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    गर्भावस्‍था में स्‍वाइन फ्लू

    संक्रामक बीमारियां By अनुराधा गोयल , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Jun 14, 2010
    गर्भावस्‍था में स्‍वाइन फ्लू

    गर्भवती स्ञियों में स्वाइन फ्लू होने से जच्चा-बच्चा दोनों की जान को खतरा रहता है। इसीलिए समय रहते स्वाइन फ्लू का उपचार बहुत जरूरी है। आइए जानते हैं गर्भावस्था में स्वाइन फ्लू से क्या प्रभाव पड़ते है।

    pregnant Woman महिलाएं पूरे परिवार की रीढ़ होती है ऐसे में महिलाओं का स्वस्थ रहना बेहद जरूरी है। महिला गर्भवती हो तो उन्हें अधिक देखभाल के साथ ही स्वस्थ‍ माहौल देना भी जरूरी है। बदलते मौसम में गर्भवती स्ञियों की अतिरिक्त देखभाल करना और जरूरी हो जाता है क्योंकि इसी मौसम में स्वाइन फ्लू, डेंगू, मलेरिया जैसी बीमारियां पनपती है। गर्भवती स्ञियों में स्वाइन फ्लू होने से जच्चा-बच्चा दोनों की जान को खतरा रहता है। इसीलिए समय रहते स्वाइन फ्लू का उपचार बहुत जरूरी है। आइए जानते हैं गर्भावस्था में स्वाइन फ्लू से क्या प्रभाव पड़ते है।


    -    स्वाइन फ्लू एक संक्रमित बीमारी है जो एच-1 एन-1 ए टाइप इनफ्लुएंजा वायरस की वजह से होता है। आमतौर पर हवा में सांस के जरिए स्वाइन फ्लू इन्फेक्शन फैलता है।
    -    स्वाइन फ्लू के दौरान बुखार, जुकाम, आंखे कमजोर होना और उनसे लगातार पानी बहना साथ ही हर समय सुस्ती महसूस होती है।
    -    स्वाइन फ्लू के वायरस एच-1,एन-1 है। हालांकि ये वायरस जानलेवा नहीं होते लेकिन गर्भवती स्ञियों में ये इम्यून सिस्टम कमजोर कर उनके पूरे श्वसन तंत्र को बहुत प्रभावित करते हैं।
    -    विशेषज्ञों की माने तो गर्भवती स्ञियों में स्वाइन फ्लू वायरस फैलने का ज्यादा खतरा बना रहता है। इतना ही नहीं आम स्वाइन फ्लू ग्रसित रोगी के मुकाबले गर्भवती स्ञियों में स्वाइन फ्लू होने से उन्हें ज्यादा कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। साथ ही गर्भावस्था के दौरान स्वाइन फ्लू होने पर जच्चा-बच्चा दोनों की जान को खतरा होता है।
    -    दरअसल, गर्भावस्था के कारण इम्यून सिस्टम पहले ही कमजोर हो जाता है। इसलिए गर्भवती महिलाओं को स्वाइन फ्लू के दौरान अधिक परेशानियां होती है।
    -    गर्भवती महिलाएं ज्यादातर गर्भ के दूसरी व तीसरी तिमाही पर ही स्वाइन फ्लू से ग्रसित दिखाई पड़ती है। जो कि गर्भावस्था में और मुश्किलें बढ़ा देता है। दूसरी व तीसरी तिमाही में गर्भ काफी बढ़ जाता है तो फेफड़ों को फैलने के लिए कम जगह मिलती है। जिससे फेफड़ों धीमी गति से काम करते है। ऐसे में फेफड़ों का धीमी पड़ने की वजह से हवा में मौजूद रोगाणुओं से लड़ने की उनकी क्षमता कम हो जाती है। जिसकी वजह से कई गर्भवती महिलाओं को सांस लेने में तकलीफ होती है जिससे गर्भावस्था की स्थिति गंभीर हो जाती है।
    -    डब्ल्यूएचओ, सीडीसी और यूरोपीय विशेषज्ञों के अनुसार, गर्भवती महिला को स्वाइन फ्लू से संक्रमण को हाई रिस्क यानी जोखिम की श्रेणी में रखा गया है|
    -    विशेषज्ञों की मानें तो गर्भवती महिलाओं में स्वाइन फ्लू द्वारा मां की मृत्यु दर अधिक बताई गयी है। इसलिए जांच की रिपोर्ट आने तक इंतज़ार नहीं किया जाना चाहिए, बीमारी के लक्षण दिखते ही तुंरत उपचार शुरू कर देना चाहिए|
    -    नवजात शिशु का स्तनपान भी स्वाइन फ्लू के उपचार के दौरान चालू रखा जाना चाहिए , इससे कोई नुकसान नहीं होता|
    यदि गर्भवती स्त्री में स्वाइन फ्लू जैसे लक्षण उभरे तो गर्भावस्था में देखभाल डॉक्टर्स की सलाह पर करें साथ ही डॉक्टर्स से ही गर्भावस्था के लिए सुझाव लें|

    Disclaimer

    इस जानकारी की सटीकता, समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर सम्भव प्रयास किया गया है हालांकि इसकी नैतिक जि़म्मेदारी ओन्लीमायहेल्थ डॉट कॉम की नहीं है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्देश्य आपको जानकारी मुहैया कराना मात्र है।

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