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ग्लूकोमा से कैसे बचें

ग्लूकोमा से कैसे बचें
Quick Bites
  • काला मोतिया के नाम से जाना जाता है ग्लूकोमा।
  • ऑप्टिक नर्व की कोशिकाओं का नष्ट हो जाती है।
  • नसों पर इंट्राओक्युलर प्रेशर सहनशक्ति से ज्यादा।
  • जल्द से जल्द इलाज ही सबसे बड़ा बचाव है।

ग्लूकोमा को काला मोतिया के नाम से भी जाना जाता है। इस बिमारी में दृष्टि को दिमाग तक ले जाने वाली नस (ऑप्टिक नर्व) की कोशिकाएं धीरे-धीरे नष्ट होने लगती हैं। जिस तरह हमारा ब्लड प्रेशर होता है, उसी प्रकार से आंखों का भी प्रेशर होता है। इसे इंट्राओक्युलर प्रेशर कहा जाता है। जब इंट्राओक्युलर प्रेशर आंखों की नस की सहन की क्षमता से अधिक हो जाता है, तो उसके तंतुओं को नुकसान होने लगता है, इसे ग्लूकोमा कहा जाता है।

 

  • ग्लूकोमा धीरे-धीरे आंखों की रोशनी छीन लेता है। अगर समय रहते काला मोतिया का इलाज नहीं कराया गया तो ऑप्टिक नर्व को काफी नुकसान पहुंच सकता है। ग्लूकोमा द्वारा हुआ दृष्टि का नुकसान अक्सर सफल इलाज के बाद भी वापस नहीं आता है। इसलिए इसका जल्द से जल्द इलाज ही सबसे बड़ा बचाव है।


  • ग्लूकोमा की वजह से आंखों की रोशनी को जितना नुकसान हुआ उसे वापस लाना संभव नहीं होता है। क्योंकि उसका कोई इलाज नहीं है। डॉक्टर सिर्फ इस इलाज में जुट जातें हैं कि आगे आंखों की रोशनी ठीक रहे। महत्वपूर्ण बात यह है कि इसका इलाज उम्र भर चलता है। इसमें सबसे पहला काम यह किया जाता है कि आंख के प्रेशर को कम कर दिया जाए। आंख के प्रेशर को कम करने के लिए डॉक्टर मरीज को आई-ड्रॉप्स डालने की सलाह देते हैं।

  • मरीज की स्थिति के मुताबिक हो सकता है एक से ज्यादा आई-ड्रॉप्स डालने को कहा जाए। कई बार इसके साथ कुछ दवाएं भी खाने को दी जाती हैं। जब तक डॉक्टर कहे, दवा लेते रहना चाहिए आंखों की नियमित जांच कराते रहना चाहिए। ग्लूकोमा होने पर हर छह महीने या एक साल पर आंखों की जांच करानी चाहिए, जिससे पता चलता रहे कि इलाज सही चल रहा है या नहीं। कुछ डॉक्टर हर तीन महीने बाद भी चेकअप कराने की सलाह देते हैं।

 

  • कई बार ऐसा भी होता है कि दवा से बात नहीं बनती। कभी दवा के साइड इफेक्ट्स होने लगते हैं तो या फिर मरीज ही दवा से छुटकारा पाना चाहता है। ऐसे में डॉक्टर लेजर ट्रीटमेंट या ऑपरेशन कराने की सलाह देते हैं।

 

  • यह इलाज सबसे आसान है। शुरुआत में दवाई देते हैं, लेकिन दवाओं से नजर कमज़ोर होती जाती है। बाद में लेजर सर्जरी की जाती है। यह पूरी तरह सुरक्षित होती  है। सर्जरी के बाद भी मरीज को आंखों की नियमित जांच करवानी चाहिए कि कहीं ग्लूकोमा फिर से तो नहीं हो रहा है।



दवाओं से फायदा नहीं होने पर डॉक्टर ऑपरेशन की सलाह देते हैं। यह एक बड़ा ऑपरेशन होता है। ऑपरेशन के हफ्ते भर बाद आंख सामान्य हो जाती है। इसमें किसी तरह का कोई खतरा नहीं होता है। यह पूरी तरह से सुरक्षित है। इस ऑपरेशन के बाद भी आंखों की जांच कराते रहना चाहिए।

 

 

Image Source-Getty

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Written by
Anubha Tripathi
Source: ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभागDec 03, 2015

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