सकारात्‍मक सोच को बढ़ाने के सात तरीके

सकारात्‍मक सोच से व्‍यक्ति के अंदर न केवल उर्जा का संचार होता है बल्कि यह नेतृत्‍व क्षमता का विकास भी करती है, इसलिए सकारात्‍मक सोच बढ़ाने की कोशिश की जानी चाहिए।

मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य By Nachiketa Sharma / Nov 25, 2014
बढ़ायें सकारात्‍मक सोच

बढ़ायें सकारात्‍मक सोच

सकारात्‍मक सोच आपके अंदर न केवल उर्जा का संचार करती है बल्कि आपको एक बेहतर इनसान भी बनाती है। इसलिए सकारात्‍मक सोच बढ़ाने की कोशिश की जानी चाहिए। सकारात्मक सोच के बिना व्‍यक्ति के अंदर नेतृत्व क्षमता का विकास संभव नहीं हो सकता है। सकारात्मक सोच मनोवैज्ञानिक तरीके से विकसित किया जा सकता है। सकारात्‍मक सोच के बिना आत्मविश्वास एवं जागरूकता का विकास करना शायद ही संभव हो। तो आज से ही सकारात्‍मक सोच बढ़ाने के तरीके जरूर आजमायें।

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शिकायत न करें

शिकायत न करें

किसी काम से बचने का सबसे अच्‍छा तरीका हमारे पास शायद यही होता है, हम किसी भी चीज या माहौल की शिकायत कर उसे बुरा बनाते हैं। जबकि वास्‍तव में आप किसी चीज को किस नज‍रिये से देखते हैं वो ज्‍यादा मायने रखता है। इसलिए अपने आसपास के माहौल की शिकायत करने के बजाय उसे सकारात्‍मक तरीके से लेने की कोशिश कीजिए।

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अच्‍छे से रखें अपनी बात

अच्‍छे से रखें अपनी बात

सकारात्‍मक सोच को बढ़ाने का सबसे अच्‍छा तरीका यह भी है कि आप लोगों के सामने अपनी बात को अच्‍छे से रखें, अगर कोई आपके प्रति अच्‍छा व्‍यवहार नहीं रखता है फिर भी उसे अपनी बात सही तरीके से और सलीके से कहें। इसका फायदा आपको मिलेगा और नकारात्‍मक सोच से आप बचेंगे।

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विचारों को लिखें

विचारों को लिखें

आप जो भी सोचते हैं, दिमाग में जिस तरीके के विचार आते हैं उन्‍हें जरूर लिखें, और इसे सुबह के वक्‍त लिखने की कोशिश करें। 10 या उससे अधिक बातों को रोज सुबह लिखकर उसका मूल्‍यांकन करें। इसमें अपने घरवालों, आसपास के माहौल, दोस्‍तों और सहकर्मियों के बारे में सकारात्‍मक बातें लिखें।

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मुस्‍कान है जरूरी

मुस्‍कान है जरूरी

आपकी एक छोटी सी मुस्‍कान न केवल आपके अंदर ऊर्जा का संचार करती है बल्कि इससे आपके आसपास मौजूद लोगों में सकारात्‍मक भावना पैदा होती है। इसलिए हमेशा मुस्‍कान बिखेरते रहें। इस संसार में मुस्‍कुराने की कई वजहें हैं, उन वजहों और उन हसीन पलों को याद करके हंसते रहें और सकारात्‍मक सोच को बढ़ाते रहें।

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ईर्ष्‍या है दुश्‍मन

ईर्ष्‍या है दुश्‍मन

जलन की भावना हमारी सबसे बढ़ी दुश्‍मन है। दूसरे के प्रति राग, द्वेष, ईर्ष्‍या रखने से मन में हीन भावना पैदा होती है और यह हमारे अंदर मौजूद अच्‍छाई को समाप्‍त करती है। इसलिए दुसरों की उपलब्धियों और विकास से ईर्ष्‍या करने की बजा उससे सींख लें और आगे बढ़ने के लिए अथक प्रयास करें।

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कुछ न कुछ करते रहें

कुछ न कुछ करते रहें

हीन भावना, नकारात्‍मक सोच, आदि विचार हमारे दिमाग में तब आते हैं जब हमारे पास करने के लिए कुछ नहीं होता और हम खाली होते हैं। इसलिए हमेशा कुछ न कुछ करते रहें, खुद को अच्‍छे कामों में उलझाये रखें। अगर आपके पास करने के लिए कुछ न हो तो जरूरतमंद लोगों के पास जाकर उनकी मदद करें। यह आपके अंदर अच्‍छी सोच पैदा करेगा।

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सकारात्‍मक इच्‍छा रखें

सकारात्‍मक इच्‍छा रखें

आपने अपने जीवन में कई अच्‍छे काम किये होंगे और उन्‍हें करने का अनुभव भी अलग होगा। ये अच्‍छे काम ही आपकी सकारात्‍मक सोच को न केवल बढ़ाते हैं बल्कि ये आपकी सकारात्‍मक जरूरत भी बन जाते हैं। आपके जो पहले किया है उसे बाद में भी कीजिए। उलझनों से निकलकर सकारात्‍मक और अच्‍छे विचारों में अपनी जरूरतों को तलाशें।

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