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खुद में खोए रहना और दूसरों को नजरअंदाज करना है 'अवॉइडेंट पर्सनैलिटी डिसऑर्डर', नए बच्चे हो रहे हैं शिकार

बच्‍चे का स्‍वास्‍थ्‍य By पल्‍लवी कुमारी , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Nov 11, 2019
खुद में खोए रहना और दूसरों को नजरअंदाज करना है 'अवॉइडेंट पर्सनैलिटी डिसऑर्डर', नए बच्चे हो रहे हैं शिकार

पर्सनैलिटी डिसऑर्डर का इलाज करना अक्सर मुश्किल होता है, क्योंकि इन विकार वाले लोगों में सोच और व्यवहार से जुड़ी कई परेशानियां होती हैं। हालांकि, अवॉइडेंट पर्सनैलिटी डिसऑर्डर के बारे में जान लिया जाए और अपने बच्चों पर शुरू से ध्यान दिया जाए तो इससे

आपका बच्चा अगर अपने बेडरूम और स्टडी में ज्यादा समय बीताने लगा है और लोगों से मिलने-जुलने से दूर भागता है, तो उसे 'अवॉइडेंट पर्सनैलिटी डिसऑर्डर' हो सकता है। इस डिसऑजर के कारण बच्चे लगातार अपने रिश्तेदारों, पड़ोसियों और ज्यादा दोस्त बनाने से बचते हैं। अक्सर लोग ऐसे बच्चों को पहले शर्मिला समझते थे और सोचते थी कि ऐसे बच्चे ज्यादा बात करना नहीं पसंद करते। पर ऐसा न हो कि आप अपने बच्चे को लेकर यही सोचते रहें और उसमें 'अवॉइडेंट पर्सनैलिटी डिसऑर्डर' बढ़ता चला जाए। 1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक की शुरुआत में किए गए चार सामान्य जनसंख्या अध्ययन ने पर्सनैलिटी डिसऑर्डर के लिए विशिष्ट मूल्यांकन उपकरणों का उपयोग किया था और तब लगभग 5 प्रतिशत लोगों में ही पर्सनैलिटी डिसऑर्डर के कुछ लक्षण पाए गए थे। पर अब इस तरह के पर्सनैलिटी डिसऑर्डर भारत में 13.5 प्रतिशत पर पहुंच गया है। अब ऐसे में जरूरी है कि हम अपने बच्चों के स्वभाव पर हमेशा गौर करें और ध्यान देते रहें। इसी विषय पर 'ऑन्ली माई हेल्थ' ने डॉ. प्रखर सिंह से बात की जो कि एक मनोवैज्ञानिक चिकित्सक हैं।

Inside_avoidant personality disorder

अवॉइडेंट पर्सनैलिटी डिसऑर्डर कितना आम है?

यह अनुमान है कि भारत में लगभग 2.5 प्रतिशत लोगों को अवॉइडेंट पर्सनैलिटी डिसऑर्डर है। यह पुरुषों और महिलाओं को समान रूप से प्रभावित करता है पर अब ये बच्चों में बड़ी तेजी से फैल रहा है। यह आमतौर पर बचपन में ही शुरू होता है, जो बड़े होने के साथ बढ़ता ही जाता है। 18 वर्ष की आयु से कम उम्र के बच्चों में ये बीमारी अब गंभीर रूप ले रही है। डॉ. प्रखर सिंह की मानें तो अभी तक इस डिसऑर्डर सटीक कारण पता नहीं चला है। हालांकि, यह माना जाता है कि आनुवांशिकी, पर्यावरण और उनका बचपन कैसा बीता है, इन सभी कारकों पर इस पर असर पड़ सकता है।

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अवॉइडेंट पर्सनैलिटी डिसऑर्ड लक्षण क्या हैं?

इस विकार वाले लोगों के लिए, अस्वीकृति का डर इतना मजबूत है कि वे रिश्ते में जोखिम को अस्वीकार करने के बजाय अलगाव का चयन करते हैं। इस विकार वाले लोगों में व्यवहार का पैटर्न भिन्न हो सकता है। अपमान और अस्वीकृति के उनके डर के अलावा, इस विकार वाले लोगों के अन्य सामान्य लक्षणों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • बचपन से अकेले रहना या मां-बाप का उनपर कम ध्यान देना भी बच्चों को इस डिसऑर्ड का शिकार बनाता है।
  • वे आलोचनात्मक या अस्वीकृति से आसानी से आहत होते हैं।
  • करीबी दोस्त और कुछ परिवार वालों के अलावा सबसे अलग हो कर रहना।
  • नए लोगों व रिश्तेदारों से घबराना।
  • लोगों से मिलने में अत्यधिक चिंता (घबराहट) और सामाजिक सिटिंग्स में भय का अनुभव करना।
  • सामाजिक स्थितियों में शर्मीले, अजीब व आत्म-जागरूक होना।
  • नया करने या चांस लेने से डरना।

एपीडी का इलाज क्या है?

एपीडी के इलाज के लिए, आप उपचार के निम्नलिखित तरीकों का विकल्प चुन सकते हैं:

  • मनोचिकित्सा: संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी एपीडी के लिए एक उपचार विकल्प है, जिसमें डॉक्टर इस बात पर विचार करते हैं कि किसी की सोच पैटर्न और विचार प्रक्रिया को कैसे बदला जाए, इस प्रकार बच्चे के कार्यों व सोच को प्रभावित किया जा सकता है।
  • साइकोडायनामिक मनोचिकित्सा: साइकोडायनामिक थेरेपी में आपके अचेतन विचारों से अवगत कराना शामिल है। यह आपको यह पता लगाने में मदद करता है कि आपके अतीत के अनुभव आपके व्यवहार को कैसे तय करते हैं। आपके पिछले भावनात्मक दर्द इस तकनीक से हल किए जा सकते हैं ताकि आप अपने जीवन को आगे बढ़ा सकें। इसमें मां-बाप, भाई-बहन, दोस्त और अन्य परिवार वालों की मदद ली जाती है।
  • दवाएं: अवसाद और चिंता के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली एंटी-डिप्रेसेंट दवाएं एपीडी के इलाज के लिए इस्तेमाल की जा सकती हैं।

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इस जानकारी की सटीकता, समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर सम्भव प्रयास किया गया है हालांकि इसकी नैतिक जि़म्मेदारी ओन्लीमायहेल्थ डॉट कॉम की नहीं है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्देश्य आपको जानकारी मुहैया कराना मात्र है।

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