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हाथ और पैरों की नसों में दर्द और सूजन हो सकता है डीवीटी रोग का संकेत

Updated at: Feb 19, 2019
अन्य़ बीमारियां
Written by: अनुराग अनुभवPublished at: Feb 19, 2019
हाथ और पैरों की नसों में दर्द और सूजन हो सकता है डीवीटी रोग का संकेत

पैरों में दर्द और सूजन की समस्या होने पर ज्यादातर आप इसे कोई आम चोट या मोच समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन दर्द वाली जगह पर आपको अगर लाली दिखे या नसों में नीलापन दिखे, तो ये किसी गंभीर बीमारी का भी संकेत हो सकता है। डीवीटी यानी डीप वेन थ्रॉम्बोस

पैरों में दर्द और सूजन की समस्या होने पर ज्यादातर आप इसे कोई आम चोट या मोच समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन दर्द वाली जगह पर आपको अगर लाली दिखे या नसों में नीलापन दिखे, तो ये किसी गंभीर बीमारी का भी संकेत हो सकता है। डीवीटी यानी डीप वेन थ्रॉम्बोसिस नसों से जुड़ा एक ऐसा ही रोग है। ये रोग तब होता है जब नसों में खून जम जाता है। कई बार डीवीटी खतरनाक हो सकता है क्योंकि खून जमने के कारण नसें फट भी सकती हैं। आइए आपको बताते हैं कि डीवीटी रोग के क्या लक्षण होते हैं और क्यों होता है ये रोग।

क्यों जमता है नसों में खून

डीवीटी रोग का मुख्य लक्षण नसों में खून जमना है, जिसके कारण नसों में सूजन आ जाती है। इसका कारण यह है कि डीवीटी रोग में नसों में रक्त के थक्के जमने लगते हैं, जो रक्त प्रवाह में बाधा बनते हैं। दरअसल ब्लड (रक्त) कई तरह के सेल्स से मिलकर बना होता है। ये तरल (लिक्विड फॉर्म) होता है लेकिन इसकी तरलता तभी तक है जब तक ये सामान्य गति से नसों में दौड़ रहा है। अगर रक्त का प्रवाह धीमा हो जाए, तो रक्त जमने लगता है और नसों के बीच ब्लड के थक्के जमना शुरू हो जाते हैं। इसी को डीप वेन थ्रोंबोसिस कहते हैं। वैसे तो ये शरीर के किसी भी हिस्से को प्रभावित कर सकता है मगर आमतौर पर ये रोग पैरों और पेड़ू में होता है। कुछ मामलों में डीवीटी जानलेवा हो सकता है।

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डीवीटी रोग के क्या हैं संकेत

  • डीवीटी रोग का सबसे पहला लक्षण हाथ-पैरों में दर्द है।
  • कई बार ये दर्द असहनीय हो जाता है।
  • खड़े होने या चलने पर टांगों में दर्द या कमजोरी महसूस होना
  • दर्द वाली जगह पर कुछ लोगों को जलन भी महसूस होती है।
  • हाथ पैरों में सूजन आ जाती है या नसें सूजन के कारण उभर आती हैं।
  • त्वचा का रंग लाल हो जाता है या नसें नीली पड़ने लगती हैं।

क्या है डीवीटी रोग का इलाज

डीवीटी एक खतरनाक रोग है इसलिए समय रहते डॉक्टर से संपर्क करना बहुत जरूरी है। अगर ब्लड क्लॉट बढ़ता जाता है, तो रक्त प्रवाह रुकने के कारण मरीज की जान भी सकती है। डीवीटी रोग अगर बहुत अधिक गंभीर स्टेज तक नहीं पहुंचा है, तो डॉक्टर्स सबसे पहले खून को पतला करने की दवाई देते हैं, जो 3 महीने से लेकर साल भर तक खानी पड़ सकती है। इससे मरीज की नसों में ब्लड क्लॉट बड़ा नहीं होता है और समय के साथ पहले से बना ब्लड क्लॉट भी खत्म हो जाता है।
ब्लड थिनर्स को पिल की फॉर्म में ले सकते हैं, इंजेक्शन या फिर नस में एक ट्यूब डालकर भी लिया जा सकता है। लेकिन, ब्लड थिनर्स का साइड इफेक्ट है ब्लीडिंग। ब्लीडिंग तब होती है, जब दवाईयों के कारण खून ज़्यादा पतला हो जाता है। यह घातक भी हो सकता है। कई बार ब्लीडिंग अंदरूनी होती है। इसीलिए, डॉक्टर्स मरीज़ों का बार-बार ब्लड टेस्ट करवाते रहते हैं। इन टेस्ट्स में पता चल जाता है कि खून के जमने के कितने चांस हैं।

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डीवीटी में पल्मोनरी इम्बॉलिज्म का भी रहता है खतरा

पल्मोनरी इम्बॉलिज्म एक जानलेवा और खतरनाक रोग है। इसमें अचानक से रोगी की तबीयत बिगड़ती है और कुछ समय बाद ही उसकी मौत हो जाती है। कई बार नसों में रक्त का थक्का जमता है मगर रक्त प्रवाह के कारण नसों की दीवारों से अलग होकर रक्त के साथ ही शरीर में बहने लगता है। ये थक्का जब फेफड़ों में पहुंचता है तो यही पल्मोनरी इम्बॉलिज्म का कारण बनता है।

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