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सांस के साथ अंदर ले रहे अगर ये 1 गैस, तो खतरे में है आपके फेफड़े और दिल

तन मन By Khushboo Vishnoi , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Jul 26, 2017
सांस के साथ अंदर ले रहे अगर ये 1 गैस, तो खतरे में है आपके फेफड़े और दिल

एक नए अध्ययन से पता चला है कि ओजोन के संपर्क में आने से दिल का दौरा पड़ने का खतरा बढ़ जाता है। इससे उच्च रक्तचाप और आघात की चपेट में आने की आशंका भी बढ़ जाती है। जबकि पूर्व में किए गए अध्ययनों से साफ हो चुका है कि ओजोन के संपर्क में आना फेफड़ों के

एक नए अध्ययन से पता चला है कि ओजोन के संपर्क में आने से दिल का दौरा पड़ने का खतरा बढ़ जाता है। इससे उच्च रक्तचाप और आघात की चपेट में आने की आशंका भी बढ़ जाती है। जबकि पूर्व में किए गए अध्ययनों से साफ हो चुका है कि ओजोन के संपर्क में आना फेफड़ों के लिए घातक होता है।

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ozone gas

ओजोन गैस है शरीर के लिए घातक

विशेषज्ञों के मुताबिक, ओजोन एक खतरनाक प्रदूषक है। वातावरण में इसका निर्माण उस समय होता है जब वाहनों से निकले धुएं से में मौजूद कार्बनिक यौगिक सूरज की रोशनी के संपर्क में आकर उससे रासायनिक प्रतिक्रिया करते हैं। इसी तरह नाइट्रोजन ऑक्साइड और कोयला के जलने से निकले धुएं भी सूरज की रोशनी से मिलकर ओजोन बनाते हैं।  

चीन की ड्यूक कुनशान यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता जुनफेंग झांग ने बताया,  हम जानते हैं कि ओजोन श्वसन प्रणाली को क्षतिग्रस्त कर सकता है। यह फेफड़ों को कमजोर कर सकता है और इससे अस्थामा का दौरा पड़ सकता है। लेकिन मौजूदा अध्ययन में हम यह जानना चाहते थे कि ओजोन मनुष्य के स्वास्थ को अन्य किसी प्रकार से, खासकर हृदय प्रणाली को भी प्रभावित कर सकता है या नहीं।

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सामने आए ये निष्कर्ष

इसके लिए शोधकर्ताओं ने चीन के चांगशा शहर में 89 स्वस्थ वयस्कों का एक साल तक अध्ययन किया गया। उन्होंने अन्य प्रदूषकों के साथ-साथ घर के अंदर और घर के बाहर ओजोन स्तरों की निगरानी की। उन्होंने प्रतिभागियों के रक्त और मूत्र की चार अंतरालों पर जांच की।

जांच के नतीजों ने प्रतिभागियों में जलन, रक्तचाप, खून जमने से जुड़े अवयवों की मौजूदगी की पुष्टि की। ये लक्षण आगे चल कर विभिन्न बीमारियों का कारण बन सकते हैं। शोधकर्ताओं ने कहा, पृथ्वी का तापमान बढ़ने से विश्वभर में आजोन ज्यादा बनेगा। ओजोन ऐसा प्रदूषक है जिस पर नियंत्रण करना मुश्किल है क्योंकि वायुमंडल में इसका निर्माण बेहद जटिल है। यह अध्ययन  ‘जेएएमए  इंटरनल मेडिसिन’ जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

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