किन बीमारियों में और कैसे की जाती है लैप्रोस्कोपिक सर्जरी (दूरबीन विधि)? जानें इस सर्जरी से जुड़ी जरूरी बातें

ओपन सर्जरी से आधुनिक है लैप्रोस्कोपिक सर्जरी। इसे कराने से कम दर्द, चीरा कम लगता है, खून कम निकलता है। एक्सपर्ट से जानें फायदे।

Satish Singh
विविधWritten by: Satish SinghPublished at: Jul 30, 2021
Updated at: Jul 30, 2021
किन बीमारियों में और कैसे की जाती है लैप्रोस्कोपिक सर्जरी (दूरबीन विधि)? जानें इस सर्जरी से जुड़ी जरूरी बातें

शिशु के जन्म से लेकर मृत्यु तक इस जीवनकाल में हर किसी को बीमारियों का सामना करना पड़ता है। वहीं दिन पर दिन इलाज के तरीकों में काफी बदलाव आया है। सर्जरी के क्षेत्र में भी कई नई तकनीक विकसित हुई हैं। पहले डॉक्टर मरीज के पेट से जुड़ी बीमारियों का उपचार करने के लिए ओपन सर्जरी करते थे। इसमें मरीज को ज्यादा तकलीफ के साथ अधिक समय तक अस्पताल में रहना पड़ता था। इसके बाद मेडिकल साइंस ने लैप्रोस्कोपिक सर्जरी का इजात किया। लैप्रोस्कोपिक सर्जन बताते हैं कि आंखों और हाथों के तालमेल से लैप्रोस्कोपिक सर्जरी की जाती है, स्क्रीन में देखते हुए मरीज का ऑपरेशन किया जाता है। वहीं इस तकनीक से सर्जरी के बाद मरीज को अस्पताल से छुट्टी दी जाती है। तो आइए इस आर्टिकल में हम लैप्रोस्कोपिक सर्जरी के बारे में और किन-किन बीमारियों में इस पद्दिती से इलाज किया जाता है उसके बारे में जमशेदपुर के महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल जमशेदपुर के सर्जन डॉक्टर सरवार आलम जानते हैं। 

क्या है लैप्रोस्कोपिक सर्जरी

आज से कुछ साल पहले तक ओपन सर्जरी लिए शरीर के बाहरी भाग में चीरा लगा कर इलाज किया जाता था। जमशेदपुर के महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल जमशेदपुर के सर्जन डॉक्टर सरवार आलम ने बताया कि ओपन सर्जरी में बड़ा चीरा लगाकर गॉल ब्लैडर (पित्ताशय की पथरी), अपेंडिक्स या हर्निया को निकालना पड़ता था। उसके बाद हम उसका इलाज करते थे। इसमें ज्यादा पेट का चीरना पड़ता था। लैप्रोस्कोपिक सर्जरी के जरिए गॉल ब्लैडर का उपचार करने के लिए सर्जन नाभी के पास एक सेंटीमीटर का छोटा सा छेद कर उसमें छोटा छोटा चीरा लगाते हैं। इसके बाद एक उसी चीरे में छोटा सा कैमरा पेट के अंदर डाला जाता है, जिसे लेप्रोस्कोप कहा जाता है। छेद के माध्यम से ही दो अन्य उपकरण डाले जाते हैं। कैमरे की मदद से पेट के अंदर की मूवमेंट पर सर्जन नजर रखते हैं। मशीन के पास में स्क्रीन लगा होता है, उसमें देखकर सर्जन सर्जरी को अंजाम देते हैं। ऑपरेशन करने के लिए तीन चीरा लगाया जाता जो एक सेंटीमीटर और दो आधा-आधा सेंटीमीटर का होता है। इसके बाद खराब टिशू को काटकर निकालते हैं। कैमरा टीवी स्क्रीन से जुड़ी होता है। स्क्रीन पर देखकर सर्जरी की जाती है। ऑपरेशन पूरी तरह से हाथों और आंखों के तालमेल पर निर्भर होता है।

Laprodcopic Surgery

लैप्रोस्कोपिक सर्जरी से इन बीमारियों का होता है इलाज

  • अपेंडिस
  • गॉल ब्लैडर
  • पेल्विस
  • अपर और लोवर जीआई ट्रैक्ट की सर्जरी
  • थोरेक्स सर्जरी
  • हर्निया
  • बड़ी और छोटी आंत का ऑपरेशन
  • बांझपन के मरीजों के लिए

ऐसे की जाती है सर्जरी

सर्जन डॉक्टर सरवार बताते हैं कि सर्जरी के पहले पेट में कार्बनडाईऑक्साइड डालकर पेट को फुलाया जाता है, जिसके बाद सर्जरी की जाती है। कैमरा एक चीरे के जरिये अंदर डाला जाता है। ऑपरेशन की प्रक्रिया में अन्य चीरे के जरिए सर्जिकल इंस्ट्रुमेंट मरीज की बॉडी में डाला जाता है। इस प्रक्रिया को लैप्रोस्कोपी मिनिमल इन्वेसिव सर्जरी (एमआईएस- Minimally invasive (laparoscopic) surgery) के नाम से भी जाना जाता है। कम से कम चीरे के साथ यह सर्जरी की जाती है। इससे बाकी के अंगों को बिना छेड़खाड़ किए डॉक्टर ऑपरेशन करते हैं। पुरुषों के साथ महिलाओं की कई बीमारी का इलाज इस प्रक्रिया से आसानी से हो पाता है।

लैप्रोस्कोपिक सर्जरी में एक सेंटीमीटर तक किया जाता कट

एक्सपर्ट बताते हैं कि लैप्रोस्कोपिक सर्जरी में एक सेंटीमीटर या उससे छोटा भी चीरा पेट में लगाते हैं। इसे मेडिकल टर्म में कट कहते हैं। इससे मरीज को दर्द कम होता है और मरीज काफी जल्दी रिकवर कर पाता है। दूसरी ओर ओपन सर्जरी में 12 से 13 सेंटीमीटर का चीरा लगाया जाता है। अपेंडिक्स के ऑपरेशन में छह से सात सेंटीमीटर का चीरा लगाया जाता था। ज्यादा कट लगाने से मरीज को ज्यादा दिक्क्त होती है। ओपेन सर्जरी के बाद एक माह तक मरीज को बेड रेस्ट करना पड़ता है। अस्पताल में सात दिनों तक रहना पड़ता था। सर्जन डॉ. सरवार ने कहा यदि कोई एक्सपर्ट सर्जन लैप्रोस्कोपिक सर्जरी करे तो वो जटिल से जटिल बीमारियों की सर्जरी 15 मिनट में कर देता है। यह ओपन सर्जरी की तुलना में काफी आसान होता है। इसमें टेक्नोलॉजी का उपयोग किया जाता है। वहीं ओपन सर्जरी में काफी समय लगता है, कई बार एक घंटे से अधिक समय लग जाता है। लैप्रोस्कोपिक सर्जरी करवाने के बाद दो दिन में ही मरीज अपने कामकाज पर लौट सकता है। लेप्रोस्कोपी सर्जरी का एक बेहद महत्वपूर्ण लाभ चीरे का छोटा आकार है। यदि हम किसी ओपन सर्जरी (जिसमें ऑपरेशन करने के लिए लंबा चीरा लगाया जाता है) से इसकी तुलना करें, लैप्रोस्कोपिक सर्जरी में ऑपरेशन के लिए बेहद छोटे चीरे की जरूरत होती है। इस प्रक्रिया में ट्यूब, कैमरा, फाइबर-ऑप्टिक लाइट आदि जैसे मेडिकल उपकरण का इस्तेमाल किया जाता है।

ओपन सर्जरी से महंगा है लैप्रोस्कोपिक सर्जरी

एक्सपर्ट बताते हैं कि लैप्रोस्कोपिक सर्जरी ओपेन सर्जरी से महंगा है। लेकिन ओपन सर्जरी में मरीज को काफी दिनों तक अस्पताल में रहना पड़ता है। इस वजह से अस्पताल का बिल काफी बढ़ जाता है। ओपेन सर्जरी वैसे तो लैप्रोस्कोपिक सर्जरी की तुलना में सस्ती होती है। ओपन सर्जरी में 20-25 हजार लगते हैं। वहीं लैप्रोस्कोपिक सर्जरी में 30-50 हजार रुपए खर्च आता है। लेकिन लैप्रोस्कोपिक सर्जरी में अस्पताल से तुरंत छुट्टी मिल जाती है, वहीं ओपन सर्जरी में छह से सात दिन ज्यादा अस्पताल में रहना पड़ता है। इसका चार्ज मिला दें तो ओपन सर्जरी लैप्रोस्कोपिक सर्जरी की तुलना में सस्ता होता है।

बेहद ही गंभीर होती है लैप्रोस्कोपिक सर्जरी, एक्सपर्ट से ही कराएं

लैप्रोस्कोपिक सर्जरी काफी गंभीर ट्रीटमेंट होता है। एक्सपर्ट बताते हैं कि सिर्फ एक्सपर्ट सर्जन से ही ऑपरेशन कराना चाहिए। लैप्रोस्कोपिक सर्जरी प्रशिक्षण प्राप्त डॉक्टर ही करते हैं। इस चिकित्सा प्रणाली की कुछ सीमाएं है। इसमें डॉक्टरों की टीम की जरूरत होती है। आधुनिक ऑपरेशन थिएटर की आवश्यकता होती है। सर्जरी इमरजेंसी के लिए काफी उपयोगी है। इसके जरिए मरीजों को बड़े ऑपरेशन से बचाया जा सकता है। इसमें पेट में टांके के निशान भी ज्यादा नहीं आते हैं। सर्जरी के सभी प्रकार जैसे कि यूरोलॉजी, गायनेकालॉजी, थोरोक्स सर्जरी, वासक्यूल सर्जरी में यह प्रणाली कारगर है। बांझपन के मरीजों के लिए भी यह काफी उपयोगी है।

 ऑपरेशन के बाद कम निशान पड़ते हैं

एक्सपर्ट बताते हैं कि ऑपेन सर्जरी बड़े बड़े चीरे लगते है। जिससे पेट पर उसके निशान रह जाते हैं। वही लैप्रोस्कोपिक सर्जरी में कम टांके लगते हैं। यह सर्जरी पुराने सर्जरी से ज्यादा कारगर होता है। कम चीरे लगने के कारण मांसपेशियों और अंगों को नुकसान नहीं होता। इसके कारण मरीज तुरंत ठीक हो जाते हैं। वहीं ओपन सर्जरी में ज्यादा टांके लगते हैं। इससे मांसपेशियों को ज्यादा नुकसान होता है। मरीज को रिकवर होने में ज्यादा समय लगता है।

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लैप्रोस्कोपिक सर्जरी के फायदे

इंफेक्शन की संभावना कम

एक्सपर्ट बताते हैं कि लैप्रोस्कोपिक सर्जरी में भीतरी अंग को बाहर निकालने की जरूरत नहीं पड़ती, उन्हें ज्यादा छेड़ने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती है। इससे संक्रमण का खतरा कम रहता है।

दवा का कम सेवल

एक्सपर्ट बताते हैं कि मरीज को ओपन सर्जरी की तुलना में इस सर्जरी से ऑपरेशन करने पर उसे कम दवा की आवश्यकता पड़ती है। इसके कारण साइड इफेक्ट्स कम होने का खतरा रहता है।

जल्द होती है रिकवरी

लैप्रोस्कोपिक सर्जरी से मरीज का ऑपरेशन करने पर वो जल्द ठीक हो जाता है व रोजमर्रा के काम को कर सकता है। छोटे चीरे लगाने के कारण त्वचा जल्द ठीक हो जाती है।

नहीं होता ज्यादा दर्द

एक्सपर्ट बताते हैं कि सर्जरी के दौरान या बाद में मरीज को बहुत ज्यादा दर्द नहीं होता है। हल्का दर्द पेनकिलर खाने से दूर हो जाता है।

कम होती है ब्लीडिंग

लैप्रोस्कोपिक सर्जरी करने के समय छोटा कट लगाया जाता है, इससे मरीज के शरीर से खून कम निकलता है।

सर्जरी के बाद क्या खाएं

एक्सपर्ट बताते हैं कि लैप्रोस्कोपिक सर्जरी के बाद हल्का और जल्दी पचने वाला भोजन करना चाहिए। क्योंकि लैप्रोस्कोपिक सर्जरी पेट से जुड़ी बीमारियों से ज्यादातर संबंधित होती है। कम तेल में बनाकर या उबालकर तरोई, लौकी, परवल खा सकते हैं।

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हमेशा एक्सपर्ट से कराएं ऑपरेशन

इस सर्जरी को एक्सपर्ट से कराना सही रहता है। वैसे विशेषज्ञ जिन्हें लैप्रोस्कोपिक सर्जरी करने का काफी अनुभव हो वैसे सर्जन से इसका उपचार कराएं तो मरीज के स्वास्थ्य के लिए बेहतर होता है।

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