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ब्रेस्ट कैंसर के इलाज के दौरान किसी भी प्रकार का सप्लीमेंट लेना हो सकता है जानलेवा, जानें एक्‍सपर्ट की राय

Updated at: Jan 07, 2020
कैंसर
Written by: Jitendra GuptaPublished at: Jan 07, 2020
ब्रेस्ट कैंसर के इलाज के दौरान किसी भी प्रकार का सप्लीमेंट लेना हो सकता है जानलेवा, जानें एक्‍सपर्ट की राय

एक शोध के मुताबिक, ब्रेस्ट कैंसर के इलाज के दौरान सप्लीमेंट लेने से मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है। जानें एक्सपर्ट से जरूरी टिप्स।

पिछले महीने ब्रेस्ट कैंसर से जूझ रही 1,000 से ज्यादा महिलाओं पर किए गए एक अध्ययन में ये पाया गया कि कुछ न्यूट्रिशनल सप्लीमेंट इस बीमारी से बचने की संभावना को कम कर सकते हैं और उपचार के बाद फिर से कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है। जर्नल ऑफ क्लीनिकल ओंकोलॉजी में प्रकाशित शोध में बताया गया कि विटामिन बी 12, आयरन और ओमेगा -3 फैटी एसिड की खुराक लेने वाले मरीजों में स्तन कैंसर की पुनरावृत्ति और मृत्यु का खतरा काफी अधिक था। हालांकि भारतीय चिकित्सकों ने इस शोध को लेकर अभी कुछ कहने से इंकार कर दिया है।

breast cancer

वहीं डॉक्टर रीनु जैन, सीनियर कंसल्टेंट, ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनाकोलॉजिस्ट, जेपी अस्पताल, नोएडा के मुताबिक सभी कैंसरों के जीवनशैली और अनुवांशिक तमाम तरह के कारण हैं। लेकिन महिलाओं को होने वाले कैंसरों के कारण बायोलॉजिकल के साथ साथ सामाजिक भी होते हैं। उन्होंने ब्रेस्ट कैंसर से जुड़े कुछ तथ्यों पर प्रकाश डाला, जोकि इस प्रकार हैं।

  • ब्रेस्ट कैंसर भारत में सबसे आम कैंसरों में से एक है।
  • हर चार मिनट में एक स्त्री ब्रेस्ट कैंसर से डाईग्नोज़ होती है। 
  • इससे भी घातक बात यह कि देश में 30 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के बहुत से मामले सामने आ रहे हैं जिसके आने वाले समय में और भी बढ़ने की आशंका है।

इन सबके अलावा भारत में ब्रेस्ट कैंसर का “सर्वाइवल रेट” भी बहुत निराशाजनक है। यहां सबसे पहले यह ज़रूरी है कि ब्रेस्ट कैंसर को केवल कैंसर ही नहीं बल्कि महिलाओं के संपूर्ण स्वास्थ्य से जोड़ कर इसके हल निकालने की योजना बनायीं जाए, इसके बहुत से पहलु हैं जो हम इन बिन्दुओं में जानेंगे:-

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रूढ़िवादी समाज:- इस समस्या का सबसे अधिक सामना हमारी ग्रामीण परिवेश से आने वाली महिलाओं को करना पड़ता है। जिसके तहत उनके स्वास्थ्य के प्रति अनदेखी की जाती है, साथ ही लोक लाज जैसी सोच के चलते उनपर अपनी समस्याओं को खुलकर न कह पाने का दबाव होता है। इसलिए अक्सर देखा गया है कि ब्रेस्ट कैंसर के मामलों में बहुत बड़ी संख्या में महिलाएं डॉक्टर के पास जांच के लिए तब पहुंचती हैं जब “बहुत देर हो चुकी होती है”, जिस से उनका इलाज सही समय पर नहीं नहीं हो पाता है, या यूं कहें कि कई हालात में डाईग्नोसिस तक नहीं हो पाता। और कैंसर जानलेवा या खतरनाक आखिरी स्टेज में ही होता है। इसके लिए बहुत जागरूकता की ज़रुरत है। हालांकि इस दिशा में सामाजिक कार्यकर्ताओं और सरकार द्वारा कई सफल प्रयास किये गए हैं लेकिन अभी बहुत लम्बी दूरी तय करनी है।

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शहरी इलाकों की जीवनशैली:- शहरी परिवेश की भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में महिला और पुरुष दोनों ही तमाम तरह से व्यस्त नज़र आते हैं। और इन्हीं व्यस्तताओं में अनियमित जीवनशैली के चलते सवास्थ्य संबंधी समस्याओं की अनदेखी, खान पान की वजह से हार्मोनल इम्बैलेंस होना सामान्य होता है और शारीरिक समस्याओ की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। अक्सर महिलायें ब्रेस्ट में नज़र आने वाली गांठ को ऐसे ही अन्य जिम्मेदारियों के चलते नज़रंदाज़ कर देतीं हैं जो बाद में भयानक परिणामों के साथ सामने आती है। यह अति आवश्यक है कि हम अपने खान पान तथा जीवन शैली का ध्यान रखे। पूरे दिन की मेहनत मशक्कत मूल रूप से अच्छे स्वास्थ्य के लिए होनी चाहिए, और महिलाओं को यह बात खास तौर पर समझनी चाहिए।

अगर समय रहते पहचान हो जाये तो किसी भी प्रकार का इलाज संभव है इसके लिए:-

  • नियमित रूप से स्व जांच करते रहनी चाहिए। 
  • ब्रेस्ट में किसी प्रकार की गांठ या दर्द महसूस होने पर तुरंत जांच करवानी चाहिए।
  • ध्यान रहे पुरुषों में भी स्तन कैंसर पाया गया है। महत्वपूर्ण है कि वे भी इस विषय में खुद को जागरूक करें और शरीर में होने वाली किसी भी प्रकार की गांठ की तुरंत डॉक्टरी जांच कराएं।
  • खासतौर पर 45 वर्ष से अधिक उम्र की स्त्रियों को अपनी ब्रेस्ट स्क्रीनिंग करवाने का नियम बनाना चाहिए।  

स्तन कैंसर एक ऐसी समस्या है जहां पर मरीज़ को मानसिक तौर पर मजबूत होने की बेहद जरूरत होती है। इससे बचने के बहुत से उपाय हैं लेकिन यदि कोई कैंसर पीड़ित है उसे अपने आस पास के लोगों से व्यवहारिक साथ की बेहद आवश्यकता होती है। लेकिन ब्रेस्ट कैंसर के मामले में महिलाओं को वह साथ अधिकतर नहीं मिलता बल्कि हेय दृष्टि से देखा जाता है। बहुत ज़रूरी है कि यह प्रवृति भी ख़त्म हो ताकि मरीजों के लिए इलाज के साथ साथ अच्छा माहौल भी विकसित किया जा सके।

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स्तन कैंसर यदि एक बार डाईग्नोज़ हो जाए तो उसके उपचार कुछ इस प्रकार से हैं-

रेडिएशन थेरेपी 

रेडिएशन थेरेपी न कराने से कैंसर फिर से होने की आशंका 25 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।  लम्पेक्टॉमी के बाद पीछे बचने वाली किसी कैंसरयुक्त कोशिकाओं को नष्ट करने और कैंसर के दोबारा जनम लेने से रोकने के लिए की जाती है।

कीमोथेरेपी

कैंसर अगर दोबारा हो तो कीमोथेरेपी आमतौर से जरूरी हो जाती है। कीमोथेरेपी को हार्मोनल कीमोथेरेपी भी कहते हैं इसकी सलाह तब दी जाती है जब पैथालॉजी रिपोर्ट में कैंसर के एस्ट्रोजेन-रिसेप्टर पॉजिटिव होने का पता चलता है।  हार्मोनल कीमोथेरेपी में पहले टैमोक्सी-फेन (नोल्वाडेक्स) नामक दवा का उपयोग किया जाता है। टैमोक्सीमफेन, एस्ट्रोजन को स्तन कैंसर वाली ऐसी कोशिकाओं से बाहर रोक देती है जो एस्ट्रोजेन-रिसेप्टर पॉज़िटिव होती हैं जिससे कैंसर के फिर से होने की दर 30 प्रतिशत तक कम हो जाती है।

हार्मोनल थेरेपी

एरोमाटेज इनहिबिटर्स जैसी दवाएं, हार्मोनल थेरेपी का एक अन्य प्रकार हैं। इन दवाओं में शामिल हैं: एनास्ट्राज़ोल (आरिमिडेक्स), एक्सेमेस्टेन (एरोमासिन) और लेट्रोज़ोल (फीमेरा)। ये ओवरी के अलावा शरीर के अन्य टिश्युओं में एस्ट्रोजन की पैदावार रोककर शरीर में एस्ट्रोजन की मात्रा घटा देती हैं। ये दवाएं मेनोपॉज वाली महिलाओं में बहुत कारगर हैं क्योंकि मेनोपॉज के बाद ओवरी में एस्ट्रोजन का बनना रुक जाता है।

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