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आशावान नहीं हैं, तब भी कैसे रहें खुश

तन मन By Bharat Malhotra , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Dec 08, 2014
आशावान नहीं हैं, तब भी कैसे रहें खुश

खुशी हमारे भीतर ही होती है। और हम इसे बाहर तलाशते हें। असल में जीवन में खुशी के लिए सही संतुलन होना जरूरी है। और जब आप संतुलन का सही अर्थ समझ जाते हैं तो आपको खुशी का अहसास होता है।

हम खुश कैसे रह सकते हैं। यह सवाल अकसर हमारे अंतर्मन में उठता रहता है। लेकिन, जब हम किसी प्‍यारे से बच्‍चे की मुस्‍कुराती हुई तस्‍वीर देखते हैं, तो हमें पता ही नहीं लगता कि कब हमारे लबों पर मुस्‍कान आ जाती है। किसी छोटे से बच्‍चे को सड़क पर अपने माता-पिता के साथ खेलते देख भी हम खुद को मुस्‍कुराने से नहीं रोक पाते। उस तस्‍वीर के बारे में सोचिये कि आपके पास खड़े एक बच्‍चे के साथ से गुब्‍बारा छूटकर हवा में उड़ जाता है, उस समय वह बच्‍चा ही नहीं आसपास खड़े सभी लोगों की नजरें आकाश की ओर निहाराने लगती हैं। अगर वह बच्‍चा रोता है तो आपको बुरा लगता है, लेकिन जब वह बच्‍चा उस चीज के जाने का मलाल छोड़ अपनी मां का हाथ पकड़कर आगे चलने लगता है, तो आप अनजाने में ही सही एक सबक सीख जाते हैं। सबक आत्‍मविश्‍वास का। सबक जो चला गया उसे भूलकर आगे बढ़ने का। जिंदगी का यह सबक आपको कभी भी रुकने और थमने नहीं देता। बच्‍चे का अनुभव भले ही आपसे कम हो, लेकिन उसे मालूम है कि अब वह गुब्‍बारा नहीं आ सकता, जो हो गया उसे बदला हीं जा सकता। ऐसे में रोने से कुछ नहीं होगा। बेहतर है कि आगे बढ़ा जाए...


उम्‍मीद है जरूरी

आशा का दामन थामे रहना खुशी की कुंजी है। उम्‍मीद ही है जिसकी पतवार बनाकर इनसान मुश्किल से मुश्किल तूफान से लड़ता हुआ किनारे तक पहुंच सकता है। और अब तो वैज्ञानिक भी इस बात को मानते हैं कि आशावान लोग अधिक खुश होते हैं। आज वक्‍त अगर मुश्किल है, तो कल हालात बदल भी सकते हैं। बस आपको प्रयास करते रहना है। और यह उम्‍मीद रखनी है कि आपके प्रयास आपको इस कठिन दौर से बाहर निकाल सकते हैं। सब कुछ आपकी कोशिशों और उम्‍मीद पर ही निर्भर करता है।

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अंदर है खुशी

खुश रहने के लिए यह जानना जरूरी है कि खुशी कहीं बाहर नहीं है। यह आपके भीतर ही है। कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि यह अनुवांशिक होती है। जापानी वैज्ञानिकों ने अपने एक शोध में माना था कि हममें से बामुश्किल आधे लोगों में कैनाबिनॉयड-रिसेप्‍टर 1 जीन होता है, जो किसी आरामदेह धारावाहिक को देखते हुए प्रतिक्रिया करता है। जब आप किसी सुखद घटना को पर्दे पर देखते हैं, तो आपके मस्तिष्‍क में वही प्रतिक्रिया होती है जो अफीम के नशे में होती है। यानी यह नशा आपके तनाव को दूर करने में मदद करता है।

 

नजरिया बदलें

लेकिन, एक वैज्ञानिक शोध में यह भी कहा गया है कि हमारी खुशी का 40 फीसदी हिस्‍सा कुछ खास किस्‍म के जीन्‍स पर निर्भर नहीं करता। वह इस बात पर निर्भर करता है कि आखिर हम खुद अपनी खुशी को किस नजरिये से देखते हैं। इस बात से यह लगता है कि हमारी 40 फीसदी खुशी कामोन्‍माद से उत्‍पन्‍न होती है, लेकिन इसके साथ ही हमारे रोजमर्रा के जीने का ढंग भी इस बात को तय करता है कि आखिर हम कैसे खुश रह सकते हैं।


दो प्रकार की खुशी

हम अपने लिए दो प्रकार की खुशी का‍ निर्माण करते हैं। आधुनिक विज्ञान का कहना है कि हमें इन दोनों के बीच सही संतुलन स्‍थापित करने की जरूरत है। 1) इसमें आप बेपरवाह, मजा और यहां वहां भटकने में खुशी महसूस करते हैं वहीं दूसरी खुशी बच्‍चों को बड़ा करने और किसी समुदाय का हिस्‍सा बनने से मिलती है। नौकरी, परिवार, और अपनी सेहत का खयाल रखना, यह सब काम साथ करने बेहद चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। और इसके साथ ही बच्‍चों की जिम्‍मेदारी उठाना भी महिलाओं के ही सिर होता है। लेकिन, वे अपने परिवार और बच्‍चों में ज्‍यादा खुशी तलाश लेती हैं।

यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कारोलिना की साइकोलॉजिस्‍ट बारबरा एल फ्रेडिक्‍सन ने जीवन में संतुलन को आसान बनाने का तरीका सुझाया है। उनका कहना है कि सच्‍चे आनंद को हे‍डोनिक कहा जाता है। इसका अर्थ है कि आप अर्थपूर्ण जीवन जीकर खुशी हासिल करें। यह कुछ उसी तरह की खुशी है जैसे कि आप किसी अपने का हाथ थामकर कुदरत के आंगन में टहल रहे हों।

'हार्ड रोड एहेड' दूसरी तरह की खुशी की बुनियाद है। वैज्ञानिकों ने पाया कि जो लोग इसमें अधिक अंक बटोरते हैं उनके शरीर में वायरस को मामले वाले एंटीबॉडीज 30 फीसदी अधिक सक्रिय होते हैं। इस खुशी को फ्रेडिक्‍सन ने यूडायनोमिया का नाम दिया है। यह कुछ ऐसी ही खुशी है कि जब आप अपने दोस्‍त को अपने बच्‍चे के साथ खेलते देखते हैं। जब आप देखते हैं कि आप किसी महिला को ईश्‍वर का धन्‍यवाद करते हुए देखते हैं। .

 

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संतुलन है जरूरी

जीवन में खुशी को बनाये रखने के लिए इन दोनों प्रकार की खुशियों का सही संतुलन होना आवश्‍यक है। जीवन में मजा और कभी-कभी लापरवाह होना बहुत जरूरी है। लेकिन यह एक सीमा में होना चाहिये। लापरवाही और बेफिक्री हमारे मस्तिष्‍क पर हावी नहीं होनी चाहिये। फ्रेडिक्‍सन ने अपने शोध में पाया कि जो प्रतिभागी खुशी को किसी मकसद के साथ जोड़ देते हैं उनमें उत्‍तेजना का भाव 20 प्रतिशत अधिक होता है।

मकसद और खुशी का सही सामंजस्‍य में होना जरूरी है। इसी से आपको सही खुशी मिल सकती है। इसी संतुलन के कारण ही हमें सही सकारात्‍मक भावनायें मिलती हैं। आप इसे आशावाद कहें या लचीलापन यह आपकी मर्जी है। लेकिन ये दोनों ही भावनायें पूरी तरह आपके नियंत्रण में होती हैं। और सही मायनों में खुशी को ऐसे ही बढ़ाया जा सकता है।

 

Image- Getty Images

 

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