WHO की रिपोर्ट के अनुसार 'बहरापन' 2050 तक दुनिया की बड़ी समस्या होगी, जानें आपके लिए मनोचिकित्सक के कुछ सुझाव

Updated at: Mar 03, 2021
WHO की रिपोर्ट के अनुसार 'बहरापन' 2050 तक दुनिया की बड़ी समस्या होगी, जानें आपके लिए मनोचिकित्सक के कुछ सुझाव

विश्व श्रवण दिवस पर मनोचिकत्सक ने कहा, अगर आपको अपने आसपास कोई बहरा बच्चा दिखाई देता है तो उसका मजाक मत बनाइए उसे सम्मान दीजिए।

Meena Prajapati
विविधWritten by: Meena PrajapatiPublished at: Mar 03, 2021

जयपुर में एक ऐसा रेस्तरां है जहां सारा स्टाफ सुन और बोल (deaf and dumb) नहीं सकता है। यहां काम कर चुके इनायत अली एक ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने ऑस्ट्रेलिया में हुए स्पेशल ओलंपिक्स में गोल्ड मेडल जीता। तो वहीं, काम कर रहीं निम्मी के माता-पिता का बचपन में ही एक कार एक्सीडेंट में निधन हो गया। जिसके बाद उनके रिश्तेदारों ने उनकी परवरिश की। बहरेपन के ये तो कुछ मामले हैं। लेकिन दुनिया भर में ऐसे अनगिनत लोग हैं जो हेयरिंग लॉस की प्रॉबल्म को झेल रहे हैं। तो वहीं, 3 मार्च को वर्ल्ड हियरिंग डे (World hearing day) पर जारी हुई विश्व स्वास्थ्य संगठन (World health organization) की रिपोर्ट के मुताबिक 2050 तक हर 4 में से 1 व्यक्ति हेयरिंग प्रॉब्लम को झेलेगा। यह कोई नजरअंदाज कर देनी वाली पेरशानी नहीं है। बदलता लाइफस्टाइल बहरेपन की समस्या का सबसे बड़ा कारण बन सकता है। समस्या यह है कि ऐसे बच्चे जो हेयरिंग लॉस की दिक्कत को झेल रहे हैं उन्हें हम मनुष्य समझने के बजाए मजाक का हिस्सा बना लेते हैं। जबकि ऐसे बच्चों को समाज की बहुत जरूरत होती है।

मूक फ्रस्ट्रेशन में गुजरती है बहरे लोगों की जिंदगी

विट्ठल्स किचन की शुरूआत करने वाले आशीष शर्मा का कहना है कि जिन बच्चों को हेयरिंग प्रॉब्लम होती है, वे साइन लैंग्वेज में बात करते हैं, दुख की बात यह है कि ज्यादातर आबादी को साइन लैंग्वेज आती नहीं है। ऐसे में इन बच्चों को अपनी बात कम्युनिकेट करने में दिक्कत होती है। और इनकी जिंदगी एक मूक फ्रस्ट्रेशन में गुजरने लगती है। तो वहीं राह चलते लोग अगर इन्हें साइन लैंग्वेज में बात करते देखते हैं तो उनका मजाक बनाते हैं। इन्हीं सब परेशानियों को देखते हुए आशीष शर्मा ने विट्ठल्स किचन की शुरूआत की थी।

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बहरेपन के कारण

  • कान की समस्या को नजरअंदाज करना
  • विशेषज्ञों को कमी
  • उचित जानकारी की कमी
  • ध्वनि प्रदूषण
  • किसी तरह का संक्रमण या जन्म से ही बहरापन
  • बदलता लाइफस्टाइल

क्या होता अगर सारी दुनिया बहरी होती?

विट्ठल्स किचन के आशीष शर्मा का कहना है कि अगर सारी दुनिया ही बहरी होती तो क्या होता। सभी लोग साइन लैंग्वेज में बात करते। तो ऐसे बच्चे जो किसी वजह से बहरे हो गए हैं, उनके लिए भी एक लोकतंत्र होता। विठल्स किचन की खासियत यह है कि यहां जो कर्मचारी काम करते हैं वे सभी को साइन लैंग्वेज भी सिखाते हैं। कस्टमर को खाना कैसा लगा, इसका फीडबैक लेते हैं। फीडबैक लेते समय वे कस्टमर को हेलो, उनका नाम, शुक्रिया, वेलकम जैसे शब्दों को साइन लैंग्वेज में सिखाते हैं। ये उन कर्मचारियों की तरफ से शुरूआत है साइन लैंग्वेज सिखाने की और खुद के लिए एक बेहतर दुनिया बनाने की।

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मनोचिकित्सक के सुझाव 

भोपाल के बंसल अस्पताल में कंसल्टेंट मनोचिकत्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी  ने समाज को कुछ ऐसे सुझाव दिेए हैं, बहुत काम के हैं। उन्होंने  कहा कि अगर आपके घर में भी ऐसा बच्चा पैदा हो गया है जो जन्म से ही बहरा है जो उसे अजूबा न मानें। बच्चे को कंफर्टेबल माहौल दें। डॉ. त्रिवेदी का कहना है कि हमारे समाज में कई तरह की दिव्यांगता है, लेकिन उस दिव्यांगता को हम दया कि नजर से देखते हैं। लेकिन बहरेपन की समस्या को हास्य का पात्र बनाया जाता है। जबकि होना यह चाहिए कि ऐसे लोगों को या बच्चों को समाज को पहले एक मनुष्य समझना चाहिए। उन बच्चों का मजाक बनाने से या बुलिंग करने से उनकी परेशान ठीक नहीं हो जाएगी। 

मनोचिक्तसक ने कहा कि हियरिंग प्रॉब्लम को ठीक करने के लिए पहले ही सरकारें बहुत अच्छा काम कर रही हैं। नई तकनीक लेकर आ रही हैं। उन्होंने कहा कि जिन घरों में किसी सदस्य को हेयरिंग लॉस की दिक्कत है। उनके परिजनों को यह सोचना चाहिेए हमारे पास जो उपलब्ध संसाधन हैं हमें उन्हीं में गुजारा करना है। मन में ऐसा भाव लाएं कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा। 

उन्होंने कहा कि पास का जो भी अस्पताल है वहां जाकर बच्चे की हियरिंग प्रॉब्लम को ठीक करवाएं। उसे हिकारत की नजर से देखने से वह ठीक नहीं हो जाएगा। यह आपका ही बच्चा है, ऐसा सोचना चाहिए। डॉ.त्रिवेदी ने कहा कि जिसकी  श्रवण शक्ति कमजोर है अगर उसका मजाक बनाएंगे तो कहीं न कहीं उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाएंगे तो वह कुंठा का शिकार होगा। अगर यह मजाक किसी बच्चे के साथ किया जा रहा है तो  बच्चों के लिए यह शारीरिक विकास का समय होता है उसके लिए उसका मजाक बनाना उसका नकारात्मक व्यक्तित्व का निर्माण कर सकता है। वह व्यक्ति पहले ही अपनी जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहा है दूसरा प्रकृति ने उसे बहरा कर दिया। बाकी समस्याएं समाज ने उसे दे दीं। समाज का यह रवैया कहीं न कहीं यह क्रूरता है। यह अमानवीयता है। ऐसे बच्चों की अच्छी परवरिश कीजिए। उसके लिए अगर कुछ नहीं कर सकते तो उसे सम्मान तो दें।

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विट्ठल्स किचन के आशीष शर्मा ने बताया कि जो गूंगे बहरे होते हैं उनके माता-पिता भी उनकी अच्छा परवरिश नहीं करते हैं। जितना वे अपने बाकी बच्चों को केयर करते हैं उतना किसी बहरे बच्चे की नहीं। इस तरह की समस्याओं को लेकर मनोचिकत्सक सत्यकांत द्विवेदी का कहना है कि इसमें माता-पिता की गलती नहीं है। क्योंकि उनके लिए भी यह परेशानी मेंटल स्ट्रेस को बढ़ाने वाली होती है। ऐसे माता-पिता के लिए बहुत सारे सपोर्ट ग्रूप बनाए जाने चाहिए। ताकि माता-पिता भी खुद को अकेला न समझें। माता-पिता को समझ आए कि हमारे बच्चे जैसे कई और बच्चे हैं। माता पिता की मेंटल हेल्थ पर ध्यान देना चाहिए। पैरेंटिंग के लिए ग्रूप होने चाहिए। इसके लिए सरकारें, एनजीओ काम कर सकते हैं। इसके अलावा माता-पिता घर में श्रम का विभाजन कर सकते हैं। कभी मां बच्चे की केयर करे तो कभी पिता।

 

हियरिंग लॉस से जूझ रहे बच्चों के लिए मनोचिकित्सक के टिप्स

डॉ. त्रिवेदी ने कहा कि ऐसे बच्चे जो हेयरिंग लॉस की परेशानियों से जूझ रहे हैं वे अपने मन में खुद को लेकर किसी तरह की हिकारत की भावना लेकर न आएं। बल्कि यह सोचें कि बहुत सारे लोगों को जीवन नहीं मिलता। आपको जीवन मिला। ऐसा नहीं है कि आप अकेले हैं जिनके पास समस्याएं हैं। हर इंसान के पास परेशानियां हैं। सभी परेशान हैं। बस आपकी समस्या का टाइप अलग है। 

डॉ.त्रिवेदी ने कहा कि उन बच्चों के पास जो बहरेपन की जो डिसएबिलिटी है वह उन्होंने नहीं चुनी है। इसलिए उसके बारे में बच्चे न सोचें। वे अपने भविष्य को संवारने में खुद की मदद करें। दूसरा समाज को ऐसे लोगों के साथ मनुष्यता का भाव दिखाना चाहिए न कि उन्हें हंसी का पात्र बनाना चाहिए। 

आज सरकारें, संस्थाएं, विश्व स्वास्थ्य संगठन सभी बहरेपन की समस्या को लेकर सतर्क हुए हैं। अगर किसी को जागरुक होने की जरूरत है तो वह है हमारे समाज के लोग। जो आए दिन गूंगे बहरे बच्चों को मजाक बनाते हैं। जिस घर में ऐसा बच्चा पैदा हो जाए तो उसके पैदा होने पर कोई गीत नहीं गाए जाते या पार्टी नहीं दी जाती। अस्पतालों के चक्कर लगाने में भी दिक्कत होती है। पर ऐसे परिवारों को यह समझना चाहिए कि कई मामलों बहरापन कोई चुनी पेरशानी नहीं है, यह प्रकृति की देन है।

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