जब मनोरोग विशेषज्ञ को 'पागलों का डॉक्‍टर' कहा जाता है तो मुझे बहुत अफसोस होता है

Updated at: Jul 13, 2020
जब मनोरोग विशेषज्ञ को 'पागलों का डॉक्‍टर' कहा जाता है तो मुझे बहुत अफसोस होता है

आज नेशनल डॉक्‍टर्स डे (National Doctor's Day 2020) के मौके पर हम आपको आज हम आपको मनोचिकित्‍सक से जुड़े कुछ तथ्‍य साझा कर रहे हैं। 

Atul Modi
विविधReviewed by: डॉ. आनंद प्रताप सिंह, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञPublished at: Jul 01, 2020Written by: Atul Modi

नेशनल डॉक्‍टर्स डे या राष्‍ट्रीय चिकित्‍सक दिवस यानी चिकित्‍सकों का दिन। ये वो खास दिन है जब हम अपने डॉक्‍टर्स की उनकी दिन-रात की जाने वाली मेहनत और सेवाओं के प्रति आभार प्रकट करते हैं उन्‍हें धन्‍यवाद देते हैं। हम डॉक्‍टर्स को भगवान का दर्जा दे देते हैं, मगर उनके मानवीय पहलुओं को भूल जाते हैं। हम ये भी भूल जाते हैं कि वो हमारे लिए क्‍या सोचते हैं। एक डॉक्‍टर अपने पेशेंट के लिए क्‍या सोचता है, इस बात को समझने के लिए हमने गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय (GBU)में मनोविज्ञान और मानसिक स्वास्थ्य विभाग के एचओडी डॉक्‍टर आनंद प्रताप सिंह से बातचीत की। और हमने ये जानते की कोशिश की कि एक मानसिक रोग विशेषज्ञ मानसिक रोगी के प्रति कैसी भावनाएं रखता है। इसके अलावा हमने मानसिक रोगों के प्रति समाज का क्‍या नजरिया है, इस पर भी विस्‍तार से चर्चा की है।  

एक मानसिक रोगी को किस नजरिए से देखते हैं?

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GBU में मनोविज्ञान और मानसिक स्वास्थ्य विभाग के एचओडी डॉक्‍टर आनंद प्रताप सिंह कहते हैं, "हम मानसिक रोगी को आम पेशेंट के तौर पर ही देखते हैं। किसी भी मानसिक रोग से पीड़ित व्‍यक्ति का व्‍यवहार चाहे कैसा भी हो मगर हमारे और उसके बीच में एक डॉक्‍टर और पेशेंट का ही रिश्‍ता होता है। वैसे तो मानसिक रोगी के प्रति हर किसी की अलग-अलग भावनाएं होती है। कुछ लोग ऐसे लोगों के प्रति दया भाव रखते हैं, कुछ मजाक में लेते हैं तो वहीं कुछ लोग ऐसे लोगों को मनोरंजन का साधन मानते हैं। जबकि हमारे लिए एक मानसिक रोगी के व्‍यवहार को बीमारी के लक्षण के तौर पर देखते हैं। जबकि समाज हम हमेशा ये भाव रखते हैं कि व्‍यक्ति का व्‍यवहार किसी मानसिक रोग की वजह से बदला हुआ है। मेरा मानना ये है कि मानसिक रोगी के प्रति जो लोग दुर्भावना रखते हैं उन्‍हें स्‍वयं अपना उपचार कराना चाहिए और अपनी सोच बदलनी चाहिए।"

डॉक्‍टर आनंद प्रताप सिंह कहते हैं "वैसे देखा जाए तो हमारे समाज में बहुत सारे मिथ हैं। मानसिक रोग से शिकार व्‍यक्ति को लोग भूत-प्रेत से जोड़कर देखते हैं। कुछ समय पहले ऐसी ही एक घटना थी, जिसमें एक महिला मल्टिपल पर्सनैलिटी डिसऑर्डर से ग्रसित थी। जो अलग-अलग समय पर भिन्‍न प्रकार के व्‍यवहार करती थी, और महिला की इस हरकत को लो भूत-प्रेत और न जाने क्‍या-क्‍या कहते थे। यहां तक कि उसके परिवार वाले भी डर जाते थे। जबकि वह एक मानसिक रोगी थी। इस तरह की घटनाएं हमारे लिए 'एक बीमारी' और 'बीमार व्‍यक्ति' से ज्‍यादा और कुछ नहीं होता है। किसी भी मानसिक रोगी के व्‍यवहार को हम खुद पर हावी नहीं होने देते हैं।"

मनोरोग विशेषज्ञ को 'पागलों का डॉक्‍टर' बुलाए जाने पर क्‍या फील करते हैं? 

डॉक्‍टर आनंद प्रताप सिंह कहते हैं, जब किसी मनोरोग विशेषज्ञ को 'पागलों का डॉक्‍टर' कहकर बुलाया जाता है तो हमें अफसोस होता है। अफसोस इस बात का नहीं होता है कि हमें पागलों का डॉक्‍टर कहा जा रहा है। बल्कि, अफसोस इस बात का होता है कि जो लोग मानसिक बीमारी से ग्रसित हैं उन्‍हें लोग 'पागल' के तौर पर देख रहे हैं। ऐसी सोच वालों पर तरस आता है। जबकि वे लोग पागल नहीं है बल्कि एक मानसिक बीमारी है। जैसे लोगों में कैंसर, डायबिटीज, हार्ट प्रॉब्‍लम जैसी शारीरिक बीमारियां होती हैं उसी प्रकार यह एक मानसिक बीमारी है। मगर दुख इस बात का है कि समाज के द्वारा जो एक स्टिगमा (गलत धारणा) पैदा किया जाता है, जिसकी वजह से लोग मेंटल हेल्‍थ का उपचार कराने के लिए जाने से डरते हैं। मानसिक रोगी 'पागल' न कहलाएं इसलिए वह उपचार कराने से कतराते हैं, अपनी मानसिक परेशानियों को किसी से भी बताने से परहेज करते हैं। हालांकि, पहले के मुकाबले वर्तमान में इस प्रकार की सोच में बदलाव आया है। लोग अब मानसिक समस्‍याओं को गंभीरता से लेते हैं उनका उपचार कराते हैं। 

मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य की गंभीरता को आप इस प्रकार से ले सकते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने 'मन की बात' की बात कार्यक्रम में भी डिप्रेशन का मुद्दा उठाया था। जब ऐसे लीडर इस मुद्दे पर बात करते हैं तो निश्चित रूप से समाज में मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति अपनी सोच बदलते हैं। इस प्रकार की समस्‍याओं को दूर करने के लिए समाज के प्रबुद्ध वर्ग को आगे आना होगा, तभी हम इस 'कलंक' को मिटा पाएंगे।

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समय रहते लाखों 'सुशांत सिंह राजपूत' को बचाया जा सकता है!

डॉक्‍टर आनंद प्रताप सिंह ने कहा, वैसे तो मानसिक बीमारियों की वजह से हर दिन लोग मरते हैं, मगर इस प्रकार की घटना हम किसी सेलिब्रिटी के साथ होती देखते हैं तो यह मुद्दा बन जाता है। हाल ही में सुशांत सिंह राजपूत ने भी डिप्रेशन (मानसिक रोग) के कारण ही सुसाइड किया। सही समय पर उपचार हुआ होता तो उन्‍हें कोई समझने की कोशिश करता तो शायद उनकी जान बच जाती। ऐसे ही न जाने कितने सुशांत सिंह को हम बचा सकते हैं, उनका उपचार कर के। आज के समय में सबसे बड़ी समस्‍या है कि लोग खुद को डिप्रेशन में होने की बात स्‍वीकार ही नहीं करना चाहते हैं, जो किसी की जान बचाने की पहली सीढ़ी हो सकती है। हमें इस समस्‍या को स्‍वीकार कर उसका उपचार करना चाहिए। थोड़े दिन पहले दीपिका पादुकोण ने भी डिप्रेशन में होने की बात स्‍वीकार की थी और अब वह सामान्‍य जीवन जी रही हैं। ये एक ज्‍वलंत उदाहरण हैं, जिससे आप सीख लेकर खुद को मानसिक समस्‍याओं से मुक्‍त हो सकते हैं।

सरकार क्‍या कर रही है? 

डॉक्‍टर सिंह कहते हैं, सरकार काम तो कर रही है, मगर इसके बारे में और अधिक प्रचार-प्रसार की अवाश्‍यकता है। लोगों को जागरूक करने की जरूरत है। सरकार द्वारा जो राष्‍ट्रीय मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य कार्यक्रम चलाया जा रहा है, इसे और धक्‍का देने की जरूरत है। हालांकि इसकी ईकाई देश के तमाम जिलों में खुल चुकी है मगर लोगों की इस बात की जानकारी कम है। इसलिए जरूरी है कि जागरूकता फैलाया जाए। राष्‍ट्रीय मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य कार्यक्रम के तहत लोगों को मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति जागरूक किया जाता है। इसके प्रति जो भ्रांतियां हैं उसे दूर करने का प्रयास किया जाता है।

लॉकडाउन में लोग अपने खालीपन को कैसे दूर कर सकते हैं?

डॉक्‍टर आनंद प्रताप सिंह कहते हैं कि, "ये बात सही है कि कोरोना वायरस और लॉकडाउन की वजह से लोगों के जीवन में खालीपन आया है। मगर इसे दोबारा से भरने की आवश्‍यकता है। हमें ऐसी गतिविधियों को जीवन में शामिल करना चाहिए ताकि ये खालीपन दूर हो सके। सही मायने में लॉकडाउन ने हमें अपनी और अपनों की कीमत समझा दी है। हमें खुद के लिए जीने का जज्‍बा पैदा करना चाहिए। ये बात सही है कि इस दौरान बहुत से लोगों की नौकरियां चली गई हैं, जो डिप्रेशन का प्रमुख कारण हो सकता है, मगर यहां आपको ये समझना चाहिए कि 'समय' स्थिर नहीं है, ये सारी परेशानियां खत्‍म होंगी, सिर्फ धैर्य रखने की आवश्‍यकता है। परिवार को भी इसमें एक दूसरे को सपोर्ट करना चाहिए। डिप्रेशन में खुद को फिट रखने की कोशिश करना चाहिए, ताकि आप खुद को मानसिक रूप से स्‍वस्‍थ रह सकें।"

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