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कम वजन वाले शिशुओं को डायबिटीज का ज्यादा रहता है खतरा: शोध

लेटेस्ट By अनुराग अनुभव , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Feb 13, 2019
कम वजन वाले शिशुओं को डायबिटीज का ज्यादा रहता है खतरा: शोध

जिन बच्चों का वजन जन्म के समय सामान्य से कम होता है, ऐसे बच्चों को डायबिटीज का खतरा ज्यादा होता है। हाल में हुए एक शोध में इस बात की जानकारी दी गई है कि पैदा होने के दौरान जिन बच्चों का वजन आनुवांशिक कारणों से कम होता है, उनमें मधुमेह (डाइबीटिज-टा

जिन बच्चों का वजन जन्म के समय सामान्य से कम होता है, ऐसे बच्चों को डायबिटीज का खतरा ज्यादा होता है। हाल में हुए एक शोध में इस बात की जानकारी दी गई है कि पैदा होने के दौरान जिन बच्चों का वजन आनुवांशिक कारणों से कम होता है, उनमें मधुमेह (डाइबीटिज-टाइप 2) होने का खतरा अन्य स्वस्थ बच्चों की तुलना में बढ़ जाता है। शोधकर्ताओं ने बताया कि ऐसे बच्चों में ज्यादातर डायबिटीज टाइप-2 का खतरा होता है।

पैदाइशी कम वजन बच्चों को खतरा

यह शोध में अमेरिका के टुलेन यूनिवर्सिटी में किया गया है। प्रमुख शोधकर्ता तियांजे वांग ने कहा,“आम तौर पर जन्म के समय कम वजन वाले बच्चों को टाइप टू डाइबीटिज होने की आशंका ज्यादा होती है।” यह वह स्थिति है, जिसमें गर्भ में पल रहा बच्चा जितना बड़ा होना चाहिए, उसकी तुलना में छोटा होता है। जन्म के समय भ्रूण का विकास ठीक से नहीं होता है, तो पैदा होने वाला बच्चे का वजन कम होता है।

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शिशु हो सकता है कुपोषण का शिकार 

शोधकर्ताओं के अनुसार ऐसे बच्चों को डायबिटीज के अलावा अन्य समस्याएं भी हो सकती हैं, जिनमें कुपोषण, रक्त की कमी, संक्रमण और गर्भनाल की समस्याएं आदि शामिल हैं। अक्सर कम वजन वाले शिशुओं को कुपोषण का खतरा होता है। कई गंभीर मामलों में ऐसे बच्चों की जन्म से 5 साल के भीतर मौत भी हो जाती है। हालांकि ये उन महिलाओं में ज्यादा होती है, जो गरीबी या किसी अन्य कारण से अपने खानपान पर ध्यान नहीं दे पाती हैं।

कमजोर हो सकती हैं शिशु की हड्डियां

कई बार महिला के खराब स्वास्थ्य के कारण बच्चे की डीलिवरी जल्दी करनी पड़ती है। ऐसे में बच्चे सामान्य बच्चों की तुलना में कम वजन के पैदा होते हैं। ऐसे बच्चों को भविष्य में 'ऑस्टियोपेनिया' का खतरा होने की संभावना होती है। समय से पहले पैदा हुए कम वजन वाले अपरिपक्व शिशुओं (वीएलबीडब्ल्यू) बच्चों को भविष्य में  'ओस्टियोपेनिया' होने का खतरा होता है। इसमें बच्चों की हड्डियां कमजोर (ओस्टियोपेनिया) हो जाती हैं और इनके भविष्य में इसके टूटने के खतरे बने रहते हैं।

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