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प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाएं कैसे रखें होने वाले शिशु को डायबिटीज से दूर? जानें जरूरी बातें

महिला स्‍वास्थ्‍य By अनुराग अनुभव , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Jan 25, 2012
प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाएं कैसे रखें होने वाले शिशु को डायबिटीज से दूर? जानें जरूरी बातें

प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज का शिकार होने या डायबिटिक महिला के प्रेग्नेंट होने पर होने वाले शिशु को भी डायबिटीज होने का खतरा होता है। इससे बचाव के लिए महिला को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, जानें।

कई बार महिलाएं प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज (Gestational Diabetes) का शिकार हो जाती हैं, जिसके कारण उनके होने वाले शिशु को भी डायबिटीज होने का खतरा होता है। इसके अलावा जो महिलाएं पहले से डायबिटीज की रोगी हैं, उनके होने वाले शिशु को भी अनुवांशिक तौर पर डायबिटीज होने का खतरा होता है। प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज न सिर्फ महिला, बल्कि उसके होने वाले शिशु के लिए भी खतरनाक हो सकता है। हालांकि स्वयं पर थोड़ा ध्यान देकर आप ना केवल गर्भावस्था की जटिलताओं से बच सकती हैं बल्कि स्वस्थ शिशु को भी जन्म दे सकती हैं।

जेस्टेशनल डायबिटीज क्या है और क्यों होती है

यह जरूरी नहीं है कि आपको इसके लिये इंसुलिन लेनी ही पड़े। जेस्टेशनल डायबिटीज का इलाज इसकी स्थिति पर निर्भर करता है। खून की जांच से इस रोग पता लगया जा सकता है। जेस्टेशनल डायबिटीज से मां और बच्चे, दोनो को गर्भ या प्रसव के दौरान खतरा हो सकता है। दरअसल खून में शुगर (बल्ड शुगर) का स्तर सामान्य होना या कहिए नियंत्रित होना आवश्यक होता है। और इसे नियंत्रित रखने के लिये शरीर में अनेक अंग और होर्मोंस मिलकर काम करते हैं। जब शरीर ब्लड शुगर को नियंत्रित नहीं कर पाता है तो आपको डायबिटीज हो जाती है।

प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज

अधिकतर मामलों में जेस्टेशनल डायबिटीज गर्भधारण के शुरुआत में ही हो जाती है। लेकिन ऐसा भी जरूरी नहीं है कि आपको गर्भावस्था के अंतिम चरण में डायबिटीज नहीं हो सकती है। कुछ महिलाओं को पहले से ही डायबिटीज होती है, लेकिन वे इसे पहचान नहीं पाती हैं। जब यह गर्भावस्था के दौरान बढ़ जाता है, तो जांच के बाद पहचाना जाता है। गर्भधारण के दौरान होर्मोंस जैसे कि प्रोजेस्टेरोन और प्लासेंटल लेक्टोजन, शरीर में उत्तपन इंसुलिन के विपरीत काम करने लगते हैं। जिस कारण आपको डायबिटीज हो सकती है।

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जेस्टेशनल डायबिटीज के मां और शिशु को जोखिम

25 साल से अधिक उम्र में जेस्टेशनल डायबिटीज होने का खतरा अधिक होता है। साथ ही यदि बी एम आई (BMI in kg/m 2 ) 25 से अधिक हो तो इसके होने की संभावना अधिक रहती है। इसके अलावा गर्भ में अत्यधिक वजन बढ़ना, पिछले गर्भ में बड़ा बच्चा होना, बल्ड शुगर अनियंत्रित होना या “डायबिटीज़” होना या आपके माता, पिता या सगे भाई या बहन में डायबिटीज होने पर भी इसका खतरा बढ़ जाता है।

आपका आहार और शिशु का स्वास्थ्य

गर्भावस्था के दौरान आपका आहार ही होने वाले शिशु का स्वास्थ्य निर्धारित करता है। ऐसे में आहार योजना के लिए अपने आहार विशेषज्ञ से सम्पर्क करें। हो सके तो अपने आहार की सूचि बना लें और वज़न को नियंत्रित करने का हर सम्भव प्रयास करें।

शारीरिक श्रम (Physical Exercise) के फायदे

प्रतिदिन कम से कम 2 घण्टे तक सामान्य व्या‍याम करें। थोड़ा-थोड़ा व्यायाम करने पर भी आपका शरीर इन्सुलिन का सही प्रयोग कर रक्त में शुगर के स्तर को नियंत्रित करता है। गर्भवती महिलाओं के लिए टहलना भी एक अच्छा व्यायाम है इसलिए टहलने का समय ज़रूर निकालें।

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स्वास्‍थ्‍य जांच

समय–समय पर चिकित्सक से सम्पर्क करना, आपके और होने वाले शिशु के लिए बहुत आवश्यक है। रक्त में शुगर की मात्रा को देखते हुए आप अपने आहार और वज़न नियंत्रण के विषय में भी चिकित्सक से परामर्श ले सकते हैं। शिशु के विकास के परीक्षण के लिए अल्ट्रासाउण्ड कराना भी एक अच्छा विकल्प है। अगर आपका बच्चा सामान्य से बड़ा है तो आपको इन्सुलिन शाट्स लेने की आवश्यकता है।

जेस्टेशनल डायबिटीज की चिकित्सा का महत्वपूर्ण भाग है रक्त में शुगर की जांच। इसके लिए ग्लूकोज़मीटर का प्रयोग एक आसान और सुरक्षित विकल्प है। दिन में एक से दो बार घर पर ही शुगर की जांच करें और इस विषय में चिकित्सक से परामर्श लें। थोड़ी सी सावधानी बरतकर आप अपनी स्वास्‍थ्‍य स्थितियों पर नियंत्रण तो पा ही सकती हैं, साथ ही स्वस्थ शिशु को जन्म दे सकती हैं।

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