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छोटी-छोटी बातों पर पाबंदी बच्‍चों पर डालती है बुरा असर, जानें क्‍या चाहते हैं आपके बच्‍चे

परवरिश के तरीके By अतुल मोदी , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / May 15, 2019
छोटी-छोटी बातों पर पाबंदी बच्‍चों पर डालती है बुरा असर, जानें क्‍या चाहते हैं आपके बच्‍चे

टीनएज उम्र का एक ऐसा नाज़ुक दौर है, जब बच्चों का शारीरिक और भावनात्मक विकास तेज़ी से हो रहा होता है। ऐसे में पेरेंट्स के मन में अकसर यह सवाल उठता है कि इस दौरान उन्हें अपने बच्चों को कितना पर्सनल स्पेस देना चाहिए? आइए जानते हैं। 

किशोरावस्‍था यानी टीनएज में हमारा शरीर कई हार्मोनल बदलावों से गुजरता है, जिसकी वजह से बच्‍चों में कई शारीरिक और मानसिक परिवर्तन देखने को मिलते हैं, जिसका असर उनकी व्‍यक्तिगत जिंदगी में भी दिखाई पड़ता है। ऐसे में पेरेंट्स के लिए उनकी सही देखभाल करना बड़ी चुनौती बन जाती है। ऐसे वक्‍त में बच्‍चों की भावनाओं को समझने की जरूरत ज्‍यादा होती है। उन‍ पर किसी तरह पाबंदी या उनके पर्सनल स्‍पेस पर आक्रमण करने के बजाए माता पिता को चाहिए कि उन्‍हें अच्‍छी सीख दें और उनकी प्राइवेसी का भी सम्‍मान करें। यहां हम आपको कुछ ऐसे टिप्‍स दे रहे हैं जो आप और आपके युवा हो रहे बच्‍चों के बीच तालमेल बिठाने में मदद करेगा।  

 

ज्‍यादा पाबंदी ठीक नहीं

बच्चों को थोड़ा पर्सनल स्पेस देना बहुत ज़रूरी है। टीनएजर्स के शरीर में कई हॉर्मोनल बदलाव आ रहे होते हैं, जिसकी वजह से वे कुछ वक्त अकेले बिताना पसंद करते हैं। ऐसे में हेलीकॉप्टर पेरेंटिंग उनके लिए ठीक नहीं। इससे बच्चों कों ऐसा महसूस होता है कि माता-पिता मुझ पर विश्वास नहीं करते। पहले हमें अपने बच्चों का विश्वास जीतना चाहिए, तभी वे हमारे साथ सहज रहेंगे और निडर होकर हमसे अपनी समस्याओं के बारे में बात कर पाएंगे। ये बात सही है कि इस उम्र में बच्चे पेरेंट्स से अपनी सारी बातें शेयर नहीं करते। फिर भी वह अकसर अपने स्कूल और दोस्तों से जुड़ी परेशानियों के बारे में बताते हैं। इसलिए व्यक्तित्व के संतुलित विकास के लिए बच्चों को थोड़ा पर्सनल स्पेस देना ज़रूरी है।

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उनकी भावनाओं को समझें 

बच्चे भी कुछ पल अकेले बिताना चाहते हैं। माता-पिता को भी इस बात का पूरा ख्‍याल रखना चाहिए। पढ़ाई के बाद खेलने-कूदने की छूट दें लेकिन परिवार में अनुशासन के कुछ स्पष्ट नियम भी बनाएं। बच्‍चों को रोज़ाना शाम को सही समय पर घर वापस लौटने की सीख दें। कभी झूठ न बोलने की सीख दें। हालांकि यह संभव नहीं है कि दोस्तों, पढ़ाई और खेलकूद से जुड़ी हर बात मम्मी-पापा को बताई जाए। पढ़ाई पूरी करने के बाद जब बच्चे बीच में थोड़ा सा ब्रेक लेते हैं तो उस दौरान उन्हें पढऩे के लिए दोबारा नहीं टोकना चाहिए। यह बात बिलकुल सही है कि पेरेंट्स बच्‍चों की भलाई के लिए ही डांटते हैं पर उन्हें भी बच्‍चों की भावनाओं और ज़रूरतों को समझने की कोशिश करनी चाहिए। 

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संतुलित हो व्यवहार

आज के दौर में पेरेंट्स के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि बच्चों के पर्सनल स्पेस के दायरे में किन बातों को शामिल करना चाहिए? अगर परिवार का माहौल अच्छा हो और बच्चे को शुरू से ही नैतिक मूल्यों की अहमियत बताई जाए तो वे कभी भी अपनी आज़ादी का दुरुपयोग नहीं करेंगे। आप अपने बच्चों को नए दोस्त बनाने से रोकें नहीं पर उसे सही गलत की पहचान करना ज़रूर सिखाएं। अगर उसे पॉकेटमनी देती हैं तो उसकी एक सीमा तय करें। कई बार बच्चों का मूड खराब होता है और पेरेंट्स से बात नहीं करना चाहते तो उसी वक्त उनसे बार-बार उदासी की वजह पूछने के बजाय थोड़ी देर के लिए उन्हें अकेला छोड़ दें क्योंकि जबरन पूछताछ करने से बच्चे के व्यवहार में चिड़चिड़ापन आ जाता है। हां, प्रतिदिन उनके साथ सहज ढंग से बातचीत के लिए समय ज़रूर निकालें, ताकि वह आपके साथ भावनात्मक जुड़ाव महसूस करे।

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