प्रेगनेंसी में एस्‍ट्रोजन हार्मोन की अधिकता के कारण हो सकता है फायब्रॉयड्स

Updated at: Oct 21, 2013
प्रेगनेंसी में एस्‍ट्रोजन हार्मोन की अधिकता के कारण हो सकता है फायब्रॉयड्स

फायब्रॉयड्स गर्भाशय मे बनने वाला ट्यूमर हैं। इस लेख में जानिए यह कितना खतरनाक है और कैसे इससे बचा जा सकता है।

Pooja Sinha
गर्भावस्‍था Written by: Pooja SinhaPublished at: Jul 25, 2012

प्रेगनेंसी में फायब्रॉयड्स के बारे मे जनाने से पहले यह जानना जरूरी है कि फायब्रॉयड्स होता क्या है। आइए हम आपको बताते है- फायब्रॉयड्स गर्भाशय में बनने वाला ट्यूमर हैं। जिन महिलाओं में एस्ट्रोसजन अधिक होता है उनमें फायब्रॉयड्स होने का खतरा ज्यादा होता है।

faybroids in pregnancyफायब्रॉयड्स की गांठें आमतौर पर 35 से 50 की आयु की बीच में होती है। फायब्रॉयड्स क्यों होते हैं इसके कारणों का सही रूप से पता नही चल पाया है पर माना जाता है कि हॉर्मोनल बदलावों के कारण, आनुवंशिक और ओवरवेट या ओबेसिटी से पीडि़त महिलाएं में पाया जाता हैं।

 

प्रेग्नेंसी और फायब्रॉयड्स

अगर प्रेग्नेंसी के दौरान फायब्रॉयड्स हो जाए तो मिसकैरेज या प्रीमेच्योर लेबर-पेन हो सकता हैं। फायब्रॉयड्स अलग-अलग आकार के होते हैं। ये छोटे भी हो सकते हैं और बड़े भी हो सकते हैं। यूट्रस में कई बार कोई फायब्रॉयड छोटा सा होता है, लेकिन प्रेग्नेंसी के दौरान यह भी गर्भ की तरह ही बढने लगता है। प्रेग्नेंसी की शुरुआत में इसकी ग्रोथ ज्यादा तेजी से होती है। इसके ब्लैडर पर दबाव बनाने से यूरिनेशन में समस्या आती है और रक्त-नलिकाओं पर दबाव बनाने से पैरों में सूजन आती है।

प्रेगनेंसी में फायब्रॉयड्स होने पर सावधानियां

प्रेग्नेंसी की शुरुआत में इसकी ग्रोथ ज्यादा तेजी से होती है। साथ ही इसमें बहुत दर्द और ब्लीडिंग होती है, कई बार तो दर्द और ब्लीडिंग इतनी ज्यादा होती है कि अस्पताल में जाना पड सकता है। वैसे तो आजकल डॉक्टर्स अल्ट्रासाउंड के जरिये भ्रूण और फायब्रॉयड्स के विकास की पूरी प्रक्रिया को देख सकते है लेकिन फिर भी फायब्रॉयड्स होने पर प्रेग्नेंसी के दौरान यह ध्यान रखना चाहिए।

  • यूटरस में फायब्रॉयड्स के साथ भ्रूण भी बचा रहे और बढता रहे।
  • फायब्रॉयड्स सर्विक्स की साइड में या लोअर साइड में हों तो बर्थ कैनाल ब्लॉक हो जाती है और नॉर्मल डिलिवरी नहीं हो सकती। तब सिजेरियन करवायें।
  • ध्यान रखें क्योंकि फायब्रॉयड्स से लेबर पेन जल्दी हो सकता है और प्रीमेच्योर डिलिवरी की संभावना रहती है।
  • रेड डीजेनरेशन, यह ऐसी अवस्था है जिसमें प्रेग्नेंसी के बीच के तीन महीनों में फायब्रॉयड्स के बीच में ब्लीडिंग होने लगती है। इसमें महिला को बहुत दर्द होता है।

 

फायब्रॉयड्स से घबराए नहीं

  • प्रेग्नेंसी के दौरान स्त्री के हॉर्मोस में परिवर्तन के कारण फायब्रॉयड्स भी बढ़ते हैं, ज्यादातर लोग ऐसा सोचते हैं लेकिन सभी के साथ ऐसा नही होता। अगर फायब्रॉयड्स बढ़ता भी है तो डिलिवरी के बाद फिर से पहले जैसा हो जाता हैं। लेकिन इनके कारण पेट में दबाव व भारीपन महसूस होता है। नर्व के दबने से कमर के निचले हिस्से और पैरों में तेज दर्द होता है।
  • जिन लोगों की फेमिली कम्पलीट है और फायब्रॉयड्स से कोई परेशानी नहीं हो रही है तो डरें नही मेनोपॉज के बाद ये धीरे-धीरे अपने आप ही खत्म हो जाते हैं।
  • जिन्हें फेमिली शुरू करनी है और फायब्रॉयड्स बड़े आकार के हैं तो उनके लिए इसे पहले दवा या इंजेक्शंस के जरिये छोटा किया जाता है, उसके बाद ओपन सर्जरी से इन्हें रिमूव किया जाता है। अगर फायब्रॉयड्स छोटे हैं तो लेप्रोस्कोपिक सर्जरी से इसका निदान किया जाता है।
  • फायब्रॉयड्स के कारण डिलिवरी दो-तीन हफ्ते पहले हो सकती है, लेकिन बच्चे को इससे कोई नुकसान नहीं होता।
  • अगर कोई महिला कंसीव न कर पा रही हो तो फायब्रॉयड्स की जांच भी करा लें। फायब्रॉयड्स रिमूव करने के बाद कंसीव करने की संभावनाएं 40 से 80 फीसदी तक बढ जाती हैं।
  • अगर फायब्रॉयड्स हैं तो इन्हें रिमूव कराना चाहिए, क्योंकि इनसे ज्यादा ब्लीडिंग होती है और यूट्रस कमजोर हो जाता है।
  • मेनोपॉज के बाद यूट्रस रिमूवल सर्जरी भी कराई जा सकती है।

 

 

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