• shareIcon

कृत्रिम गर्भाधान के खतरे

आज साइंस ने इतनी प्रगति कर ली है कि अभिभावक ना बनने वाले जोड़ों को कृत्रिम गर्भाधान के जरिये मातृत्व का सुख मिल रहा है, लेकिन इस सुख के कुछ खतरे भी हैं, इनके बारे में इस स्‍लाइडशो में जानें।

गर्भावस्‍था By Gayatree Verma / Oct 12, 2015

कृत्रिम गर्भाधान

आइवीएफ मतलब कृत्रिम गर्भाधान जिसमें साइंस की मदद से गर्भाधारण किया जाता है। इस तकनीक का सबसे ज्यादा फायदा उन जोड़ों को होता है जिन्हें कुछ शारीरिक समस्याओं के चलते संतान का सुख नहीं मिल पाता। इस तकनीक में अंडे और शुक्राणु को पेट्री डिश में निषेचित किया जाता है। 40 घंटे में जब यह मिश्रण निषेचित हो जाता है तब इस अंडे को महिला के गर्भ में डाल दिया जाता है। लेकिन इस उपाय के कुछ गंभीर खतरे भी हैं, जिन्हें नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता है। चलिये जानें कि क्या हैं कृत्रिम गर्भाधान से जुड़े यह खतरे -

समय से पहले जन्म

देखा गया है कि आईवीएफ के कई मामलों में बच्चों का जन्म समय से पहले ही हो जाता है। इस तकनीक के जरिये बच्चों की डिलिवरी अधिकतर मामलों में नौ महीने की जगह सात महीने में ही हो जाती है, और सात महीने के भीतर जन्म लेने वाले अधिकतर बच्चों का वजन सामान्य बच्चों की तुलना में काफी कम होता है।

एक से अधिक बच्चे

इस बात को आप खुशी के तौर पर लें या फिर किसी और ढ़ंग से, लेकिन आईवीएफ की ये सबसे बड़ी जटिलता है कि इस तकनीक से पैदा हुए बच्चो के अधिकतर मामलों में एक गर्भ में एक से अधिक शिशुओं का जन्म हुआ है। काफी मामलों में इस तकनीक के जरिये ट्विन्स या ट्रिपलेट्स ही पैदा होते हैं।

डिम्बग्रंथि अति-उत्तेजना सिंड्रोम

डिम्बग्रंथि अति-उत्तेजना सिंड्रोम (ओएचएसएस-ओवरियन हायपर स्टीमुलेशन सिंड्रोम) के जरिये अंडा उत्पादन या फर्टिलिटी को बढ़ावा देने के लिए दवाओं का प्रयोग किया जाता है, जिनके रिएक्शन की काफी आशंका रहती है। रिएक्शन होने की स्थिति में पेट में सूजन या तेज़ दर्द, मतली व उल्टी आदि लक्षण देखने को मिलते हैं।

डाउन्स सिंड्रोम

एक रिपोर्ट के अनुसार कृत्रिम गर्भाधान के जरिये पैदा होने वाले बच्चों में डाउन्स सिंड्रोम का ख़तरा अधिक होता है। डाउन्स सिंड्रोम वाले बच्चों में शारीरिक और मानसिक विकास की दृष्टि से असामान्यता देखने को मिलती है। कई बार तो गर्भावस्था विफल भी हो जाती है या फिर बच्चा आनुवंशिक बीमारियों के साथ पैदा होता है।

सफलता का स्तर कम होता है

इस तकनीक की मदद से बच्चे पैदा करना काफी महंगा होता है, लेकिन बांझपन का इससे बेहतर इलाज नहीं है। महंगे होने के अलावा इस तकनीकी में पहले प्रयास के सफल होने की दर भी बहुत ज्यादा नहीं है। इस तकनीक में पहले प्रयास में सफल गर्भधारण की संभावना कम ही होती है।

Disclaimer

इस जानकारी की सटीकता, समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर सम्भव प्रयास किया गया है हालांकि इसकी नैतिक जि़म्मेदारी ओन्लीमायहेल्थ डॉट कॉम की नहीं है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्देश्य आपको जानकारी मुहैया कराना मात्र है।

More For You
This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy. OK