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    गर्भधारण ना होने के पीछे ये है कारण, आज ही करें समाधान

    गर्भावस्‍था By Rashmi Upadhyay , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Dec 21, 2017
    गर्भधारण ना होने के पीछे ये है कारण, आज ही करें समाधान

    एंटी मुलेरियन हार्मोन (एएमएच) महिलाओं के शरीर में पाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण हार्मोन है। 

    एंटी मुलेरियन हार्मोन (एएमएच) महिलाओं के शरीर में पाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण हार्मोन है। गर्भधारण में आने वाली दिक्कतें ज्यादातर इसी हार्मोन के असंतुलन से उत्पन्न होती हैं। इस असतुलन को कैसे दूर किया जाए..? गर्भधारण करने, भ्रूण को पूरी तरह विकसित करने और एक स्वस्थ बच्चे को जन्म देने के लिए शरीर में एएमएच हार्मोन का संतुलन बेहद जरूरी है। हार्र्मोस के असंतुलन की समस्या बढ़ती उम्र के साथ बढ़ती है। हार्मोन के असंतुलन का एक प्रमुख कारण आपकी जीवन-शैली है। अगर आप अस्वास्थ्यकर जीवन-शैली पर अमल कर रही हैं, तो यह असंतुलन उत्पन्न होने का खतरा बढ़ जाता है। 

    क्या है एएमएच

    एएमएच एक ऐसा हार्मोन है, जो विकसित होते एग फॉलिकल्स में छिपा होता है। महिलाओं के रक्त में एएमएच का स्तर आमतौर पर उनके अच्छे ओवेरियन रिजर्व यानी अंडाशय के द्वारा पर्याप्त मात्रा में निषेचित होने लायक एग सेल्स मुहैया कराने का संकेत होता है। एएमएच टेस्ट अंडाशय की कार्यप्रणाली को अच्छी तरह से समझने और मैनोपॉज(रजोनिवृत्ति) की संभावित शुरुआत का अंदाजा लगाने में भी कारगर साबित होता है।

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    महिलाओं में आमतौर पर मैनोपॉज 45 साल की उम्र के आस-पास होता है, मगर शहरी इलाकों में तेजी से बदलती लाइफस्टाइल के बीच आजकल ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जिनमें महिलाओं का ओवेरियन रिजर्व समय से पहले ही घटने या कम होने लगता है। ऐसी महिलाओं को भी एएएमएच टेस्ट कराने के लिए कहा जाता है, जो आईवीएफ या इसके जैसी अन्य तकनीकों के जरिए फिर से गर्भधारण करने की प्रक्रिया से गुजर रही हों। एएमएच का घटता स्तर अंडाशय के कमजोर रिस्पॉन्स और अंडों की घटती संख्या को भी दर्शाता है। गहन जांच के लिए अन्य हार्मोनल टेस्ट के साथ-साथ एएमएच टेस्ट कराना भी जरूरी होता है, ताकि अंडाशय में फॉलिकल्स की सही तादाद का पता लगाया जा सके।

    एएमएच टेस्ट के फायदे

    एएमएच के जरिए अंडाशय की कार्यप्रणाली के बारे में कई नई जानकारियां भी सामने आ रही हैं। एएमएच बहुत छोटे विकसित होते फॉलिकल्स के जरिए प्रोड्यूज किया जाता है। जन्म से लेकर मैनोपॉज तक किसी भी अवस्था के दौरान एएमएच के स्तर की जांच की जा सकती है। खासतौर से 20 से 25 साल की उम्र के दौरान, जब यह हार्मोन बहुत ज्यादा प्रवाहित होता है। इस टेस्ट के जरिए अंडाशय में अंडों के उत्सर्जन की वास्तविक स्थिति का पता लगाया जा सके और यह तय किया जा सके कि आगे चलकर गर्भधारण करने में किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

    डॉ.निताशा गुप्ता

    गाइनोकोलॉजिस्ट, आईवीएफ एक्सपर्ट

    नई दिल्ली

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