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कान में कुछ भी डालने से पहले जान लें ये 5 जरूरी बातें

अन्य़ बीमारियां By अतुल मोदी , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Apr 16, 2018
कान में कुछ भी डालने से पहले जान लें ये 5 जरूरी बातें

जिसे हम कान साफ करना कहते हैं, दरअसल वह हमारे लिए मुसीबत बन सकता है। कॉटन स्‍कैब भले ही देखने में नाजुक लगता हो, लेकिन यह हमारे कान के पर्दों को नुकसान पहुंचा सकता है।

कुछ लोगों को लगातार कॉटन स्‍वैब से कान साफ करने की आदत होती है। वे लगातार कान की वैक्‍स और गंदगी साफ करते रहते हैं। हालांकि इसके कई दुष्‍प्रभाव हो सकते हैं। इससे न केवल कान के पर्दे को नुकसान पहुंच सकता है, बल्कि कई अन्‍य संभावित नुकसानों से भी इनकार नहीं किया जा सकता।  अपने कान साफ करने के लिए लोग कई अनोखी चीजों का इस्‍तेमाल करते हैं। इनमें से कुछ तो वाकई बड़ी अजीब किंतु खतरनाक होती हैं। लोग कॉटन स्‍कैब (क्‍यू-टिप्‍स), हेयर पिन, चिमटी, पेन या पेन्सिल, स्‍ट्रॉ, पेपर क्लिप और यहां त‍क कि बच्‍चों के खिलौनों तक का इस्‍तेमाल करते हैं।

क्‍या होता है कॉटन स्‍कैब

ईयर कैनाल में मौजूद कोशिकायें कैरुमन का निर्माण करती हैं, जिसे सामान्‍य भाषा में ईयर वैक्‍स कहा जाता है। कुछ लोगों में यह ईयर वैक्‍स दूसरों के मुकाबले अधिक निर्मित होती है। इससे जमी वैक्‍स कुछ हद तक सुनने की क्षमता को कम कर देती है। साथ ही इसमें दर्द भी होता है। किसी डॉक्‍टर की मदद लेने के बजाय अधिकतर लोग कॉटन स्‍कैब से यह वैक्‍स हटाने का आसान रास्‍ता अपनाते हैं। लोगों को लगता है कि डॉक्‍टर के पास जाकर समय और पैसे बर्बाद करने से अच्‍छा है कि इस वैक्‍स को खुद ही निकाल लिया जाए। लेकिन इससे उन्‍हें फायदा कम नुकसान ज्‍यादा होता है।

पर्दे को नुकसान

रूई का यह फोहा आसानी से कान के पर्दे तक पहुंच जाता है। कान का पर्दा बहुत संवेदनशील होता है और स्‍कैब के मामूली दबाव से भी वह क्षतिग्रस्‍त हो सकता है। जिस व्‍यक्ति के कान का पर्दा क्षतिग्रस्‍त हुआ हो, उससे पूछिये कि इसका दर्द क्‍या होता है। यह दर्द इतना भयानक होता है कि व्‍यक्ति को खाने-पीने में भी तकलीफ होती है। पंक्‍चर हुआ कान का पर्दा धीरे-धीरे ठीक हो जाता है, लेकिन सुनने की क्षमता को सामान्‍य स्‍तर पर पहुंचने में समय लगता है।

तो क्‍या करें

तो ऐसे में सवाल उठता है कि क्‍या हमें वाकई अपने कान साफ करने की जरूरत होती है। इसका जवाब भी थोड़ा दुविधा भरा है। इसके जवाब में हां और ना दोनों शामिल हैं। कान का बाहरी हिस्‍सा जो नजर आता है, उसे कभी-कभार साफ किया जाना चाहिये। इस काम को आप थोड़े से साबुन, पानी और तौलिये से कर सकते हैं।

कॉटन स्‍कैब से सुनने की क्षमता जा सकती है

ज्‍यादातर मामलों में ईयर कैनाल को साफ करने की जरूरतन नहीं होती। नहाते या शॉवर के समय हमारे कान में इतना पानी चला जाता है कि जमी हुई वैक्‍स अपने आप ही ढीली हो जाती है। इसके साथ ही कान के अंदर की त्‍वचा कुदरती रूप से कुंडलीय आकार में बढ़ती रहती है। जैसे ही यह हटती है, वैक्‍स भी अपने आप हट जाती है। कई बार जब आप सो रहे होते हैं, तो वैक्‍स अपने आप ही बाहर निकल जाती है। कॉटन स्‍कैब की जरूरत सही मायनों में तो है ही नहीं।

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डॉक्‍टरी मदद की दरकार

ऐसे लोग जिनके कान में बहुत ज्‍यादा वैक्‍स जमा होती है, उन्‍हें डॉक्‍टरी सहायता की जरूरत होती है। डॉक्‍टर पानी में थोड़ा सा पेरोक्‍साइड मिलाकर उसे कान में इंजेक्‍ट कर आसानी से वैक्‍स को बाहर निकाल सकते हैं। इस प्रक्रिया में दर्द बिलकुल नहीं होता। कान में जमी वैक्‍स निकालने के लिए यह तरीका बेहद प्रभावशाली है। अगर यह समस्‍या काफी ज्‍यादा रहती है तो मरीज अपने डॉक्‍टर से यह प्रक्रिया समझकर इसे घर पर ही कर सकता है।

अगर आपके कान में वैक्‍स और गंदगी जमा हो रही है, तो आप चिकित्‍सक की सहायता ले सकते हैं। आप उससे पूछ सकते हैं कि सुरक्षित तरीके से अपने कान कैसे साफ किये जाएं। अपने कान में कभी भी कोई भी चीज न डालें, अपनी उंगली भी नहीं। इससे वैक्‍स भी और ज्‍यादा होगी और साथ ही इससे आपका ईयर ड्रम भी क्षतिग्रस्‍त हो सकता है। सही तरीका तो यह है कि अगर आपको समझ में न आ रहा हो कि क्‍या किया जाए, तो आपको डॉक्‍टर से सहायता लेनी चाहिये। 

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ईयरवैक्‍स की भूमिका

ईयरवैक्‍स सफाई, लुब्रिकेशन और रक्षा की तिहरी भूमिका निभाती है।

सफाई

ईयरवैक्‍स ईयरकैनाल के बाहरी हिस्‍से की मृत त्‍वचा कोशिकाओं को पकड़ लेती है। जहां बाकी शरीर की मृत कोशिकायें कपड़ों से रगड़कर और पानी आदि से अपने आप हट जाती हैं। वहीं कान की डेड स्किन वैक्‍स के जरिये ही हटती है।

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लुब्र‍िकेशन

ईयरवैक्‍स लुब्रिकेशन में भी मदद करती है। यह एपिडर्मिस यानी बाहरी त्‍वचा को हाइड्रेट करती है। इससे जलन की आशंका कम हो जाती है।

सुरक्षा
और अंत में ईयरवैक्‍स कान की अंदरूनी त्‍वचा की रक्षा करती है। धूल मिट्टी और गंदगी इससे चिपक जाती है, जिससे कान को नुकसान होने का खतरा कम हो जाता है।

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