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रात में इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया से हो सकती है अनिद्रा और अवसाद की समस्‍या

रात के वक्‍त इलेक्‍ट्रॉनिक उपकरणों का अधिक प्रयोग करने के कारण अनिद्रा और अवसाद के समस्‍या की संभावना बढ़ती है, क्‍योंकि इनसे निकलने वाला रेडिएशन हमारे दिमाग को प्रभावित करता है।

मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य By Nachiketa SharmaFeb 13, 2015

रात में इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया का प्रभाव

उन्‍नत तकनीक का असर हमारी दिनचर्या पर काफी हद तक पड़ा है और इसका सबसे अधिक नुकसान स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं के रूप में देखा जा सकता है। रात में मोबाइल फोन, टेलीविजन, कंप्‍यूटर, म्‍यूजिक सिस्‍टम आदि का अधिक प्रयोग करने के कारण अनिद्रा और अवसाद की समस्‍यायें बढ़ रहीं हैं। इनके कारण नींद पूरी नहीं हो रही है और हमारा शरीर बीमारियों का घर बनता जा रहा है। आगे की स्‍लाइड में जानिये किस तरह से इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया के कारण अनिद्रा और अवसाद की समस्‍या बढ़ रही है।
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शोध के अनुसार

रात में डिजिटल मीडिया के प्रयोग के कारण होने वाले स्‍वास्‍थ्‍य प्रभाव के बारे में कई शोध भी हुए हैं। स्वीडन में हुए एक रिसर्च से पता चला कि सोने के पहले मोबाइल फोन और दूसरे मीडिया के इस्तेमाल से स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इन गजेट से निकलने वाले रेडिएशन के कारण व्यक्ति अनिद्रा व सिरदर्द की शिकायत से तो त्रस्त रहता ही है। साथ ही उसे मीठी नींद से भी वंचित रहना पड़ता है।
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दिमाग पर असर

स्‍वीडन में हुए शोध की मानें तो रात में डिजिटल मीडिया के प्रयोग के कारण दिमाग पर भी असर पड़ता है। इसके कारण एकाग्रता में भी कमी आती है व व्यक्ति डिप्रेशन का शिकार भी हो सकता है। इस सबका उसके व्यक्तित्व पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है। दिमाग की सक्रियता कम होती है।
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अवसाद की संभावना

रात में डिजिटल मीडिया के प्रयोग के कारण अवसाद की संभावना भी बढ़ रही है और इसकी चपेट में सबसे अधिक युवा और किशोर आ रहे हैं। युवाओं में स्‍मार्टफोन का प्रयोग का चलन दूसरे मीडिया उपकरणों की तुलना में अधिक देखने को मिलता है। इससे निकलने वाले रेडिएशन से सिरदर्द के साथ अवसाद की समस्‍या अधिक हो रही है।
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भरपूर नींद से वंचित

व्यक्ति स्वस्थ रहे, इसके लिए गहरी नींद बहुत जरूरी है, क्योंकि इसी दौरान हमारा शरीर दिनभर में क्षतिग्रस्त हुई कोशिकाओं की मरम्‍मत करता है और इसी दौरान कोशिकाएं पुनर्जीवित भी होती हैं। मोबाइल नींद में बाधा पहुंचाकर इन सारे रास्तों को बंद कर देता है, जो युवा देर रात तक मोबाइल पर बात करते रहते हैं, उनके लिए यह खबर खतरे की घंटी है और वे पूरी नींद नहीं ले पा रहे हैं।
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युवा और किशोर अधिक प्रभावित

वायरलेस इंटरनेट के बढ़ते प्रयोग के कारण रेडिएशन के बढ़ने की आशंका सबसे अधिक होती है। इसका अधिक प्रयोग युवा और टीनेजर कर रहे हैं। 2007 में बेसल यूनिवर्सिटी द्वारा किये गये शोध की मानें तो, डिजिटल मीडिया के बढ़ते प्रयोग के कारण युवाओं में अवसाद और अनिद्रा की समस्‍या बढ़ रही है।
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इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया कैसे पहुंचा रहा नुकसान

अमेरिकन केमिकल सोसायटी द्वारा किये गये शोध की मानें तो इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया का दखल हमारी दिनचर्या में सबसे अधिक हुआ है और यह हमारे दिमाग पर हावी हो चुका है। जैसे शाम ढलती है हमारा दिमाग सोने की तैयारी करता है, शाम की लाल रोशनी का संपर्क जब आंखो की गहराई में स्थित कोशिका में पाए जाने वाले प्रोटीन मेलानोप्सीन से होता है, तब ऐसा होता है। लेकिन मीडिया के इन उपकरणों से नीली रोशनी निकलती है, और नीली रोशनी के संपर्क में आते ही कोशिकाएं दिमाग को जगने का संकेत भेजने लगती हैं और गहरी..
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कैसे करें बचाव

इनसे बचाव न किया गया तो इसका असर भविष्‍य में पड़ सकता है और इसके कारण दिमाग की सक्रियता भी कम हो जाती है, यह भूलने की बीमारी (डिमेंशिया आदि) का कारण बन सकता है। इसलिए रात के वक्‍त इन उपकरणों का कम से कम प्रयोग करने की कोशिश करें। अपने बेडरूम में टीवी और म्‍यूजिक सिस्‍टम तो बिलकुल न लगायें। स्‍मार्टफोन और टैब पर भी काम करने से बचें।

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इस जानकारी की सटीकता, समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर सम्भव प्रयास किया गया है हालांकि इसकी नैतिक जि़म्मेदारी ओन्लीमायहेल्थ डॉट कॉम की नहीं है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्देश्य आपको जानकारी मुहैया कराना मात्र है।

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