परंपरागत तरीके से करें शिशु की देखभाल

Updated at: Jan 16, 2014
परंपरागत तरीके से करें शिशु की देखभाल

नवजात शिशु की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होती है इसलिए उसे संक्रमण का खतरा भी अधिक होता है। इसलिए शिशु को खास देखभाल की जरूरत होती है।

Anubha Tripathi
नवजात की देखभालWritten by: Anubha TripathiPublished at: Jun 16, 2012

शिशु की प्रतिरक्षा प्रणाली वयस्कों की तुलना में कफी कमजोर होती है। इसलिए उसे संक्रमण का खतरा भी ज्‍यादा होता है। ऐसे में शिशु को खास देखभाल की जरूरत होती है। देखभाल के लिए परंपरागत तरीके सबसे बेहतर रहते हैं। इस लेख में जानें शिशु की देखभाल के परंपरागत तरीके।

Traditional Way To Take Care Of Baby

 

बिना हाथ धोए शिशु को कतई नहीं छूना चाहिए। पहले के समय में घर के बड़े-बुजुर्ग इस बात का खास ख्‍याल रखते थे कि मां व शिशु को किसी तरह का कोई संक्रमण न हो। इसके लिए मां व शिशु को एक साफ सुथरे कमरे में रखा जाता था। वहां हर कोई नहीं जा सकता था। उस कमरे की  साफ सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता था। कोई भी परिवार का सदस्य वहां बिना हाथ पैर धोए नहीं जा सकता था साथ ही उसे अपने चप्पल या जूते कमरे के बाहर ही उतारने होते थे। यह सारी सावधानियां शिशु व मां को होने वाले संक्रमण से बचाती थीं। आज के समय में भी आप इन नुस्खों को अपनाकर बच्चे को संक्रमण से बचाया जा सकता है।

 

संक्रमण से करें बचाव

जिस कमरे में मां व शिशु को रहना हो वो कमरा मच्छरों व कीड़े मकौड़े रहित होना चाहिए। उस कमरे में सफाई रखने के लिए सुबह शाम कीटनाशक मिलाकर पोंछा मारना चाहिए जिससे शिशु को किसी तरह का संक्रमण नहीं हो सके। साथ ही जो लोग बाहर से आते हैं उन्हें बिना हाथ धोए शिशु को नहीं छूने देना चाहिए। बाहर से आने वाले लोगों पर ना जाने कितने कीटाणु होते हैं। ऐसे में शिशु को संक्रमण हो सकता है।

 

मालिश है जरूरी

शिशु की हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए मालिश जरूरी है। इससे शिशु की थकान दूर होती है और उसके अंगों की गतिविधियां भी बढ़ती हैं। शिशु के साथ मां की भी मालिश जरूरी है। प्रसव के बाद मां के शरीर को मालिश की काफी जरूरत होती है। इससे उसके शरीर का दर्द दूर होता है।

 

शिशुओं का पोषण

प्रसव के बाद जल्द से जल्द शिशु को स्‍तनपान शुरू करा दिया जाना चाहिए। कोलोस्‍ट्रम पीला गाढा दूध जो प्रसव के बाद के पहले कुछ दिनों में स्‍तनों में आता है, उसे शिशु को दिया जाना बेहद जरूरी होता है।  पहले छः महिनों की आयु के दौरान केवल माता का दूध ही दें। कुछ महिनों के बाद माता के दुध के अलावा अन्य पूरक भोजन देना शुरू कर सकते हैं।


मां का भोजन भी संतुलित हो

जन्‍म के बाद के पहले छ: महीने तक शिशु को मां का दूध ही दिया जाता है इसलिए मां जो भी खाना खाती है उसका असर बच्चे के पाचन पर भी होता है। इसलिए मां को अपने भोजन का खास खयाल रखना चाहिए और ज्यादा तला भुना व मसालेदार खाना नहीं खाना चाहिए। इसके अलावा जिन चीजों से पेट खराब होने की संभावना हो उनसे तो बिल्कुल दूर रहना चाहिए। ऐसे समय में मां को दूध, दही, दाल, हरी सब्जियां, फलों आदि को अपने आहार में शामिल करना चाहिए।

 

सचेत रहें और खतरों को पहचाने

जब शिशु बीमार होता है तो अधिकतर माताएं इसके संकेत पहचान सकती हैं। ऐसी किसी भी स्थिति में शुरूआत में ही चिकित्‍सा सहायता लें, क्‍योंकि नवजात की स्थिति जल्‍दी ही खराब हो जाती है। यदि शिशु में कोई खतरे के चिन्‍ह दिखाई दें तो तत्‍काल उसे डॉक्टर के पास ले जाया जाना चाहिए।

 

सुरक्षा की दृष्टी से शिशु को बहुत सारे लोगों को उठाने न दें और भीड-भाड वाली जगहों पर भी न ले जाएं। अतिसार और खांसी जैसे संक्रमणों से ग्रस्‍त लोगों को भी बच्‍चे को दूर रखना चाहिए।

 

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इस जानकारी की सटीकता, समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर सम्भव प्रयास किया गया है हालांकि इसकी नैतिक जि़म्मेदारी ओन्लीमायहेल्थ डॉट कॉम की नहीं है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्देश्य आपको जानकारी मुहैया कराना मात्र है।

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