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शिशु को अनुवांशिक बीमारियों से बचाना है, तो प्रेग्नेंसी के दौरान करवाएं जेनेटिक टेस्ट

नवजात की देखभाल
By Anurag Gupta , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Oct 04, 2018
शिशु को अनुवांशिक बीमारियों से बचाना है, तो प्रेग्नेंसी के दौरान करवाएं जेनेटिक टेस्ट

कई बीमारियां ऐसी होती हैं, जो शिशु के पैदा होने से पहले ही मां-बाप द्वारा उसे मिल जाती हैं। इन्हीं बीमारियों को अनुवांशिक बीमारियां या जेनेटिक डिसआर्डर कहा जाता है।

Quick Bites
  • जेनेटिक बीमारियों के कारण हर 5 सेंकड में 15 साल से कम उम्र का एक बच्चा मर जाता है।
  • मां-बाप के जीन्स के द्वारा अनुवांशिक बीमारियां शिशु में पहुंच जाती हैं।
  • प्रेग्नेंसी के दौरान जेनेटिक टेस्ट से अनुवांशिक बीमारियों का लगाया जा सकता है पता।

कई बीमारियां ऐसी होती हैं, जो शिशु के पैदा होने से पहले ही मां-बाप द्वारा उसे मिल जाती हैं। इन्हीं बीमारियों को अनुवांशिक बीमारियां या जेनेटिक डिसआर्डर कहा जाता है। डायबिटीज, कैंसर, हार्ट अटैक जैसी सैकड़ों खतरनाक बीमारियां हैं, जो अगर किसी व्यक्ति को हों, तो अगली पीढ़ी में उसके होने की संभावना बढ़ जाती है। दरअसल मां के गर्भ में जब शिशु का विकास हो रहा होता है, तभी मां-बाप के जीन्स के द्वारा ये बीमारियां शिशु के जीन्स में पहुंच जाती हैं।
कई शिशुओं में अनुवांशिक बीमारियों के लक्षण वयस्क होने या अधेड़ होने के बाद दिखते हैं, जबकि कुछ बच्चों में ये जन्म के 1-2 साल बाद ही दिखना शुरू हो जाते हैं। इन बीमारियों से बचाव के लिए जरूरी है कि प्रेग्नेंसी के दौरान हर महिला जेनेटिक टेस्ट करवाए।

हर 5 सेकेंड में होती है एक बच्चे की मौत

युनाइटेड नेशन्स इंटर एजेंसी ग्रुप फॉर चाइल मॉर्टलिटी इस्टिमेशन (UNIGME) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक साल 2017 में भारत में 8 लाख से ज्यादा शिशुओं की मौत हो गई, जबकि 1,5200 ऐसे बच्चों की मौत हो गई, जिनकी उम्र 5-14 साल थी। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के अनुसार साल 2017 में विश्व में ऐसे कुल 60 लाख से ज्यादा बच्चों की मौत हो गई, जिनकी उम्र 15 साल से कम थी, जिनमें ले 50.4 लाख ऐसे बच्चे थे, जिनकी उम्र 5 साल से भी कम थी। इन आंकड़ों के अनुसार विश्व में हर 5 सेंकड में 15 साल से कम उम्र का एक बच्चा मर जाता है। इनमें से आधे से अधिक मौतों का कारण जेनेटिक बीमारियां होती हैं।

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क्यों होती हैं जेनेटिक बीमारियां

जब कोई बच्चा जन्म लेता है, तो उसमें दो तरह की जीन्स पाई जाती हैं, एक जीन मां से आता है और एक जीन पिता से। ये जीन्स ही बच्चे का रूप, रंग, व्यवहार और नैन-नक्श तय करते हैं। इन जीन्स के साथ कई बार मां-बाप के शरीर में मौजूद बीमारियां भी शिशु के शरीर में प्रवेश कर जाती हैं। इन्हें ही अनुवांशिक विकार या जेनेटिक डिसआर्डर कहते हैं। कई ऐसे जेनेटिक लक्षण और बीमारियां होती हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती हैं। शोधों के अनुसार पिता की बीमारियां या उसके परिवार में चली आ रही बीमारियों का होने वाले शिशु पर ज्यादा प्रभाव पड़ता है। इन बीमारियों के कारण पैदा होने से पहले ही शिशु को जिंदगी के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता है।

क्या होता है जेनेटिक टेस्ट

जेनेटिक टेस्ट गर्भवती महिलाओं का किया जाता है। ये एक ऐसा टेस्ट है, जिससे पता लगाया जा सकता है कि होने वाले बच्चे को मां या पिता से कोई जेनेटिक बीमारी तो नहीं मिल गई है। इस टेस्ट के लिए महिला का ब्लड सैंपल (रक्त का नमूना) लिया जाता है। प्रेग्नेंसी में ये टेस्ट हर महिला को जरूर करवाना चाहिए ताकि बच्चे के जन्म से पहले ही उसे पता चल सके कि उसके बच्चे को कौन सी अनुवांशिक बीमारियां हो सकती हैं।

कुछ अनुवांशिक बीमारियां होती हैं खतरनाक

कुछ ऐसी अनुवांशिक बीमारियां भी होती हैं, जो खतरनाक होती हैं, जैसे- थैलेसीमिया, सिकल सेल, हार्ट अटैक आदि। इसके अलावा डायबिटीज, मोटापा, खून की बीमारियां, दिल की बीमारियां, आंख की बीमारियां, मिर्गी, कैंसर आदि ऐसे विकार है, जो जन्म से पहले ही शिशु में मां-बाप के जीन्स द्वारा प्रवेश कर सकते हैं। इसलिए इन बीमारियों से बचाव के लिए जेनेटिक टेस्ट करना जरूरी है।

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कब जरूरी है जेनेटिक टेस्ट

उन मामलों में जेनेटिक टेस्ट जरूरी है, जहां किसी एक साथी में कोई जेनेटिकल (वंशानुगत) बीमारी है, परिवार में अनुवांशिक बीमारियों का इतिहास है, गर्भावस्था के समय मां के साथ कुछ बुरा घटा है या महिला के पहले के बच्चों में कुछ जन्मजात विसंगतियां पाई गई हैं। इसके अलावा जेनेटिक टेस्ट उन महिलाओं के लिए भी जरूरी है, जो देर से (आमतौर पर 30-35 साल के बाद) गर्भधारण करती हैं।

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Written by
Anurag Gupta
Source: ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभागOct 04, 2018

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