जानें क्या है महा मुद्रा करने का सही तरीका और इसके फायदे

आज हम एक ऐसी लाभकारी मुद्रा, महा मुद्रा को करने की विधि और इसके फायदों के बारे में बता रहे हैं, जोकि विशेष तौर पर पेट और गुदा स्वास्थ्य के लिये बेहद लाभदायक होती है।

योगा By Rahul Sharma / Jun 15, 2016
महा मुद्रा का महत्व

महा मुद्रा का महत्व


योग के अनुसार आसन और प्राणायाम की स्थिति मुद्रा कहलाती है। बंध, क्रिया और मुद्रा में आसन और प्राणायाम दोनों ही होते हैं। योग में मुद्राओं को आसन और प्राणायाम से भी बेहतर माना जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि आसन से शरीर की हडि्डयां लचीली और मजबूत बनती है, मुद्राओं से शारीरिक और मानसिक शक्तियों का विकास होता है। आज हम ऐसी ही लाभकारी मुद्रा, महा मुद्रा को करने की विधि और इसके फायदों के बारे में बता रहे हैं, जोकि विशेष तौर पर पेट और गुदा स्वास्थ्य के लिये बेहद लाभदायक होती है।

महा मुद्रा को करने की विधि - पहला चरण

महा मुद्रा को करने की विधि - पहला चरण


महा मुद्रा करने के लिए सबसे पहले मूलबंध लगाकर बैठें और दाहिनी एड़ी से कंद (मलद्वार और जननांग का बीच का भाग) को दबा लें। अब बाएं पैर को सीधा करें और आगे की ओर झुककर बाएं पैर के अंगूठे को दोनों हाथों से पकड़ लें। इसके बाद सिर को नीचे झुकाते हुए बाएं घुटने से छुला लें। इस स्थिति को जानुशिरासन के नाम से भी जाना जाता है। आपको बता दें कि महामुद्रा में जानुशिरासन के साथ-साथ, बंध और प्राणायाम किया जाता है। आगे आते समय सांस को भीतर भरें और इसे रोकते हुए जालंधर बंध करें (ठुड्डी को छाती के साथ दबाकर रखें)। सांस को छोड़ते हुए जितनी देर तक हो सके उड्डीयान बंध (नाभी को पीठ में सटाना) करें।

महा मुद्रा को करने की विधि - दूसरा चरण

महा मुद्रा को करने की विधि - दूसरा चरण



अब दाहिने पैर को सीधा करें और बाईं एड़ी से कंद को दबाते हुए इसी क्रिया को दोबारा करें। इस करते हुए आज्ञाचक्र पर ध्यान केंद्रित करें और दृष्टि भ्रूमध्य रखें। जितनी देर तक संभव हो इस मुद्रा को करें। इसके बाद महाबंध और महाभेद का अभ्यास करें। महामुद्रा, महाबंध और महाभेद को एक दूसरे के बाद ही करना चाहिए।

महा मुद्रा करने के फायदे

महा मुद्रा करने के फायदे


इस मुद्रा के काफी लाभ होते हैं। इसके नियमित अभ्यास से रक्त शुद्ध होता है। यदि समुचित आहार के साथ इसका अभ्यास किया जाय तो यह सुनबहरी जैसे असाध्य रोगों को भी ठीक करने की शक्ति रखती है। इसके अलावा बवासीर, कब्ज, अम्लता और इस प्रकार की अन्य समस्याएं भी इस मुद्रा के अभ्यास से दूर की जा सकती हैं। साथ ही इसके अभ्यास से पाचन क्रिया तीव्र होती है तथा तंत्रिकातंत्र स्वस्थ और संतुलित होता है।
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