जानलेवा है मच्छरों से फैलने वाली जापानी इंसेफलाइटिस बीमारी, जानें क्या हैं इसके लक्षण और बचाव के उपाय

Updated at: Jul 30, 2020
जानलेवा है मच्छरों से फैलने वाली जापानी इंसेफलाइटिस बीमारी, जानें क्या हैं इसके लक्षण और बचाव के उपाय

डेंगू-मलेरिया की ही तरह जापानी इंसेफटाइटिस भी मच्छरों से फैलने वाली एक जानलेवा बीमारी है। जानें क्यों खतरनाक है ये बीमारी और इससे बचाव के टिप्स।

Anurag Anubhav
अन्य़ बीमारियांWritten by: Anurag AnubhavPublished at: Jul 30, 2020

एक तरफ पूरी दुनिया कोरोना वायरस की मार झेल रही है और दूसरी तरफ भारत में कई तरह के सीजनल संक्रमणों ने भी दस्तक देना शुरू कर दिया है। भारत के कई हिस्सों में इन दिनों डेंगू, मलेरिया और जापानी इंसेफलाइटिस जैसी बीमारियां फैलना शुरू हुई हैं। भारत के असम में पिछले दिनों जापानी इंसेफलाइटिस के 199 मामले सामने आए और 29 लोगों की जान चली गई। डेंगू-मलेरिया के बारे में तो आप पहले से जानते हैं लेकिन जापानी इंसेफलाइटिस के बारे में लोग बहुत कम जानते हैं। इसलिए आज हम आपको इस बीमारी के बारे में विस्तार से बता रहे हैं।

सरोज सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल नई दिल्ली के इंटरनल मेडिसिन विभाग के Dr. S.K Mundhra बताते हैं, "डेंगू-मलेरिया की तरह जापानी इंसेफलाइटिस भी मच्छरों से फैलने वाली बीमारी है। यह एक वायरल संक्रमण है जो सीधा मस्तिष्क पर असर करता है और वहां सूजन का कारण बनता है। इसे जापानी बुखार के नाम से भी जाना जाता है। यह वायरस संक्रमित मच्छर के काटने से फैलता है और आमतौर पर एशिया और पश्चिम प्रशांत में पाया जाता है। कई बार यह बीमारी सुअर या गंदगी के कारण भी फैलता है। ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों में लोग इस बीमारी से पीड़ित होने की अधिक संभावना रखते हैं। वहीं 1 से 14 वर्ष की उम्र के बच्चों में इसका खतरा सबसे ज्यादा होता है। जापानी इंसेफलाइटिस का बुखार होने पर बच्चे की सोचने, समझने और सुनने की क्षमता प्रभावित होती है। यह बीमारी छूने से नहीं फैलती है। इस बीमारी के सबसे ज्यादा मामले बारिश के मौसम यानी कि अगस्त, सितंबर और अक्टूबर में देखने को मिलते हैं।"

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यह एक दुर्लभ बीमारी है और भारत में हर साल इसके 5 हज़ार से भी कम मामले देखने को मिलते हैं। यही कारण है कि लोगों को इस बीमारी के बारे में कुछ अधिक जानकारी नहीं है। भारत में अधिकतर लोग इस बीमारी से परिचित नहीं हैं। 250 संक्रमणों में से केवल 1 को एन्सेफलाइटिस का निदान किया जाता है। हालांकि, ज्यादातर मामले बहुत हल्के होते हैं, कुछ मामलों में स्थिति गंभीर हो सकती है। ऐसे में मरीज को उचित इलाज की आवश्यकता पड़ती है।

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जापानी इंसेफलाइटिस के लक्षण (Symptoms of Japanese Encephalitis)

  • तेज़ बुखार के साथ उल्टी
  • कमजोरी
  • अचानक सिरदर्द
  • शरीर और गर्दन में अकड़न
  • सुस्ती
  • दौरे और विचलन
  • भूख न लगना

इसके लक्षण संक्रमित मच्छर के काटने के 4-14 दिनों के बीच नजर आना शुरू होते हैं। यदि आप बार-बार इन लक्षणों का अनुभव करते हैं तो आपको डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। इस बीमारी से ग्रस्त मरीज के शरीर को लकवा तक मार सकता है और वह कोमा में भी जा सकता है। इस बीमारी से ग्रस्त मरीजों की 30% आबादी में जान जाने का खतरा ज्यादा होता है।

जापानी इंसेफलाइटिस से बचाव के उपाय (Tips to Prevent Japanese Encephalitis)

  • इस बीमारी से बचाव में स्वच्छता एक अहम भूमिका निभाती है।
  • इस बीमारी के लिए टीका भी उपलब्ध है। नवजात शिशु को जापानी इंसेफलाइटिस का टीका लगवाएं।
  • बच्चे हों या बड़े गंदे पानी के संपर्क में आने से बचें।
  • मॉनसून में हर उस जगह की समय-समय पर सफाई कराएं जहां पानी जमा हो सकता है। किसी भी स्थान पर पानी को जमा न होने दें।
  • मच्छरों को मारने के लिए कीटनाशक दवाई या स्प्रे का उपयोग करें।
  • समय-समय पर कीटनाशक दवाई का छिड़काव कराएं।
  • सोते समय मच्छरदानी का उपयोग करें।
  • बाहर भेजते वक्त बच्चों को पूरे शरीर को ढ़कने वाले कपड़े पहनाएं।
  • मौसम में बदलाव के साथ गुनगुना पानी पीने की आदत डालें।
  • घर के आस पास साफ-सफाई रखें।
  • पौष्टिक आहार का सेवन करें। विशेषकर बारिश के मौसम में इस बात का खास ख्याल रखें।
  • हल्का बुखार होने पर लापरवाही न दिखाएं और तुरंत किसी अच्छे डॉक्टर से संपर्क करें।
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उपलब्ध है बीमारी से बचाने का टीका (Vaccine for Japanese Encephalitis)

इस संक्रमण की रोकथाम के लिए प्रभावी और सुरक्षित टीका उपलब्ध है। यह टीका इंजेक्शन के जरिए 2 बार में लगाया जाता है। टीके की दूसरी डोज़ पहली डोज़ के 28 दिनों बाद दी जाती है। संभवता कई बार दोनों डोज़ के बीच 7 दिनों का फर्क हो सकता है। लेकिन यह समय केवल 18 से 65 वर्ष तक की उम्र के लोगों के लिए ही सुरक्षित है।

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जापानी इंसेफलाइटिस का इलाज ( Treatment of Japanese Encephalitis)

जापानी इंसेफलाइटिस का इलाज फिलहाल उपलब्ध नहीं है। हालांकि, डॉक्टर उचित उपचार के साथ इस बीमारी को गंभीर होने से रोकने की कोशिश करते हैं। इस बीमारी के कारण प्रति 3 में से 1 मरीज को अपनी जान गंवानी पड़ती है। लेकिन जो मरीज बच जाते हैं उनमें इस बीमारी के लक्षण धीरे-धीरे खत्म होने लगते हैं। हालांकि, मरीज को ठीक होने में कई महीनों का वक्त लग सकता है। जो मरीज ठीक हो जाते हैं उनमें से कुछ मरीजों का मस्तिष्क हमेशा के लिए क्षतिग्रस्त हो जाता है।

इस बीमारी की पुष्टि करने के लिए डॉक्टर ब्लड टेस्ट की सलाह देते हैं। यदि इसकी पुष्टि होती है तो डॉक्टर मरीज को सीटी या एमआरआई स्कैन की सलाह देता है।

निदान के बाद डॉक्टर मरीज का मेडिकेशन शुरू करता है, जहां बुखार-सिरदर्द की दवाईयों के साथ मरीज को उचित बेडरेस्ट सलाह दी जाती है। इसके साथ ही उसे तरल पदार्थों का अधिक से अधिक सेवन करने के लिए कहा जाता है। मरीज को नियमित रूप से डॉक्टर के पास जांच के लिए जाना पड़ता है, जहां डॉक्टर यह पता करता है कि मरीज की हालत में पहले से कोई सुधार है या नहीं। रोगी की हालत गंभीर होने पर उसे अस्पताल में भर्ती किया जा सकता है। ऐसे में रोगी को एंटीकनवल्सेन्ट्स दी जाती हैं।

यह लेख Dr S.K Mundhra, HOD -  Internal Medicine, Saroj Super Speciality Hospital, New Delhi से बातचीत पर आधारित है।

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