हर्निया के रोगियों को नहीं होगी अब परेशानी, नई और सस्ती तकनीक से होगा इलाज

हर्निया के रोगियों को नहीं होगी अब परेशानी, नई और सस्ती तकनीक से होगा इलाज

पेट की मांसपेशियां कमजोर हो जाने वाली जगह से आंतें बाहर निकल आने की समस्या हर्निया कहलाती है।

पेट की मांसपेशियां कमजोर हो जाने वाली जगह से आंतें बाहर निकल आने की समस्या हर्निया कहलाती है। इस स्थिति में हर्निया की जगह एक उभार हो जाता है। मनुष्य के शरीर के अंदर कुछ अंग खोखले स्थानों में मौजूद होते हैं। इन खोखले स्थानों को बॉडी केविटी कहते हैं। दरअसल बॉडी केविटी चमड़ी की झिल्ली से ढकी होती है। जब इन केविटी की झिल्लियां कभी-कभी फट जाती हैं तो अंग का कुछ भाग बाहर निकल जाता है। इस विकृति को ही हर्निया कहा जाता है।

अब हर्निया के मरीजों के लिए अच्छी खबर यह है कि गंगाराम अस्पताल में कार्यरत चिकित्सक मनीष कुमार गुप्ता ने हर्निया की सर्जरी के लिए नई तकनीक ढूंढ़ निकाली है। यह तकनीक न केवल सस्ती है, बल्कि केवल 5 एमएम के 3 की-होल बनाकर यह सर्जरी की जा सकती है। उन्होंने कहा कि अब तक इस तकनीक की मदद से 100 से ज्यादा सर्जरियां की जा चुकी हैं। जो कामयाब रही हैं।'

डॉ. मनीष ने सर्जरी की इस नई तकनीक को '555 मनीष टेक्निक' नाम दिया है। उन्होंने बताया कि ग्रोइन हर्निया की सर्जरी के लिए पहले ओपन सर्जरी की जाती थी। बाद में लेप्रोस्कोपी, यानी दूरबीन की मदद से सर्जरी की जाने लगी। अब तक की जाने वाली सर्जरी में चौड़े हसन ट्रोकार का इस्तेमाल करते हुए हर्निया तक पहुंचा जाता था। हसन ट्रोकार के लिए नाभि के नीचे 1.5 से 2 सेंटीमीटर का कट लगाया जाता था।

जबकि इस प्रक्रिया में पेट की दीवार में टांके नहीं लगाने पड़ते हैं। लेकिन पुरानी प्रक्रिया में हसन ट्रोकार के चैड़े कोन डालने के कारण पेट की भीतरी दीवार में टांके लगाने पड़ते हैं। इस नई तकनीक में छोटे चीरे लगाने से दर्द कम होता है। संक्रमण की आशंका कम होती है और निशान भी बहुत छोटा आता है, जो कि महिलाओं के लिए उपयुक्त है। 

पुरानी तकनीक में 12 एमएम का एक छेद किया जाता था और फिर दो 5 एमएम के छेद किए जाते थे। अब तक इस्तेमाल होने वाले हसन ट्रोकार में सर्जरी पॉइंट तक पहुंचने में 8 से 10 मिनट लगते हैं और ट्रोकार का ट्रैक देखना भी संभव नहीं है। नई तकनीक में केवल 5 एमएम के तीन छेद किए जाते हैं।

IANS

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