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नाइट शिफ्ट में काम हो सकता है खतरनाक

लेटेस्ट By रीता चौधरी , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Oct 18, 2012
नाइट शिफ्ट में काम हो सकता है खतरनाक

आइये जानें, नाइट शिफ्ट में काम करना कैसे हो सकता है खतरनाक।

night shift me kaam ho sakta hai khatarnak

टोरंटो : वैज्ञानिकों द्वारा किये गए एक शोध में पाया गया कि नाइट शिफ्ट में काम करने वाले पुरूषों में विभिन्न प्रकार के कैंसर होने का खतरा ज्‍यादा रहता है। जब आपकी नौकरी इस तरह की है जहां आपको रात की शिफ्ट में भी काम करना पड़ता है। तो ऐसे में आपको अत्यधिक सावधानी की आवश्यकता होती है। साथ‍ ही ये जानना भी जरूरी है कि शिफ्टिंग को किस तरह से मैनेज करें। शिफ्ट में काम करने वाले लोगों को आम लोगों की तुलना में कैंसर होने का खतरा कहीं ज्यादा होता है।

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यह अपनी तरह का पहला ऐसा शोध है जिसमें नाइट शिफ्ट में काम करने वाले लोगों के स्‍वस्‍थ्‍य पर इसके प्रभाव को आंका गया है। इस रिपोर्ट में पाया गया कि नाइट शिफ्ट में काम करने वाले लोंगों में प्रोस्टेट, कोलोन, फेफड़े, मूत्राशय, गुदा एवं पैनक्रियाज जैसे कैंसरों के होने की संभावना अधिक होती है। इस रिर्पोट में कैंसर और लिमफोमा के बीच संभावित संबंध के सबूत भी पाए गये है।

इस शोध के प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर मैरी ऐलिस पेरेंट्स ने बताया कि रात के समय काम करने और प्रकाश के संपर्क में आने से शरीर में नींद वाले हार्मोन मेलाटोनिन की कम मात्रा बनती है, जिससे मनोचिकित्सकीय बदलाव आते हैं जो ट्यूमर के जन्म को बढ़ावा देते हैं। पेरेंट्स ने एक बयान में कहा कि रात में सोते वक्‍त या प्रकाश की गैर मौजूदगी में आधी रात के समय शरीर में इस हार्मोन का स्राव होता है और यह हार्मोनों की कार्यप्रणाली तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

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इस रिर्पोट में कहा गया है कि शिफ्ट में काम करने वालों के शरीर का आंतरिक चक्र गड़बड़ा जाता है। इससे कैंसर होने का खतरा भी बढ़ जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार आंतरिक चक्र शरीर की विभिन्न कोशिकाओं को अलग-अलग समय में अलग-अलग हार्मोन के उत्सर्जन का संकेत का नियंत्रण करता है। औद्योगिक इकाइयों, संचार माध्यमों, स्वास्थ्य क्षेत्र, आतिथ्य उद्योग एवं मीडिया में शिफ्ट में काम करने का चलन बहुत आम है।
यह अध्ययन रिपोर्ट अमेरिकन जर्नल आफ एपीडिमियोलोजी में प्रकाशित हुई है। (एजेंसी)

 

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Written by
रीता चौधरी
Source: ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभागOct 18, 2012

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