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    काला और सफेद मोतिया में अंतर

    ग्‍लाउकोमा By Anubha Tripathi , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Mar 12, 2012
    काला और सफेद मोतिया में अंतर

    सफेद मोतियाबिंद ऑपरेशन से  ठीक हो जाता है, लेकिन काला मोतिया आंखों की रोशनी छीन लेता है।

    काला मोतिया (ग्लूकोमा) और सफेद मोतिया (कैटरेक्ट) में काफी अंतर है। सफेद मोतियाबिंद ऑपरेशन से  ठीक हो जाता है, लेकिन काला मोतिया आंखों की रोशनी छीन लेता है। काला मोतिया के शिकार ज्यादातर मरीज अपनी आंखों की रोशनी गंवा बैठते हैं। कभी कभी आपको इसके कोई लक्षण नहीं दिखाई देते हैं, अचनाक ही आपको एक आंख से कम दिखाई देने लगता है। वहीं सफेद मोतिया से नई तकनीक आ जाने के कारण छुटकारा पाया जा सकता है।   

    काला मोतिया व सफेद मोतिया में अंतर


    काला मोतिया का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि इस रोग में एक बार दृष्टि की जितनी हानि हो चुकी होती है, उसे किसी भी इलाज से वापस लाना मुश्किल होता है। इसके विपरीत कैटरेक्ट या सफेद मोतियाबिंद इतना खतरनाक नहीं है। इसमें ऑपरेशन के बाद आंखों की रोशनी को वापस लाया जा सकता है। सफेद मोतिया के इलाज के लिए फेमटोसेकंड लेजर  का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे सफेद मोतिया से निजात पाया जा सकता है।

    काला मोतिया

    काला मोतिया ऐसी बीमारी है जो आंखों में दबाव बढ़ने से जुड़ी हुई है। हमारी आंखों में एक तरल पदार्थ भरा होता है जिससे आंखों का आकार बनाए रखने में मदद मिलती है और लैंस तथा कार्निया को पोषण मिलता है। ऐसे में मरीज की आंखों से तरल पदार्थ ठीक से बाहर नहीं निकल पाता। इससे आंख के अंदर दबाव बढ़ जाता है और रक्त वाहिकाएं ऑप्टिक नर्व की ओर  बढ़ जाती हैं। नर्व कोशिकाएं धीरे-धीरे मरती जाती हैं और इसके साथ-साथ दृष्टिहीनता भी बढ़ती जाती है। जिसे ठीक  किया जाना संभव नहीं होता। आमतौर पर काला मोतिया का पता तब तक नहीं चलता जब तक मरीज दृष्टिहीन नहीं हो जाता।

    लक्षण

    • आंखों के सामने छोटे-छोटे बिंदु और रंगीन धब्बे दिखाई देना।
    • आंखों के आगे इंद्रधनुष जैसी रंगीन रोशनी का घेरा दिखाई देना।
    • चक्कर आना और मितली आना।
    • आंखों में तेज दर्द होना।
    • साइड विजन को नुकसान होना और बाकी विजन नॉर्मल बनी रहती हैं।


    सफेद मोतिया

    आज के दिन भारत में 90 लाख लोग सफेद मोतिया के शिकार हैं। अगर सही इलाज हो, तो यह हमारी आंखों का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है। क्योंकि अब इसके इलाज के लिए नई नई तकनीक आ चुकी हैं। फेमटोसेकंड लेजर तकनीक ने सफेद मोतिया के इलाज को काफी आसान बना दिया है। इस सर्जरी में लेंस को तराशने और काटने जैसे तकनीकी रूप से कठिन काम नहीं करने पड़ते हैं। इस लेजर प्रक्रिया के इस्तेमाल से जख्म तेजी से भरते हैं, और आंखों की रोशनी भी पहसे से बेहतर होती है,  किस तरह के संक्रमण होन की संभावना भी कम होती है।

    लक्षण

    • धुंधला दिखाई देना।
    • अंधेरा में देखने में दिक्कत होना।
    • रोशनी बहुत तेज दिखना
    • दोहरा दिखाई देना।
    • रंग साफ़ से दिखाई नहीं देना।
    • बार बार चश्मा बदलना ।

    Disclaimer

    इस जानकारी की सटीकता, समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर सम्भव प्रयास किया गया है हालांकि इसकी नैतिक जि़म्मेदारी ओन्लीमायहेल्थ डॉट कॉम की नहीं है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्देश्य आपको जानकारी मुहैया कराना मात्र है।

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