों की जांच अवश्‍य की जानी चाहिए।

 

कुल मिलाकर देखा जाए तो अवसाद किसी भी व्‍यक्ति के लिए अच्‍छा नहीं होता। अवसादग्रस्‍त व्‍यक्ति अपनी देखभाल सही से नहीं कर पाता और उसकी सोचने समझने की शक्ति भी बुरी तरह प्रभावित होती है। और नयी मां, जिस पर न केवल अपनी बल्कि अपने शिशु की भी जिम्‍मेदारी होती है, को अधिक देखभाल की जरूरत होती है। ऐसे में अगर किसी भी गर्भवती अथवा नयी मां में इस प्रकार के लक्षण नजर आएं, तो बिना देर किसी उसे चिकित्‍सीय सहायता प्रदान की जानी चाहिए।

Image Source : Getty

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Written by
Pooja Sinha
Source: ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभागNov 06, 2013

इस जानकारी की सटीकता, समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर सम्भव प्रयास किया गया है हालांकि इसकी नैतिक जि़म्मेदारी ओन्लीमायहेल्थ डॉट कॉम की नहीं है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्देश्य आपको जानकारी मुहैया कराना मात्र है।

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