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जीवन का कोई ख़ास मक़सद दे सकता है लंबी आयु!

लेटेस्ट By Rahul Sharma , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / May 16, 2014
जीवन का कोई ख़ास मक़सद दे सकता है लंबी आयु!

एक हालिया शोध से पता चलता है कि जीवन में कोई ख़ास मक़सद हो तो आप दूसरों के मुक़ाबले ज़्यादा सालों तक जी सकते हैं।

अमेरिका में हुए एक शोध के अनुसार वे लोग जिनके जीवन में कोई ख़ास मक़सद होता है वे दूसरों के मुक़ाबले अधिक सालों तक जीते हैं।

ख़ास मक़सद दे सकता है लंबी आयु

अमरीका के 7000 लोगों पर हुआ यह शोध बताता है कि जीवन में कुछ कर गुजरने का मक़सद समय से पहले होने वाली मृत्यु को भी टाल सकता है। शोध को करने वाले अमरीका और कनाडा के शोधकर्ताओं के अनुसार वे लोग जिनके जीवन में कुछ करने जज्बा होता है, वह अपनी सेहत के प्रति ज़्यादा जागरूक और सतर्क रहते हैं।

 

 

शोध में अमरीका के 20 से 75 आयु वर्ग के लोगों को शामिल कर उनकी शारीरिक और मानसिक सेहत का अध्ययन किया गया। शोध में शामिन इन लोगों के जीवन के मक़सद और उम्र में संबंध का पता लगाने के लिए के लिए शोधकर्ताओं ने उनके सामने तीन बयान रखे और देखा की कौन उनके कितना नज़दीक है।

 

 

  • कुछ लोग निरर्थक पूरा जीवन गुजार देते हैं, मगर मैं उनमें से नहीं हूं।
  • मैं आज में जीता हूं, और आने वाले कल के बारे में कम सोचता हूं।
  • मुझे लगता है कि मैं वो सब कुछ कर चुका हूं जो मुझे अपने जीवन में करना था।

 

 


14 सालों तक चले इस शोध में पाया गया कि जिन लोगों के जीवन में एक मक़सद था वे शोध में शामिल अन्य साथियों के मुक़ाबले ज्यादा दिन जिए। यही नहीं, खराब मूड और तनाव जैसी अन्य परेशानियों का सामना करने में भी वे ज़्यादा सक्षम और सफल रहे।

 

गौरतलब है कि जापान से लेकर अमरीका तक, कई देशों की संस्कृति में ज़्यादा उम्र में सेहतमंद ज़िंदगी का संबंध उद्देश्यपूर्ण रहन-सहन से रहा है। लेकिन अब तक यह माना जाता था कि लक्ष्यपूर्ण जीवन युवाओं के मुक़ाबले उम्रदराज वयस्कों के लिए अधिक फ़ायदेमंद होता है।

 

 

लेकिन इस शोध के अंत में एक विशेष बात यह पता चली कि किसी व्यक्ति की लंबी आयु का संबंध न तो बढ़ती आयु से है और न ही इस बात से कि वो नौकरी से सेवानिवृत्त हो चुका है, या नहीं। शोधकर्ताओं के अनुसार यदि इस बात को  दूसरे शब्दों में कहें तो एक अर्थपूर्ण जीवन लंबी उम्र के लिए वरदान है।

 

कनाडा स्थित कारलेटन यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक डॉक्टर पैट्रिक हिल ने यूनिवर्सिटी ऑफ़ रोचेस्टर मेडिकल सेंटर के अपने सहयोगी निकोलस टुरियानो के साथ यह अध्ययन किया।

 

 

Source: BBC, Dailymail

 

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