हॉर्मोन असंतुलन से गर्भधारण में हो सकती है परेशानी

हॉर्मोन असंतुलन का असर महिला के शरीर पर पड़ता है, साथ इसके कारण गर्भधारण करने में समस्‍या होती है, इससे मासिक धर्म समय पर नहीं आता और एमेनोरिया की स्थिति भी आ जाती है।

गर्भावस्‍था By Nachiketa Sharma / Dec 04, 2014
हार्मोन असंतुलन और प्रेग्‍नेंसी

हार्मोन असंतुलन और प्रेग्‍नेंसी

मां बनना हर महिला का सपना होता है। लेकिन कई कारणों से महिलायें गर्भधारण करने में असफल रहती हैं, हार्मोन में असंतुलन उनमें से एक है। वास्‍तव में गर्भवती होने के लिए हार्मोन में संतुलन होना बहुत जरूरी है। अगर किसी भी हार्मोन में असंतुलन हो जाये तो गर्भधारण करने में परेशानी होती है। गर्भधारण के लिए मासिक धर्म की भूमिका बहुत महत्‍वपूर्ण होती है, लेकिन एस्‍ट्रोजन हार्मोन में असंतुलन के कारण मासिक धर्म अनियमित हो जाता है और गर्भधारण करने में समस्‍या होती है। इसके अलावा अन्‍य हार्मोन जैसे - फोलिकल उत्‍तेजक हार्मोन (एफएसएच), ल्‍यूटीनाइजिंग हॉर्मोन (एलएच) और प्रोजेस्‍टेरॉन की भूमिका भी महत्‍वपूर्ण होती है। गर्भधारण के लिए इन सबके बीच में संतुलन होना बहुत आवश्‍यक है।

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हार्मोन क्‍या है

हार्मोन क्‍या है

हार्मोन कोशिका या ग्रंथि द्वारा निर्मित ऐसे रसायन होते हैं जो शरीर के दूसरे हिस्से में स्थित कोशिकाओं को प्रभावित करते हैं। शरीर का विकास, मेटाबॉलिज्म और इम्यून सिस्टम पर हार्मोन्स का प्रभाव सीधे तौर पर पड़ता है। सामान्‍यतया हमारे शरीर में कुल 230 हॉर्मोन होते हैं, जो शरीर की अलग-अलग क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। इसकी छोटी-सी मात्रा ही कोशिका के मेटाबॉलिज्म को बदलने के लिए पर्याप्‍त होती है। ये एक केमिकल मैसेंजर की तरह एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक संदेशों को पहुंचाते हैं। ज्‍यादातर हॉर्मोन्स का संचरण खून के जरिये होता है।

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महिलाओं के हार्मोंस

महिलाओं के हार्मोंस

पुरुषों और महिलाओं के हार्मोन अलग-अलग होते हैं। महिलाओं के हॉर्मोन उनके शरीर ही नहीं उनकी भावनाओं को भी बदलते हैं। इन्‍हें फीमेल हॉर्मोन कहा जाता है। फीमेल हार्मोन यौवनावस्था, मातृत्व और मेनोपॉज के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही हॉर्मोन मासिक धर्म और प्रजनन चक्र को भी नियंत्रित रखते हैं। ओवरी यानी अंडाशय द्वारा सबसे महत्वपूर्ण जिस हॉर्मोन का निर्माण होता है वह है फीमेल सेक्स हॉर्मोन। इन्हें सेक्स स्‍टेरॉयड भी कहा जाता है, ये दो होते हैं - एस्ट्रोजन और प्रोजेस्‍टेरॉन। ओवरी कुछ मात्रा में टेस्टोस्‍टेरॉन और एंड्रोजन भी बनाती है, लेकिन इन्हें मेल हार्मोन माना जाता है। गर्भधारण में इनकी महत्‍वपूर्ण भूमिका होती है।

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एमेनोरिया (Amenorrhea)

एमेनोरिया (Amenorrhea)

इसे ऋतुरोध भी कहते हैं, मासिक धर्म न आने पर यह स्थिति पैदा होती है। जब किसी महिला को मासिक धर्म नहीं होता है, इसका सामान्‍य मतलब है कि उसके हॉर्मोन में संतुलन नहीं है। कई बार हार्मोन में अंसतुलन के कारण ही एमेनोरिया की स्थिति आती है। फोलिकल उत्‍तेजक हार्मोन की अधिकता के कारण (ऐसी स्थिति अंडाशय की असफलता के कारण आती है), मेनोपॉज और समय से पहले मेनोपॉज के कारण भी एमेनोरिया की स्थिति आती है। अगर स्‍ट्रेजन हॉर्मोन का स्‍तर भी कम है तो इसके कारण मासिक धर्म नहीं आता। इसके कारण गर्भधारण करने में समस्‍या होती है।

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माधिक धर्म की समस्‍या

माधिक धर्म की समस्‍या

प्रत्‍येक महिला को 12-16 साल की आयु के दौरान मासिक धर्म होना शुरू हो जाता है, यह सामान्‍यतया 3 से 7 दिन तक रहता है। इस समय गर्भाशय से रक्‍त स्राव होता है। मासिक चक्र महिला की प्रजनन प्रणाली में परिवर्तन लाता है, जिससे महिलाएं प्रजनन के लिए तैयार होती हैं। इससे माह के 5-7 दिनों तक गर्भाशय की गर्भधारण की क्षमता बढ़ती है। यह प्रत्येक महिला में अलग-अलग हो सकती है। कुछ महिलाओं में यह समय 2-3 दिन तक ही रहता है। सामान्‍यतया मासिक धर्म 28 से 32 दिन के बीच में आता है, लेकिन एस्‍ट्रेजन हॉर्मोन का स्‍तर बढ़ने के कारण यह समय कम हो जाता है और दोबारा मासिक धर्म जल्‍दी आ जाता है।

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मासिक धर्म का लंबा होना

मासिक धर्म का लंबा होना

पीरियड्स अगर नियमित है तो यह 28-32 दिन के बीच में आता है, लेकिन अगर हॉर्मोन में असंतुलन है तो मासिक धर्म चक्र 35 दिन के बाद आता है। इसके लिए सबसे अधिक जिम्‍मेदार पॉलिसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम उत्‍तरदायी होता है। यह सिंड्रोम महिलाओं में मेल हॉर्मोन (एंड्रोजन) के स्‍तर बढ़ने के कारण असंतुलित होता है। इसके कारण अधिक रक्‍स्राव होता है और महिला गर्भधारण करने में अक्षम रहती है।

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ओव्‍यूलेशन

ओव्‍यूलेशन

ओव्यूलेशन ऐसा चक्र है जो जिसमें यौन संबंध बनाने से गर्भधारण की संभावना अधिक शत-प्रतिशत रहती है। इसमें गर्भाशय के अंडों का आकार काफी विकसित हो जाता है जिससे उनमें गर्भ ठहरता है। इसके लिए पीरियड के पहले दिन से लेकर दसवें दिन और पीरियड की संभावित तारीख के एक सप्ताह पहले का समय छोड़कर जो दिन बचते हैं यानी 10वें दिन से लेकर 23वें दिन तक का समय माना जाता है। हर महिला में प्रेगनेंसी की स्थितियां और ओव्यूलेशन प्रक्रिया अलग-अलग होती हैं। लेकिन ल्‍यूटीनाइजिंग हॉर्मोन (एलएच) का स्‍तर कम होने के कारण गर्भाशय के अंडों का पूर्ण विकास नहीं हो पाता है और इस दौरान यौन संबंध बनाने के बावजूद गर्भधारण नहीं हो पाता है।

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शरीर पर प्रभाव

शरीर पर प्रभाव

हॉर्मोन के अंसतुलन के कारण महिला के शरीर पर भी प्रभाव पड़ता है। इसके कारण उनका मूड अक्सर खराब रहता है और वे चिड़चिड़ी हो जाती हैं। इसके कारण स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍यायें जैसे - मुहांसे, चेहरे और शरीर पर अधिक बालों का उगना, समय से पहले उम्र बढ़ने के लक्षण, सेक्स के प्रति अनिच्छा, जैसी समस्‍यायें होती हैं। इसके कारण महिलाओं को वजन भी बढ़ जाता है।

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