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Infertility Awareness Week: महिलाओं और पुरुषों में क्‍यों होती है बांझपन की समस्‍या, एक्‍सपर्ट से जानें समाधान

विविध By अतुल मोदी , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Apr 22, 2019
Infertility Awareness Week: महिलाओं और पुरुषों में क्‍यों होती है बांझपन की समस्‍या, एक्‍सपर्ट से जानें समाधान

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा परिभाषित यह प्रजनन तंत्र का रोग लगातार बढ़ता जा रहा है जिसके कारणों में विशेष रूप से तनाव, प्रदूषण, जीवनशैली और अधिक आयु में विवाह आदि शामिल हैं। बंगलुरू स्थित एक मेडिकल

संतान को जन्म देना, किसी भी दंपती के लिए अपने संबंध को आगे बढ़ाने का स्वाभाविक अगला कदम होता है। संतान उत्पन्न करने की इस क्षमता को प्रजनन शक्ति कहते हैं। भले ही यह आसान दिखाई पड़े, पर इस तेज़ गति से दौड़ती दुनिया में निसंतानता एक समस्या बनती जा रही है। इसलिए, इसके बारे में जागरुकता फैलाने, लोगों को शिक्षित करने और इससे जुड़ी भ्रांतियों को कम करने के उद्देश्य से रिज़ॉल्व नामक एक राष्ट्रीय निसंतानता संघ ने 1989 में राष्ट्रीय निसंतानता जागरुकता सप्ताह (National Infertility Awareness Week) प्रारंभ किया है। 

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा परिभाषित यह निसंतानता की समस्‍या लगातार बढ़ती जा रही है। जिसके कारणों में विशेष रूप से तनाव, प्रदूषण, जीवनशैली और अधिक आयु में विवाह आदि शामिल हैं। बंगलुरू स्थित एक मेडिकल टेक्नॉलजी कंपनी द्वारा 2018 में किए गए एक शोध के अनुसार, भारत में 2.75 करोड़ दंपती निसंतानता से पीड़ित हैं। पर यह समस्‍या केवल भारत में नहीं बल्कि पूरी दुनिया में व्याप्त है। शोध के अनुसार वैश्विक आँकड़े बताते हैं कि पूरी दुनिया में लगभग 5 करोड़ दंपती निसंतानता हैं।

निसंतानता (Infertility) क्यों होती है?

  • समाज में यह विश्वास आम है कि निसंतानता या बांझपन स्त्रियों का रोग है। पर सच यह है कि यह रोग लिंगाधारित नहीं है और पुरुष या महिला में से किसी को भी प्रभावित कर सकता है। 
  • पुरुषों में इसके कारणों में वीर्य में शुक्राणुओं का प्रतिशत कम होना या उनकी अनुपस्थिति, गति कम होना, वृषण कैंसर, पौरुष ग्रंथि कैंसर या अन्य किसी कैंसर का इतिहास, या पारिवारिक इतिहास शामिल हैं। 
  • वहीं महिलाओं में इसके मुख्य कारणों में अंडों का समय पर न फूटना, यानि प्रजनन हार्मोनों के नियमन में समस्या, बढ़ती आयु का प्रभाव, स्वस्थ अंड कोशिका का उत्पादन न होना, और बारंबार गर्भपात आदि आते हैं।

इस समस्या का पता कैसे लगाएँ? 

आरंभिक पहचान का एक सामान्य नियम यह है कि, यदि कोई दंपती, जिसकी आयु 30 वर्ष से कम है, 12 महीनों तक गर्भधारण नहीं कर पाता है, तो उसे चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए। हालांकि, ऐसे मामलों में जहाँ महिला की आयु 30 वर्ष से अधिक है, तो उसे छः महीनों के बाद किसी प्रजनन विशेषज्ञ से परामर्श करना चाहिए।

क्या निसंतानता का कोई समाधान है?

निसंतानता की समस्या का सबसे पहला समाधान यह है कि जीवनशैली और खान-पान की आदतें बदली जाएँ। इसलिए दंपती को -

  • तनाव घटाना चाहिए और प्रसन्न रहना चाहिए
  • एक सक्रिय जीवनशैली बनाए रखनी चाहिए, यानि नियमित व्यायाम करना चाहिए
  • स्वास्थ्यकर भोजन खाना चाहिए, यानि शाकाहारी प्रोटीन और स्वास्थ्यकर वसाओं का सेवन अधिक करना चाहिए, भरपूर पानी पीना चाहिए, इत्यादि
  • एल्कोहल का सेवन घटाना चाहिए और धूम्रपान छोड़ देना चाहिए
  • वजन सामान्य बनाए रखना चाहिए 

पर यदि समस्या फिर भी बनी रहे, तो उन्हें किसी चिकित्सक को दिखाना चाहिए, जो विभिन्न जाँचों और विश्लेषणों के बाद निसंतानता के विभिन्न समाधान सुझा सकते हैं। वे समाधान इस प्रकार हैं -

अंडोत्सर्ग का प्रेरण और प्राकृतिक चक्र

यह दवाओं द्वारा अंडाशय से अंड कोशिका निकलने को प्रेरित करने का एक तरीका है। यह अंड कोशिकाओं को परिपक्व होकर अंडाशय से निकलने को प्रेरित करता है, जिससे गर्भधारण की संभावना बढ़ जाती है।

इंट्रायूटेराइन इन्सेमिनेशन (आईयूआई)

इसमें पुरुष के शुक्राणु एकत्र करके उन्हें अंडोत्सर्ग के दौरान महिला के गर्भाशय में पहुँचा दिया जाता है।

इन विट्रो फ़र्टिलाइज़ेशन (आईवीएफ़)

आईवीएफ़, जिसे टेस्ट ट्यूब बेबी विधि के नाम से भी जानते हैं, महिला के शरीर से बाहर शिशु उत्पन्न करने के सबसे पुराने उपचारों में से एक है जिसमें उपचार गर्भाशय की बजाय एक प्रयोगशाला में परखनली यानि टेस्ट ट्यूब में किया जाता है। इसकी सफलता की दर लगभग 40 से 60 प्रतिशत है जो दुनिया की सबसे अच्छी दरों में से एक है, और इस उपचार की सहायता से बहुत से योग्य निसंतानता विशेषज्ञों ने दुनिया भर के दंपतियों की सूनी गोद भरकर उन्हें खुशियाँ दी हैं। 

एंडोस्कोपी

एंडोस्कोपी में लैपरोस्कोपी और हिस्टेरोस्कोपी आते हैं। इससे गर्भाशय में समस्या की पहचान की जाती है और उसी के अनुसार सर्जरी द्वारा गर्भाशय में सुधार किया जाता है। इसकी सहायता से चिकित्सक गर्भाशय के अंदर जो भी असामान्यताएँ हों उन्हें भी निकाल देते हैं।

आईवीएफ़ अंडदान

आईवीएफ़ अंडदान उन महिलाओं के लिए एक उपयोगी प्रक्रिया है जो स्वयं की अंड कोशिकाओं की अनुपलब्धता या अंडाशयी भंडार कम होने के कारण अपनी स्वयं की अंड कोशिकाओं का उपयोग नहीं कर सकती हैं। ऐसे मामलों में, कोई अन्य महिला उस महिला को अंडदान करती है जो स्वयं की अंड कोशिकाएँ उत्पन्न करने में अक्षम है।

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क्रायोप्रिज़र्वेशन

इस प्रक्रिया में पुरुष और महिला, दोनों के ऊतकों, कोशिकाओं या अंगों को उनकी व्यवहार्यता कायम रखने के लिए बहुत कम तापमान पर भंडारित कर लिया जाता है। बाद में इन कोशिकाओं या ऊतकों को पुनः उपयोग के लिए उचित स्थितियों में पुनः सामान्य तापमान पर ले आया जाता है। सहायित प्रजनन प्रौद्योगिकी (असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नॉलजी) में शुक्राणुओं, अंड कोशिकाओं या भ्रूणों को प्रायः जमा दिया जाता है। 

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सरोगेसी

स्थानापन्न मातृत्व (सरोगेसी) और गर्भकालीन स्थानापन्न मातृत्व (जेस्टेशनल सरोगेसी) में, कोई अन्य महिला अपने गर्भ में भावी माता-पिता की संतान का, उसके जन्म लेने तक, धारण करती है। जन्म के बाद उन जैविक माता-पिता को संतान के आधिकारिक माता-पिता घोषित कर दिया जाता है। चूंकि इस प्रक्रिया में एक तीसरा व्यक्ति शामिल होता है, अतः यह प्रक्रिया एक कानूनी करार के तहत की जाती है। कुछ अन्य उपचारों में सर्जरी, दवाएँ, और हार्मोन उपचार शामिल हैं।

आइए, इस वर्ष 21 अप्रैल से 29 अप्रैल तक चलने वाले एनआईएडब्ल्यू के इस अवसर पर लोगों को सामने आने और इस समस्या के बारे में खुलकर बोलने के लिए प्रोत्साहित करें। अन्य कई रोगों की तरह इसका भी समाधान है, पर वह समाधान तभी संभव है जब दंपती किसी विशेषज्ञ से सलाह लें। रोगियों को अपनी इच्छा से किसी भी प्रकार की दवा भी नहीं लेनी चाहिए क्योंकि ऐसा करने में जोख़िम है और इससे उनकी स्थिति और जटिल हो सकती है। 

यह लेख दिल्ली आईवीएफ़ एंड फ़र्टिलिटी सेंटर की उन्नत प्रजनन एवं आईवीएफ़ परामर्शदाता तथा स्त्रीरोग विशेषज्ञ, डॉ आस्था गुप्ता से हुई बातचीत पर आधारित है।  

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