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घर का महौल बनाता हैं बच्चों को झगड़ालू

परवरिश के तरीके By Aditi Singh , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Sep 24, 2015
घर का महौल बनाता हैं बच्चों को झगड़ालू

बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए उनके सामने लड़ाई नहीं करें। परिवार का माहौल बच्चे के विकास में अहम भूमिका निभाता है। बच्चा वही सीखता और करता है, जो उसे उसके माता-पिता सिखाते हैं।

एक बच्चे की परवरिश में परिवार का बहुत महत्व होता है। खासकर किसी परिवार का माहौल बच्चे के विकास में अहम भूमिका निभाता है। बच्चा वही सीखता और करता है, जो उसे उसके माता-पिता सिखाते हैं।पैरेंट्स से मिली शिक्षा ही आगे चलकर बच्चे के चरित्र का निर्माण करती है। अक्सर देखा गया है कि माता-पिता के बीच मतभेदों और झगड़ों का सीधा असर बच्चों के दिमाग पर पड़ता है। आए दिन होते झगड़ों को देख-देख कर बच्चा भी झगड़ालू बन जाता है, या तनाव में रहने लगता है। या यूं कहे कि कही ना कही पैरेंट्स ही बच्चों को झगड़ालू बनाते हैं।


बच्चों के झगड़ालू बनने के कारण

घर परिवार में होने वाले झगड़े, कलह, ब्रेकडाउन आदि बच्चों पर विपरीत असर डालते हैं। वहां बच्चे जल्दी वयस्क हो जाते हैं। माता-पिता को हर समय लड़ते-झगड़ते देखना, उनका अलगाव होना और बच्चों के साथ मारपीट करने वाले माता-पिता के साथ रहने वाले बच्चे झगड़ालू बन जाते हैं।     घर में होने वाले तनाव, लड़ाई-झगड़े का असर बच्चों पर सबसे ज्यादा पड़ता है। विभिन्न अध्ययनकर्ताओं का मानना है कि लंबे समय तक तनाव में रहने वाले इन बच्चों में हार्मोन असंतुलन की समस्यान आ सकती है। बच्चोंय के भीतर इस तरह के हार्मोन का निर्माण होने लगता है जो उन्हें समय ही वयस्की और झगड़ालू बना देते है। दबंग, झगड़ालू या शराबी पिता के व्यवहार का असर बच्चों में नकारात्मक तरीके से पड़ता है। बच्चों के असमय वयस्क होने से उनकी सोच, उनका मानसिक स्तर, असमय शैक्षिक और शारीरिक परिपक्वता के कारण वह चीजों को जिस आधे-अधूरे ढंग से समझते या जानते हैं। इस सबका उन पर नकारात्मक असर होता है।


 

बच्चों के झगड़ालू होने के परिणाम

लड़ाई-झगड़ा करने वाले बच्चे वास्तव में अपने पैरेंट्स या परिवार के अन्य बड़े सदस्यों की नकल करते हैं। पैरेंट्स के व्यवहार का बच्चों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। झगड़ालू बच्चें अपमान की अनदेखी नहीं कर पाते और झगड़ा समाप्त करने के लिए कोई भी तरीका अपनाते हैं। कई बार तनावग्रस्त महिला अपने बच्चों से गुस्से से बात करती है। जो बच्चे के कोमल मन पर आघात पहुंचाता है, और बच्चा अपने ही माता-पिता से डरने लगता है, या फिर उनसे बिल्कुल ही कट जाता है, और परिवार से बाहर वह अपनी खुशियां ढूंढ़ने लगता है।बच्चें तनाव से अपने आप को दूर करने के लिए पोर्न फिल्में देखना, ब्लू लिटरेचर पढ़ने जैसी गतिविधियों में भी संलग्न होने लगते हैं। इसके अलावा शरीर में होने वाले विभिन्न रासायनिक परिवर्तन उन्हें कम उम्र में ही शारीरिक व मानसिक रूप से परिपक्व बना देता है। जिससे उनमें शारीरिक और मानसिक असंतुलन पैदा हो जाता है। जिसके कारण ऐसे बच्चे कम उम्र में ही सेक्स की ओर उन्मुख हो जाते हैं। लड़कियां टीनएज में मां बन जाती हैं या नशा करने लगती हैं। लड़के भी बुरी संगत में पड़कर नशा करने लगते हैं।



जो बच्चे। लड़ाई-झगड़ा नहीं करना चाहते, वे इससे बचने के लिए अपमान की उपेक्षा कर देने या तनाव कम करने के लिए मजाक करने जैसी कई आदते अपनाते हैं। परिवार का दृष्टिकोण युवाओं को लड़ाई-झगड़े से सम्भवत: रोक भी सकता है।

 

 Image Source-Getty

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