पत्नी के प्रेंग्नेंट होने पर पुरुषों को अनुभव होते हैं गर्भावस्था के कुछ खास लक्षण, जानें क्या है ये सिंड्रोम

Updated at: Mar 18, 2020
पत्नी के प्रेंग्नेंट होने पर पुरुषों को अनुभव होते हैं गर्भावस्था के कुछ खास लक्षण, जानें क्या है ये सिंड्रोम

कौवेड सिंड्रोम, जिसे सहानुभूति गर्भावस्था भी कहा जाता है, एक वो स्थिति है, जिसमें एक साथी एक समान मां के रूप में कुछ समान लक्षणों का अनुभव करता है। 

Pallavi Kumari
पुरुष स्वास्थ्यWritten by: Pallavi KumariPublished at: Mar 18, 2020

मां-बाप बनाना किसी भी जोड़े के लिए जीवन की सबसे सुखद स्थिति होती है। प्रेग्नेंसी के दौरान सिर्फ एक महिला ही नहीं शारीरिक बदलावों से होकर गुजरती है, बल्कि पुरुषों पर भी पत्नी के प्रेग्नेंसी का असर होता है। प्रेग्नेंसी में स्वाभाविक रूप से, महिलाएं उन सभी स्थितियों से गुजर रही ही होती है, जिसे हम प्रेग्नेंसी के अलग-अलग फेज के लक्षणों के रूप में देखते हैं। जैसे कि मिसिंग पीरियड्स, कब्ज, सिरदर्द, ऐंठन, पेट फूलना, सांस लेने में परेशानी, बेचैनी, खराब नींद और बहुत कुछ। लेकिन, बहुत से पुरुष इस दौरान पत्नी के साथ ही कई चीजों को अनुभव कर रहे होते हैं, जिनका उनके शरीर पर भी असर नजर आता है। इसे कौवेड सिंड्रोम (Couvade Syndrome) के रूप में जाना जाता है। ये वो स्थिति है, जिसमें एक साथी एक समान मां के रूप में कुछ समान लक्षणों और व्यवहार का अनुभव करता है। जिसके कुछ खास लक्षणों में शामिल है वजन बढ़ना, हार्मोन के स्तर में लगातार बदलाव आना, सुबह की मिचली और नींद के पैटर्न में बदलाव से स्ट्रेस महसूस करना। 

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पुरुषों में कौवेड सिंड्रोम (Couvade Syndrome)

कौवेड सिंड्रोम (Couvade Syndrome) वह स्थिति है, जब होने वाला पिता मां के समान ही गर्भावस्था के लक्षणों का अनुभव कराता है। ये सुनने में अजीब हो सकता है पर पिता बनने की एंग्जायटी उन्हें परेशान करने लगती है। हालांकि इस पर किसी बड़े पैमाने पर और ठोस अनुभवजन्य शोध नहीं आए है, पर कुछ अध्ययनों से दुनिया के विभिन्न हिस्सों में पुरुषों के गर्भावस्था के लक्षणों के बारे में तथ्य और आंकड़े सुझाते हैं। इसके तरह एक पुरुष कई सारे उन्हीं लक्षणों को अनुभव कर सकते हैं, जो उनकी पत्नियों को प्रेग्नेंसी के दौरान महसूस हो रही हो। 

इस सिंड्रोम में शारीरिक और मनोवैज्ञानिक अभिव्यक्तियों सहित लक्षणों की एक विस्तृत श्रृंखला होती है। शारीरिक लक्षण जैसे कि मतली, नाराजगी, पेट में दर्द या सूजन, सांस लेने की समस्या, पैर में ऐंठन, पीठ में दर्द, जननांग जलन और अजीब तरह से दांत दर्द आदि भी शामिल हो सता है हैं। मनोवैज्ञानिक लक्षणों में कामेच्छा में कमी, बेचैनी, चिंता और अवसाद आदि शामिल हैं।

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कौवेड सिंड्रोम के लक्षण 

साथी के साथ मजबूत लगाव

जब एक आदमी अपने साथी के साथ बहुत जुड़ा होता है, तो गर्भावस्था की प्रक्रिया के साथ उसकी भागीदारी बढ़ जाती है। वह मां के गर्भ में बढ़ते बच्चे के दिल की धड़कन सुनकर आनंद उठाता है, उसे बच्चे की हलचल महसूस होती है। वह बच्चे के जन्म की तैयारियों में भाग लेता है, स्त्री रोग विशेषज्ञ से अपनी पत्नी और बच्चे की स्थिति की जांच के लिए बार-बार बात करता है, इत्यादि। आगे ये सभी न केवल मां-बाप के साथ, बल्कि अजन्मे बच्चे के साथ भी उसकी बॉन्डिंग को मजबूत करते हैं। पितृत्व की उनकी इस भूमिका का प्रभाव उन पर बहुत अधिक पड़ता है। यह सहानुभूति या सहानुभूति गर्भावस्था के लक्षणों में योगदान कर सकता है, जिस कौवेड सिंड्रोम के महत्वपूर्ण लक्षणों में भी देखा जाता है।

ईर्ष्या महसूस करना

गर्भधारण करने में असमर्थता के बारे में किसी व्यक्ति की ईर्ष्या हो सकती है। उसे लग सकता है कि उसकी पत्नी मां बन सकती है पर वो क्यों ये सब नहीं कर सकता है। इस दौरान मन में कई सारे मिक्यड फिलिंग्स आ सकते हैं, जो व्यक्ति को रह-रह कर परेशान कर सकते हैं।

अपराधबोध महसूस करना

एक पिता भी अपने गर्भवती साथी के शारीरिक और मनोवैज्ञानिक तनाव के लिए दोषी और जिम्मेदार महसूस कर सकता है। कौवेड सिंड्रोम की अभिव्यक्तियों में यह एक महत्वपूर्ण कारण हो सकता है। इस दौरान में कई चीजों को लेकर प्रश्न उठ सकते हैं। आपके साथी की परेशानी आपको परेशान कर सकती है। आपको लग सकती है कि आप उनके लिए क्यों कुछ नहीं कर पा रहे हैं। वहीं धीरे-धीरे ये बात बढ़ते हुए माह के साथ और बढ़ सकती है।

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हार्मोन के स्तर में परिवर्तन

कौवेड सिंड्रोम भी पुरुषों में हार्मोन के उतार-चढ़ाव के साथ कुछ संबंध रखता ,जिसमें उनके साथी की गर्भावस्था अवधि के दौरान अनिश्चित टेस्टोस्टेरोन का स्तर शामिल है। इस दौरान पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन का लेवल घटता-बढ़ता रह सकता है। इसलिए पुरुषों को इन चीजों का खास ख्याल रखना चाहिए और

कौवेड सिंड्रोम से निपटने का तरीका

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, कौवेड-संबंधी लक्षण ज्यादातर प्रसवोत्तर अवसाद के समान होते हैं, क्योंकि डैड-टू-बी विशेष रूप से पहली बार पिता बनने वाले पुरुषों के लिए और मॉम-टू-टू दोनों को समान तनावों का अनुभव होता है। इसलिए, उनके लिए अपने अनुभवों को एक दूसरे के साथ साझा करना चाहिए ताकि चीजें और आसान हो सके। अपनी पत्नी के साथ खुल कर बातचीत करने से व्यक्ति को सिंड्रोम के लक्षणों से निपटने में मदद मिल सकती है। यही बात महिलाओं पर भी लागू होती है। साथ ही सही खान-पान और संतुलित जीवन जीना भी पुरुषों को इस कौवेड सिंड्रोम से निपटने में मददगार साबित हो सकता है।

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