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ज्यादा शरारती बच्चे हो सकते हैं एडीएचडी के शिकार, जानें लक्षण और बचाव

परवरिश के तरीके By Rashmi Upadhyay , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Aug 22, 2018
ज्यादा शरारती बच्चे हो सकते हैं एडीएचडी के शिकार, जानें लक्षण और बचाव

बच्चों का शरारती होना स्वाभाविक है, पर जरूरत से ज्यादा उछल-कूद मचाना और कुछ मिनटों के लिए भी ध्यान केंद्रित न पाना एडीएचडी यानी अटेंशन डेफिसिट हाइपर एक्टिविटी डिसॉर्डर का लक्षण हो सकता है। 

बच्चों का शरारती होना स्वाभाविक है, पर जरूरत से ज्यादा उछल-कूद मचाना और कुछ मिनटों के लिए भी ध्यान केंद्रित न पाना एडीएचडी यानी अटेंशन डेफिसिट हाइपर एक्टिविटी डिसॉर्डर का लक्षण हो सकता है। ऐसी स्थिति मेें सही समय पर उपचार बेहद जरूरी है। हम अपने बच्चों की शारीरिक सेहत का तो पूरा ध्यान रखते हैं, पर दिमाग? जब तक कोई बड़ी समस्या न हो इस ओर किसी का ध्यान भी नहीं जाता। एडीएचडी एक ऐसी ही समस्या है, जिसके शुरुआती लक्षणों को ज्यादातर पेरेंट्स पहचान नहीं पाते।

क्या है मर्ज

बच्चे हैं तो शरारत करेंगे ही, यही सोच कर ज्यादातर पेरेंट्स इस समस्या के लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं। बाद में जब वे पढ़ाई और एक्टिविटीज में बुरी तरह पिछडऩे लगते हैं तो पेरेंट्स इसे लापरवाही का नतीजा मानकर बच्चे को ही कोसने लगते हैं। यह जरूरी नहीं कि सिर्फ लापरवाही की वजह से ही बच्चा पढ़ाई में पिछड़ रहा हो। एडीएचडी यानी अटेंशन डेफिसिट हाइपर एक्टिविटी डिसॉर्डंर की वजह से भी ऐसा हो सकता है। एसोचैम द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार लगभग पांच प्रतिशत स्कूली बच्चों में इसके लक्षण पाए जाते हैं, पर पेरेंट्स और टीचर्स इस समस्या को पहचान नहीं पाते। सही समय पर लक्षणों को पहचान कर उनका उपचार बेहद जरूरी है, अन्यथा इसकी वजह से बच्चे को ताउम परेशानियां झेलनी पड़ सकती हैं। जिन बच्चों को सही समय पर उपचार नहीं मिल पाता, उनमें बड़े होने के बाद भी यह समस्या बनी रहती है। कई बार लोग यह जान भी नहीं पाते कि वे इससे प्रभावित हैं। एडीएचडी से पीडि़त लोगों के लिए अपनी सामान्य दिनचर्या से जुड़े कार्यों को सही समय पर पूरा करना बेहद मुश्किल होता है।

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स्कूली जीवन में ऐसे लोग प्राय: कमजोर छात्र होते हैं और बड़े होने के बाद भी हमेशा बेचैनी के शिकार रहते हैं। बचपन में सही उपचार न मिलने से कुछ लोगों के व्यक्तित्व में स्थायी रूप से नकारात्मकता आ जाती है, जिससे जीवन के हर मोर्चे पर नाकामी की आशंका बनी रहती है। ऐसी परेशानियों से बचने के लिए सही समय पर इसके लक्षणों को पहचानना बेहद जरूरी है।

समस्या की जड़ें

एडीएचडी के संभावित कारणों को लेकर अभी तक वैज्ञानिक किसी निश्चित नतीजे पर नहीं पहुंच पाए हैं, फिर भी ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि आनुवंशिकता इसकी प्रमुख वजह है। गर्भावस्था में सिगरेट या एल्कोहॉल का सेवन करने वाली स्त्रियों के बच्चों में एडीएचडी की आशंका अधिक होती है। अगर लगातार मिलावटी खाद्य पदार्थों का सेवन किया जाए तो उसमें मौजूद लेड की वजह से भी यह समस्या हो सकती है। डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों में मौजूद प्रिजर्वेटिव भी इसके लिए जिम्मेदार माने जाते हैं। ब्रेन में मौजूद केमिकल्स में असंतुलन होने पर भी बच्चों में एडीएचडी के लक्षण नजर आते हैं। अगर मस्तिष्क में एकाग्रता को नियंत्रित करने वाले हिस्से की सक्रियता में कमी हो तब भी बच्चों को यह समस्या होती है। सिर के सामने वाले हिस्से को फ्रंटल लोब कहा जाता है। अगर इस हिस्से में अंदरूनी चोट लग जाए तब भी भावनाओं को नियंत्रित करने में समस्या आती है। प्रीमच्योर और बहुत कम वजन (1.5 किलोग्राम से कम) के साथ पैदा होने वाले बच्चों को भी यह समस्या हो सकती है।

प्रमुख लक्षण

एडीएचडी के लक्षणों को इसके नाम के अनुरूप दो हिस्सों में बांटा जा सकता है-पहला हाइपरएक्टिविटी यानी अति चंचलता और दूसरा अटेंशन डेफिसिट यानी ध्यान केंद्रित न होना। कुछ बच्चे बहुत ज्यादा चंचल होते हैं, पर उन्हें एकाग्रता से जुड़ी कोई समस्या नहीं होती। उसी तरह कुछ बच्चों का व्यवहार तो संतुलित होता है, लेकिन किसी भी काम में वे अपना ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते। इसके अलावा कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं, जिनमें दोनों समस्याएं होती हैं। अगर बच्चे के व्यवहार में यहां दिए गए लक्षण नजर आएं तो समझें कि उसे एडीएचडी की समस्या है :

  • ऐसे बच्चों को देखकर ऐसा लगता है कि इनके भीतर कभी न रुकने वाली कोई डिवाइस फिट कर दी हो। ये पल भर के लिए भी स्थिर नहीं बैठ पाते।
  • बिना रुके लगातार व अधिक बोलना।
  • बेवजह उछल-कूद, अपनी जगह से उठकर इधर-उधर घूमना।
  • बहुत जल्दी ध्यान भटकना, एक काम को बीच में छोड़कर दूसरा शुरू कर देना, भूृलना, किसी भी कार्य को सही ढंग से न कर पाना।
  • मनपसंद कार्यों को भी कुछ ही मिनटों में अधूरा छोड़ देना।
  • होमवर्क और अन्य कार्यों को सही समय पर पूरा न कर पाना। अपने खिलौने, कॉपी, पेन-पेंसिल आदि बार-बार खो देना।
  • दूसरों की बातें को ध्यान से न सुनना, एकाग्रता से जुड़ा कोई भी कार्य देर तक न कर पाना।
  • ज्यादा अधीर होना, पूरा सवाल सुने बिना ही जवाब देना, दूसरों की बातचीत के बीच में बोल पडऩा।
  • हर बात पर चिल्लाना, झगडऩा, रोना या बेवजह हंसना।
  • बिना सोचे-समझे कोई भी काम करना, अपनी बारी की प्रतीक्षा न कर पाना और दोस्तों से झगडऩा।
  • ऐसे बच्चे अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना सीख नहीं पाते।

उपचार एवं बचाव

चार साल की उम्र के बाद बच्चों में इस समस्या के लक्षण नजर आने लगते हैं। अगर आपके बच्चे में यहां बताए गए लक्षण नजर आएं तो बिना घबराए पहले उसके स्कूल काउंसलर से सलाह लें। इस समस्या की जांच के लिए एक प्रश्नावली आती है, जिसमें कुछ कॉलम अभिभावकों के लिए होते हैं और कुछ टीचर्स के लिए। इस प्रश्नावली को भरने के बाद उसे स्कूल काउंसलर या किसी चाइल्ड काउंसलर को दिखा कर सलाह ली जाती है। अगर बच्चे को एडीएचडी की समस्या होगी तो उसके व्यवहार को लेकर टीचर और पेरेंट्स के जवाबों में काफी समानता होगी। ऐसे बच्चे को काउंसलिंग के जरिये अपनी निराशाओं से उबरना सिखाया जाता है। साथ ही उनका आत्मविश्वास बढ़ाने की कोशिश की जाती है। परिवार के सदस्यों को भी काउंसलिंग दी जाती है।

पीडि़त बच्चे को होमवर्क या स्कूल के दूसरे प्रैक्टिकल कार्यों के लिए सहायता उपलब्ध कराई जाती है। ऐसे बच्चों को गुस्से पर नियंत्रण रखना, हर कार्य को सोच-समझकर करना, अपनी बारी की प्रतीक्षा करना, दूसरों की सहायता करना और दूसरों के व्यवहार पर सही प्रतिक्रिया देना भी सिखाया जाता है। डांस थेरेपी के जरिये ऐसे बच्चे दूसरों के साथ घूमने-मिलने के अलावा अपनी शारीरिक गतिविधियों पर नियंत्रण रखना भी सीखते हैं। प्ले थेरेपी के माध्यम से पीडि़त बच्चे को दूसरे बच्चों के साथ खेलने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। काउंसलर माता-पिता को ऐसे बच्चे के साथ आउटडोर गेम्स खेलने देने के लिए प्रेरित करते हैं, जिसका बहुत सकारात्मकपरिणाम जल्द ही नजर आने लगता है।

क्या करें पेरेंट्स

  • एडीएचडी की वजह से बच्चे के ब्रेन में केमिकल्स का असंतुलन हो जाता है, जिससे वह अपने किसी भी व्यवहार पर काबू नहीं रख पाता। ऐसे बच्चों के माता-पिता के लिए धैर्य रखना बहुत जरूरी है। अगर ऐसी समस्या हो तो पेरेंट्स इन बातों का विशेष रूप से ध्यान रखें :
  • बच्चे की दिनचर्या निर्धारित करें और उसे उसका पालन करने के लिए पे्रेरित करें।
  • कोई भी अच्छा काम करने पर उसकी प्रशंसा करें।
  • स्कूल में अच्छे प्रदर्शन के लिए उस पर दबाव न बनाएं।
  • क्लास टीचर से बच्चे के बारे में खुलकर बात करें। उनसे अनुरोध करें कि क्लास रूम में वे बच्चे को खिड़की के पास न बिठाएं।
  • अगर उससे कोई गलती हो जाए तो सबके सामने डांटने के बजाय उसे अलग से समझाएं।
  • बच्चे की काउंसलिंग या उपचार को बीच में अधूरा न छोड़ें। गंभीर स्थिति में दवाओं की भी जरूरत पड़ सकती है। कुछ अभिभावक साइड इफेक्ट के डर से बच्चे को दवा नहीं देते, पर ऐसा न करें इससे उसे और ज्य़ादा नुकसान हो सकता है।
  • अगर ऐसे बच्चों को सही समय पर उपचार मिले तो बड़े होने के बाद ये सफल और सामान्य जीवन व्यतीत करते हैं।

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