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शोधकर्ताओं ने इस प्रेग्नेंसी डिसऑडर को पता लगाने का ढ़ूंढ़ा उपाय, जानें क्या है ये बीमारी

लेटेस्ट By पल्‍लवी कुमारी , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Oct 23, 2019
शोधकर्ताओं ने इस प्रेग्नेंसी डिसऑडर को पता लगाने का ढ़ूंढ़ा उपाय, जानें क्या है ये बीमारी

शोधकर्ताओं ने प्री-एक्लेमप्सिया की भविष्यवाणी करने के लिए एक सरल, कम लागत वाला तरीका विकसित किया है। यह एक ब्लड-टेस्ट की तरह ही है, पर इससे गर्भवती महिलाओं में प्री-एक्लेमप्सिया बीमारी के शरुआती लक्षणों को पता चल सकता है। 

प्री-एक्लेमप्सिया दुनिया भर में मातृ-भ्रूण मृत्यु दर के प्रमुख कारणों में से एक है। प्री-एक्लेमप्सिया गर्भवती महिलाओं में पाई जाने वाली बीमारी है, जो तब होती है जब प्लेसेंटा (गर्भाशय में स्थित भ्रूण के शरीर में माता के रक्त का पोषण पहुँचता रहता है और जिससे भ्रूण का विकास होता है) सही ढंग से काम नहीं करती। प्री-एक्लेमप्सिया प्लेसेंटा में ब्लड सर्कुलेशन को कम कर देता है। इसका मतलब ये है कि आपके गर्भ में पल रहे आपके बच्चे को ऑक्सीजन और पोषक तत्व नहीं पहुंच पाएगा, जिससे उसका विकास बाधित हो सकता है। वहीं अब शोधकर्ताओं ने प्री-एक्लेमप्सिया को पहले ही जांच करके, इलाज करेन के लिए एक सरल, कम लागत वाला तरीका विकसित कर लिया गया है। बता दें कि प्री-एक्लेमप्सिया आमतौर पर गर्भावस्था का आधा चरण पार कर लेने के बाद या फिर शिशु के जन्म के कुछ ही समय बाद होता है। इस तरह इस बीमारी का पता चलने में काफी देरी हो जाती है। भारत की बात करें तो भारत में 8 से 10 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं हर साल इस बीमारी से प्रभावित होती हैं।

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ऑस्ट्रेलिया के एडिथ कोवान विश्वविद्यालय के अध्ययन में शोधकर्ता एनोच एंटो की मानें तो "विकासशील देशों में, प्री-एक्लेमप्सिया माओं और शिशुओं दोनों के लिए मृत्यु का एक प्रमुख कारण है। लेकिन एनोच एंटो का कहना है कि अब दवा का उपयोग करके इसका इलाज किया जा सकता है। दरअसल मैग्नीशियम और कैल्शियम दोनों के लिए ब्लड टेस्ट कर के इस बीमारी का पता लगाया जा सकता है। इस तरह दवाओं के मदद से प्लेसेंटा में रक्तचाप को कम करने में कामियाब मिल सकती है। शोधकर्ताओं की मानें तो यह टेस्ट के मुकाबले एक दर्जे ऊपर है, जिससे मां विकसित हो रही इस बीमारी का पता आसानी से चल सकता है। 

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ईपीएमए जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के लिए, शोधकर्ताओं ने 500 से अधिक गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य की स्थिति का आकलन किया और उप-स्वास्थ्य संबंधी प्रश्नावली को भरवाया। इस दौरान शोधकर्ताओं ने 61 प्रतिशत महिलाओं में प्री-एक्लेमप्सिया विकसित होने का लक्षण पाया। जिसमें ज्यादातर को थकान, दिल की सेहत, पाचन और मानसिक स्वास्थ्य से संबधी परेशानियां थी। जबकि केवल 17 प्रतिशत महिलाएं स्वस्थ्य थीं।जब इन परिणामों के हिसाब से इम महिलाओं का रक्त परीक्षण किया गया, तो पाया गया कि जिन महिलाओं में कैल्शियम और मैग्नीशियम के स्तर कम था, उनमें प्री-एक्लेमप्सिया के लक्षण ज्यादा थे। इस तरह शोधकर्ता लगभग 80 प्रतिशत मामलों में प्री-एक्लेमप्सियाने के प्रारंभिक विकास की सटीक भविष्यवाणी करने में सक्षम रहे।

शोधकर्ताओं के अनुसार, प्री-एक्लेमप्सिया को इस तरह से शुरुआती चरण में ही पहचान लेने से इसका इलाज किया जा सकता है। इस तरह हर साल हजारों मांआ और उनके शिशुओं की जान बचाई जा सकती है।एंटो के अनुसार विकासशील देशों में प्री-एक्लेमप्सिया की बामारी सबसे अधिक गति से बढ़ रही है। बहुत सी महिलाएं जिन्हें प्री-एक्लेमप्सिया होता है, उन्हें इसके बारे में पता ही नहीं चलता। यह नियमित डॉक्टरी जांच के दौरान पकड़ में आता है। ऐसा इसलिए क्योंकि प्री-एक्लेमप्सिया के दो सबसे आम लक्षणों को घर में पहचान पाना आसान नहीं हैं। 

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 प्री-एक्लेमप्सिया के लक्षण :

  • हाई ब्लड प्रेशर
  • पेशाब में प्रोटीन की मौजूदगी
  • तेज सिरदर्द
  • दृष्टि से जुड़ी समस्या जैसे धुंधला दिखना 
  • पसलियों के ठीक नीचे तेज दर्द
  • मिचली या उल्टी
  • बहुत ज्यादा एसिडिटी व सीने में जलन (हार्टबर्न)

हालांकि यह सभी लक्षण गर्भवती महिलाओं में आम हैं पर इन लक्षणों के बढ़ जाने को आम न समझें। इसके लिए जरूरी है कि गर्भावस्था के दौरान आप लगातार डॉक्टरी चेकअप और मैग्नीशियम और कैल्शियम दोनों के लिए ब्लड टेस्ट जरूर करवाते रहें। ये टेस्ट अक्सर एहतियातन कराए जाते हैं पर इससे आप और आपके होने वाले बच्चे की जान बच सकती है।

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