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जानें गैजेट्स और स्मार्टफोन्स कैसे बदल रहे हैं आपके बच्चे की साइकोलॉजी

परवरिश के तरीके By Anurag Gupta , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Oct 07, 2018
जानें गैजेट्स और स्मार्टफोन्स कैसे बदल रहे हैं आपके बच्चे की साइकोलॉजी

आजकल बच्चे बोलना बाद में सीखते हैं और स्मार्टफोन चलाना पहले सीख लेते हैं। कम उम्र में ही स्मार्टफोन्स और गैजेट्स का प्रयोग आपके बच्चे की साइकोलॉजी (मनोविज्ञान) को प्रभावित करता है।

आजकल बच्चे बोलना बाद में सीखते हैं और स्मार्टफोन चलाना पहले सीख लेते हैं। कम उम्र में ही स्मार्टफोन्स और गैजेट्स का प्रयोग आपके बच्चे की साइकोलॉजी (मनोविज्ञान) को प्रभावित करता है। शोध में पाया गया है कि पहले की अपेक्षा आजकल के बच्चों की डिजिटल समझ जल्दी और तेजी से विकसित होती है। इसलिए बच्चे कम उम्र में ही गेम खेलना, म्यूजिक प्ले करना, वीडियोज प्ले करना और फोटो के लिए पोज देना सीख लेते हैं। आइए आपको बताते हैं कि इस 'स्मार्ट युग' में स्मार्ट गैजेट्स से घिरे आपके बच्चों की साइकोलॉजी पर क्या प्रभाव पड़ता है।

सोशल और इमोशनल डेवलपमेंट प्रभावित

स्मार्टफोन और इंटरनेट ने बच्चों की कम्यूनिकेशन स्किल और इमोशनल डेवलपमेंट को भी प्रभावित किया है। स्मार्टफोन के उपयोग से बच्चे मॉ़डर्न और स्मार्ट तो बन रहे हैं लेकिन खुद उनके अभिभावको से उनका कनेक्शन कम हो रहा है। स्टडी के अनुसार बच्चे सबसे ज्यादा फेस-टू-फेस कम्यूनिकेशन से सीखते हैं। लेकिन स्मार्ट गैजेट्स के प्रयोग के कारण बच्चों में लोगों से फेस-टू-फेस इंटरैक्शन कम हुआ है। इससे उनका सोशल डेवलपमेंट प्रभावित हो रहा है।

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कमजोर हो रहा है बच्चों का शब्दकोश

दो-ढाई साल तक हर बच्चा बोलना और सुनना सीखता है। इस दौरान उसका अपना शब्द भंडार तैयार होता है। इस उम्र में यदि बच्चे स्मार्टफोन के साथ समय बिताएंगे तो उनके बोलने और सुनने की प्रक्रिया में बाधा आएगी और उनका शब्द कोश कमजोर होगा। गैल कहती है कि अभिभावकों को यह बात सोचनी होगी कि स्मार्टफोन बच्चों की स्वतंत्र सोच को भी प्रभावित करता है। इससे रचनात्मकता पर भी असर पड़ता है।

दिन के 15-25 प्रतिशत समय स्क्रीन देखने में

शोध में पाया गया है 10 साल से बड़े 50 से 60 प्रतिशत बच्चे अपने दिन का 15 से 25 प्रतिशत समय स्क्रीन के सामने गुजारते हैं। वहीं 16 साल से बड़े 60-65 प्रतिशत बच्चे दिन का 20-30 प्रतिशत समय स्क्रीन पर गुजारते हैं। दरअसल आजकल हम लोग चारों तरफ स्क्रीन वाले डिवाइसेज से घिरे हुए हैं। बचपन से स्मार्टफोन का प्रयोग, टीवी पर कार्टून और फिल्में देखना, लैपटॉप और टैबलेट्स के इस्तेमाल से बच्चों की आंखें तो प्रभावित होती ही हैं, उनका मनोविज्ञान भी प्रभावित होता है। यहां तक कि आजकल ढेर सारे स्कूलों में प्रोजेक्टर और स्क्रीन के सहारे डिजिटल स्टडी करवाई जाती है।
इनमें से अधिकतर बच्चे कम से कम 150 बार पूरे दिन में स्क्रीन देखते हैं। इस कारण बच्चों का गार्डेन, बास्केटबॉल और खिलौनों से रिश्ता टूट गया है। अब बच्चे सुबह उठने के बाद बैग संभलाने की तैयारी के जगह स्मार्टफोन चेक करते हैं।

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दिमाग पर पड़ता है बुरा प्रभाव

जब हम ऐसे डिवाइस बच्चों को देते हैं, तो वे डिवाइस से निकलने वाली आवाज और रोशनी के प्रति प्राकृतिक आवाज और रोशनी की तुलना में कहीं ज्यादा आकर्षित होते हैं। इसके कारण बच्चों की प्रकृति और समाज से जुड़ने की स्वाभाविकता खत्म हो जाती है। अब अगर बच्चा बचपन से इन इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन वाले डिवाइसेज का इस्तेमाल करता है तो उसका दिमागी विकास इससे प्रभावित होता है। इन डिवाइसेज की वजह से दिमाग में विकसित होने वाली कई महत्वपूर्ण सेल्स पैदा होने के साथ ही धीरे-धीरे नष्ट होने लगती हैं, जिससे बच्चा कुछ विशेष कामों में पीछे रह जाता है। खास बात ये है कि इनमें से ज्यादातर सेल्स का विकास दोबारा नहीं हो पाता है और बच्चों को उस खास दिमागी विकृति के साथ ही जीवन गुजारना पड़ सकता है।

हो सकती हैं ये परेशानियां

इन डिवाइसेज के इस्तेमाल आमतौर पर बच्चों को जो परेशानियां होती हैं वो हैं- किसी चीज पर फोकस न कर पाना, ध्यान न लगा पाना, दिमाग एकाग्र न होना, चीजें जल्दी भूल जाना, सही-गलत के निर्णय क्षमता में कमी, एटीट्यूड में बदलाव, लोगों की बातों को ठीक तरह से न समझ पाना और इसी कारण कई बार बद्तमीजी और जिद्दीपन का स्वभाव अपना लेना आदि कई परेशानियां हैं।

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