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क्या है एग फ्रीजिंग और क्यों बना गया ये चर्चा का विषय

एप्पल और फेसबुक जैसे बड़ी कंपनियों ने अपनी महिला कर्मचारियों के सामने मां बनने का सपना टालने का प्रस्ताव रखा है, जिसके बदले कंपनी इन कर्मचारियों को अपने अंडाणु फ्रीज करवाने के एवज में लाखों रुपये दे रहीं है।

सभी By Rahul Sharma / Jan 07, 2015

चर्चा में क्यों है एग फ्रीजिंग?

अभी तक एप्पल और फेसबुक जैसे बड़ी कंपनियां अपने कर्मचारियों को मुफ्त लंच, ड्राय क्लीनिंग और मसाज जैसी सुविधाएं दे रहीं थीं, लेकिन अब ये कंपनियां अपनी महिला कर्मचारियों को फ्रोजन एग्स की सुविधा भी दे रहे हैं। मतलब कि इन दिग्गज कंपनियों ने अपनी महिला कर्मचारियों के सामने मां बनने का सपना टालने का प्रस्ताव रखा है, जिसके बदले कंपनी इन कर्मचारियों को अपने अंडाणु फ्रीज करवाने के एवज में लाखों रुपये दे रहीं है।
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बड़ा लुभावना ऑफर

इस ऑफर के तरह एप्पल और फेसबुक कर्मचारियों को इंफर्टिलिटी ट्रीटमेंट्स, स्पर्म डोनर्स और एग्स फ्रीज करने के लिए 20000 डॉलर  (भारतीय मुद्रा में करीब 12 लाख रूपए) दे रही हैं। कंपनियों के मुताबिक ऐसा करने से महिलाएं अपने करियर पर ठीक से फोकस कर पाएंगी और वक्त बीतने के बाद भी आसानी से मां बन पाएंगी।
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क्या है एग फ्रीजिंग

एग फ्रीजिंग अधिक उम्र में बच्चों को जन्म देने की ख्वाहिश रखने वाली महिलाओं के बीच 'इंश्योरेंस पॉलिसी' से भी मशहूर है। एग फ्रीजिंग के लिए माहवारी के 21वें दिन से जीएनआरएच एनालॉग के साथ यह प्रक्रिया शुरू होती है और माहवारी आने तक जारी रहती है। इसके बाद गोनेडोट्रॉफीन हॉर्मोन की बड़ी खुराक दी जाती है, जो ओवरी को इस तरह सक्रिय कर देती है, कि वह अधिक संख्या में अंडाणु पैदा कर सके। फिर मासिक चक्र के दूसरे दिन से लेकर 10 से 12 दिन तक रोजाना इंजेक्शन दिए जाते हैं। अंडाणु के एक खास आकार में आने के बाद उसे पूर्ण परिपक्व अवस्था में लाने के लिए हयूमन क्रॉनिक गोनेडोट्राफीन का इंजेक्शन दिया जाता है। 30 घंटे बाद महिला को बेहोश कर उसकी ओवरी से इन अंडाणु को निकाला लिया जाता है। परिपक्वता के आधार पर अच्छे अंडाणुओं को छांटकर लिक्विड नाइट्रोजन में रख दिया जाता है, जो कि माइनस 196 सेंटीग्रेट (-320 फारेनहाइट) पर जमता है।
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कुछ सवाल भी हैं

जिस तरह फ्रीज में रखा एक दिन पुराना खाना पौष्टिक नहीं रहता, ठीक उसी तरह सुरक्षित अंडाणु कितना स्वस्थ रह सकेगा, यह एक बड़ा प्रश्न है। एक बड़ा सवाल यह भी कि क्या 40 से 45 की उम्र तक महिलाए रिटायर होकर पूरी तरह बच्चों के लिए समय निकाल पाएंगी? इतने लंबे वक्त के लिये दफ्तर जाकर और चीजों को अपने हिसाब से नियंत्रित करने के बाद अचानक उसे पूरी तरह छोड़ने पर वे किस मानसिक व शारीरिक स्थिति में होंगी?  
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क्या सोचता है कार्पोरेट जगत

कंपनियों के इस फैंसले से यह बात तो खुलकर सामने आ गई है कि उनके हिसाब से किसी भी लड़की के लिए मातृत्व और कैरियर को एक साथ लेकर चलना दोधारी तलवार पर चलने जैसा है।
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क्या ये सच कामाल का विकल्प है?

यूं तो पहली नजर में कंपनियों का ये फैंसला लड़कियों को बड़ी राहत देता नजर आता है। अर्थात जो लड़कियां अपने कैरियर पर पूरा ध्यान देना चाहती हैं, कंपनी उनके मातृत्व संबंधी पक्ष के लिए बड़ी चिंतित और सहानुभूति रखती दिखाई पड़ती है। सही भी है कि किसी भी लड़की के लिए मातृत्व और कैरियर को एक साथ लेकर चलना हर एक दृष्टिकोण से चुनौतीभरा काम है। खासतौर पर इसलिए क्योंकि दोनों ही चीजें एक समय में, एक ही इंसान से अपने-अपने लिए सौ प्रतिशत दिये जाने की जरूरत करती हैं।
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मां बनने की उम्र में बदलाव

ध्यान दिया जाए तो अपने अंडाणुओं को फ्रीज किये बिना भी न सिर्फ भारतीय समाज में, बल्कि पूरी दुनिया में लड़कियों के मां बनने की उम्र में भारी बदलाव हुआ है। पिछली पीढ़ी की लड़कियां 15 से 20 साल की उम्र में मां बन चुकी थीं। वहीं उनकी बेटियां 25 से 30 की आयु में मां बनी, या फिर इससे भी आगे की उम्र में। मां बनने की उम्र में यह बदलाव निश्चित तौर पर लड़कियों की शिक्षा और नौकरी के बदलते आयमों के चलते आया है। जिसे टाला नहीं जा सकता और टाला जाना नहीं चाहिए।
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सही समय पर फ्रीज़ करना जरूरी

उम्र बढऩे के साथ अंडाणु की संख्या भी घटती है और वो पहले जितने स्वस्थ भी नहीं रहते। अंडाणु फ्रीज करने की सबसे सही उम्र 20 से 30 (आदर्श तौर पर 35 से पहले) होती है। उम्र जितनी कम होगी, मां बनने की संभावना उतनी अधिक होती है। यह तरीका बांझपन झेल रही महिलाओं के लिए भी एक विकल्प पेश करता है।
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