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सर्दियों में बढ़ जाता है शीतपित्त का खतरा, जानें इसके कारण, लक्षण और उपचार

अन्य़ बीमारियां By अनुराग अनुभव , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Jan 17, 2018
सर्दियों में बढ़ जाता है शीतपित्त का खतरा, जानें इसके कारण, लक्षण और उपचार

शीतपित्त यानि अर्टिकेरिया एक तरह का चर्म रोग है जो ज्यादातर एलर्जी के कारण हो जाता है। सर्दियों में बहुत से लोगों को ये समस्य हो जाती है। साधारण भाषा में लोग इसे पित्ती उछलना कहते हैं।

शीतपित्त यानि अर्टिकेरिया एक तरह का चर्म रोग है जो ज्यादातर एलर्जी के कारण हो जाता है। सर्दियों में बहुत से लोगों को ये समस्य हो जाती है। साधारण भाषा में लोग इसे पित्ती उछलना कहते हैं। इस रोग में शरीर में गहरे लाल रंग के छोट-बड़े चकत्ते उभर आते हैं जिनमें लगातार तेज खुजली होती रहती है। कई बार शीतपित्त में खुजली इतनी तेज हो जाती है कि खुजालाते हुए मरीज के अंगों में जलन होने लगती है या खून निकलने लगता है। ये रोग खुजलाने से बढ़ता जाता है और तेजी से फैलता जाता है। इस रोग के कई कारण हो सकते हैं लेकिन इसका मूल कारण शरीर में हिस्टमीन नाम का टॉक्सिस पदार्थ है, जिसके शरीर में प्रवेश करने से ये रोग हमारे स्किन पर उभरने लगता है। शीतपित्त के कई कारण हो सकते हैं।

तापमान में अचानक परिवर्तन से

ये शीतपित्त का सबसे सामान्य कारण है। कई बार सर्दियों में जब हम तेजी से चल लेते हैं या दौड़ लेते हैं और शरीर अचानक ठंडे से गर्म होना शुरू हो जाता है, तब त्वचा पर ये शीतपित्त उभर आते  हैं। इसी तरह गर्मियों में जब आप बाहर से आएं यानि शरीर का तापमान गर्म हो और उसी समय कुछ खा-पी लें तो भी शीतपित्त उभर आते हैं। इसी लिए कहा जाता है कि धूप से आकर तुरंत फ्रिज का पानी या कोल्ड ड्रिंक नहीं पीना चाहिए और न बर्फ से बने पदार्थ और आइस क्रीम खाना चाहिए।

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पाचन तंत्र में गड़बड़ी से

शीतपित्त शरीर में पाचन तंत्र यानि डाइजेस्टेटिव सिस्टम की गड़बड़ी से भी हो जाता है। अक्सर ये तब होता है जब शरीर में गर्मी बढ़ जाती है और खाना सही से पच नहीं पाता है। ऐसे में कब्ज, एसिडिटी, अजीर्ण या गैस की समस्या होने पर भी शीतपित्त का खतरा बढ़ जाता है।

प्रदूषण या गंदगी से

कई लोगों की स्किन बहुत सेंसिटिव होती है। ऐसे लोगों की त्वचा पर आसपास के वातावरण का प्रभाव पड़ता है और उसमें परिवर्तन होते रहते हैं। ऐसे ही सेंसिटिव लोग जब प्रदूषण या गंदगी में देर तक रहते हैं तो उन्हें शरीर पर ऐसे लाल चकत्तों का सामना करना पड़ सकता है।

दवाओं के रिएक्शन से

कई बार हम कोई दवा खाते हैं जिससे हमारा रोग तो ठीक हो जाता है मगर उस दवा के दूसरे तत्व हमारे शरीर के लिए हानिकारक साबित होते हैं, इसी को दवा का रिएक्शन कहते हैं। कई बार दवाओं के अत्यधिक प्रयोग से या किसी दवा के रिएक्शन से भी हमारे शरीर में शीतपित्त हो जाते हैं।

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अनहेल्दी फूड्स से

कई बार अस्वस्थ आहार की वजह से भी शीतपित्त हमारे शरीर में हो जाती है। बाजार में खुले में मिलने वाले फूड आइटम्स, बिना साफ-सफाई के बनाए हुए फूड्स, फास्ट फूड्स, ज्यादा तेल-मसाले और एसिड से बने फूड आइटम्स आपके शरीर के लिए काफी नुकसानदेह होते हैं। ऐसा अस्वस्थ खाना खाने से भी शीतपित्त हो सकती है।

रोग का उपचार

 

शीतपित्त दो तरह की होती है। पहली तीक्ष्ण शीतपित्त और दूसरी चिरकालिक शीतपित्त। तीक्ष्ण शीतपित्त  8 घंटे से लेकर 6 सप्ताह के बीच ठीक हो जाती है। इसमें मरीज को एंटी-हिस्टामिन, दवाओं या इंजेक्शन के रूप में दिया जाता है। वहीं चिरकालिक शीतपित्त वो हैं जो 6 सप्ताह से ज्यादा समय तक शरीर पर बने रहते हैं। चिरकालिक शीतपित्त के कारण कई बार शारीरिक अपंगता भी हो सकती है। इसलिए इस रोग को डॉक्टर को समय से दिखाकर इलाज करवाएं। इसके अलावा तत्काल इलाज के तौर पर आप शीतपित्त में हल्दी, फिटकरी, चंदन और देसी घी लगा सकते हैं क्योंकि इन सभी में एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं।

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