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भारत के डॉक्टर टीबी के लक्षणों को पहचानने में हैं नाकाम, पढ़ें पूरी रिपोर्ट

लेटेस्ट By ओन्लीमाईहैल्थ लेखक , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Sep 28, 2018
भारत के डॉक्टर टीबी के लक्षणों को पहचानने में हैं नाकाम, पढ़ें पूरी रिपोर्ट

टीबी एक ऐसा रोग है जिसकी चपेट में दुनियाभर के लाखों लोग हैं। यह एक संक्रमण रोग है जो तेजी से लोगों को अपना शिकार बनाता है। 

टीबी एक ऐसा रोग है जिसकी चपेट में दुनियाभर के लाखों लोग हैं। यह एक संक्रमण रोग है जो तेजी से लोगों को अपना शिकार बनाता है। हाल ही में एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत में कई निजी क्षेत्र के डॉक्टर क्षयरोग (टीबी) के लक्षणों को पहचानने में नाकाम हैं। इस वजह से मरीजों का उचित उपचार नहीं हो पाता। मंगलवार को प्रकाशित एक नए अध्ययन में ऐसा दावा किया गया है। इस अध्ययन में उन लोगों को शामिल किया गया जो इस बीमारी के लक्षण दिखाने का अभिनय कर सकें। ।टीबी हवा से फैलने वाला संक्रामक रोग है जो भारत, चीन और इंडोनेशिया समेत कई अन्य देशों में जन स्वास्थ्य का एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। ।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक 2017 में इस बीमारी के चलते 17 लाख लोगों की जान गयी थी और इस बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए बुधवार को संयुक्त राष्ट्र में एक वैश्विक स्वास्थ्य सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। लेकिन इस महामारी को खत्म करने की जंग में कमजोर कड़ी प्राथमिक उपचार करने वाले फिजिशियन हैं जो मरीज को एकदम शुरूआत में देखते हैं जब उन्हें खांसी आना शुरू होती है। अध्ययन में कहा गया कि कम से कम दो शहर मुंबई महानगर और पूर्वी पटना में तो निश्चित तौर यह स्थिति है।

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इस प्रयोग के लिए वित्तीय प्रबंध बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने किया। यह अध्ययन 2014 से 2015 के बीच करीब 10 महीनों तक मैकगिल यूनिवर्सिटी, विश्व बैंक और जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के अनुसंधानकर्ताओं की एक टीम ने किया। मरीज बनाकर पेश किए गए 24 लोग 1,288 निजी क्षेत्र के चिकित्सकों के पास गए। इन्होंने साधारण बलगम से लेकर ऐसा बलगम निकलने के लक्षण बताए जिससे लगे कि वह ठीक होकर फिर से बीमार हो गए हैँ। बातचीत के 65 प्रतिशत मामलों में चिकित्सकों ने जो आकलन किए वे स्वास्थ्य लाभ के भारतीय एवं अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरे नहीं उतरते। इनमें दोनों तरह के डॉक्टर शामिल थे - योग्य, अयोग्य एवं वे जो पारंपरिक दवाओं से उपचार करते हैँ।

टीबी का इलाज

टीबी के इलाज में प्रथम चरण में रोग को संक्रमणमुक्त बनाने की कोशिश की जाती है ताकि साथ रहने वावों और परिवार के सदस्यों में खतरा न रहे। रोग के लक्षण , रोगी की स्थिति और अन्य मापदंड़ो को ध्यान में रखते हुए इलाज के लिए दवा की खपराक तय की जाती है। टीबी के इलाज में इलाज प्रक्रिया के प्रभावी प्रबंधन के लिए रोगी का सतत निरीक्षण जरूरी है। अपनी बिमारी तथा इलाज के बारे में रोगी को जागरुक बनाना तथा शिक्षित करना सबसे अहम है क्योकि अगर रोगी को स्वयं सभी जानकारियां होंगी तो दवा से लेकर अन्य प्रक्रियाओं में भी प्रभावित बेहतर होगी। इसके साथ ही, रोगी के परिवार के तत्काल सदस्य को जागरुक बनाना तथा शिक्षित करना जरूरी है, खासकर ऐसे व्यक्ति को जिसका परिवार पर ज्यादा असर हो और जिसको रोगी की देखभाल  के लिए उपयुक्त समझा गया हो।

इन सबसे किसी कदर भी कम महत्व नहीं है इस बात का कि रोगी का इलाज थोड़ा लंबा तो चलता ही है साथ ही शारीरिक अस्वस्थता के लंबा खिंच जाने के कारण रोगी तथा परिवार वाले भी टूटने लगते हैं। जिससे इलाज प्रक्रिया में बाधा पहुंच सकती है। ऐसा देका गया है कि कमजोर आर्थिक स्थिति वाले रोगी तथा उनके परिवार  को टीबी के इलाज के दौरान आर्थिक संकंट के कारण इलाज को बीच में ही छोड़ देने या इसे अंशत: ही करवाने की समस्या आ जाती है। अत: ऐसे रोगी तथा उनके परिवारों को समाजिक आर्थिक सहायता तथा सलाह की सख्त जरूरत होती है।

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