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ठंड में बढ़ जाता है अस्थमा अटैक का खतरा, सांस और फेफड़े के मरीज ध्यान रखें ये जरूरी टिप्स

अन्य़ बीमारियां By अनुराग अनुभव , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Nov 14, 2019
ठंड में बढ़ जाता है अस्थमा अटैक का खतरा, सांस और फेफड़े के मरीज ध्यान रखें ये जरूरी टिप्स

सर्दियों के मौसम में अस्थमा और फेफड़े के रोगियों के लिए मुश्किलें बढ़ जाती हैं। इस दौरान सांस की नली में सूजन आने से उन्हें अस्थमा अटैक होने का खतरा रहता है। डॉक्टरों से जानें अस्थमा रोगियों के लिए सर्दी के मौसम में जरूरी सावधानियां और टिप्स।

सर्दियों का मौसम आ गया है और इस मौसम में अस्थमा रोगियों की समस्याएं भी बढ़ जाएंगी। अस्थमा रोगी घर के अंदर रहें या बाहर, सर्दियों में अस्थमा के अटैक का खतरा बना रहता है। फेफड़ों के रोग से पीड़ित मरीजों को सर्दियों का मौसम परेशानियों से भरा महसूस हो सकता है। अमेरिकन लंग एसोसिएशन की फैक्टशीट में कहा गया है कि अस्थमा सबसे पुरानी बीमारियों में से एक है और फिलहाल इससे 18 वर्ष से कम आयुवर्ग के 7.1 मिलियन बच्चे प्रभावित हैं। वर्ल्ड हेल्‍थ ऑर्गनाइजेशन ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्‍टडी के अनुसार 13.8 मिलियन डिसैबिलिटी एडजस्‍टेड लाइफ ईयर (DALYs) अस्थमा के कारण हर साल दम तोड़ देते हैं, यह रोग वैश्विक स्तर पर बीमारी के बोझ के 1.7 फीसदी का प्रतिनिधित्व करता है। दुनिया भर में 30 करोड़ लोग अस्थमा से पीड़ित हैं, और सर्दियों के मौसम में इन मरीजों में अस्थमा के लक्षण और बदतर तरीके से उभरते हैं।

ठंड में अस्थमा रोगी की बढ़ जाती हैं परेशानियां

विशेषज्ञों के अनुसार, अस्‍थमा के मरीजों की सांस की नली में सूजन आ जाती है, जिसके कारण मरीजों के सांस लेने में दिक्कत होती है। इससे मरीजों के अन्य अंगों का प्रतिक्रिया भी बढ़-चढ़कर होती है। अस्थमा के मरीजों के लिए ठंडा माहौल उपयुक्त नहीं है। इससे उनके हानिकारक वायरस की चपेट में आने का खतरा रहता है। अस्थमा के मरीजों के फेफड़े और सांस की नली काफी संवेदनशील होते हैं।

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इनहेलेशन थेरेपी और उससे जुड़ी गलत धारणाएं

कई मरीजों और उनकी देखरेख करने वाले परिजनों को अस्थमा के कारणों और इलाज के मौजूदा विकल्पों की जानकारी नहीं होती। अस्थमा एक आनुवांशिक और एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य में फैलने वाला रोग है। मरीजों को अस्‍थमा के अटैक से बचाने के लिए कई इलाज उपलब्ध हैं, जिसमें फिश थेरेपी, वैकल्पिक दवाएं और योग शामिल हैं। अस्थमा के रोग को उभरने का मौका न देकर इससे बचाव किया जा सकता है। अस्थमा से पीड़ित मरीजों को एक सामान्य सा भ्रम रहता है कि इनहेलर्स उनके पास अस्थमा के अटैक से बचने का आखिरी उपाय है। अस्थमा रोग के बारे में मरीजों और उनके परिजनों को डॉक्टरों की ओर से शिक्षित किए जाने की जरूरत है। इनहेल्ड कार्टिकोस्टेरॉइड्स या इनहेलेशन थेरेपी के कम से कम साइड इफेक्ट्स के साथ अस्थमा का इलाज किया जा सकता है।

इन बातों का रखें ध्यान

डॉ हरीश भाटिया, पल्मोनरी रोग विशेषज्ञ कहते हैं, “ठंड में अस्थमा के मरीजों के सांस लेते समय खरखराहट और घरघराहट की आवाज आने, सांस से संबंधित रोगों और ब्रॉन्काइल अस्थमा के मामलों में 30 से 40 फीसदी की बढ़ोतरी होती है। इसलिए फेस्टिव सीजन के बाद सभी आयुवर्ग के अस्थमा मरीजों के अस्पताल में इलाज कराने आने का संभावना होती थी। उन मरीजों को अस्थमा को काबू में करने में परेशानी आती है, जिन मरीजों में दवाइयां लेने पर रोग के लक्षण और तेजी से उभरते है। इससे उनकी रोजमर्रा की शारीरिक गतिविधियों पर असर पड़ता है। इस समस्या से निजात पाने के लिए इनहेलेशन थेरेपी सबसे प्रभावी थेरेपी है। इसके साइड इफेक्ट बहुत कम है और यह तेजी से अपना असर दिखाती है।”

रेस्पिरेटरी मेडिसिन में प्रकाशित एक शोध लेख के अनुसार, अस्थमा के लिए इनहेलेशन थेरेपी और क्लिनिकल प्रभावशीलता का संबंध काफी सकारात्‍मक है। वयस्कों, नवजात शिशुओं और बच्चों पर किए गए बहुत से अध्ययन के अनुसार इनहेलेशन थेरपी से रोग के लक्षणों पर जल्द नियंत्रण पाया जा सकता है और फेफड़े सामान्य तरीके से काम करने लगते हैं।

5 से 11 साल के बच्चों में बढ़ी अस्थमा की बीमारी

डॉ गौरव सेठी, सलाहकार बाल रोग विशेषज्ञ (InGoodhands Clinic) बताते हैं, "कुछ घंटों के लिए प्रदूषक तत्वों के संपर्क में आने से भी फेफड़ों का रोग बिगड़ सकता है। इससे मरीज पर अस्थमा अटैक हो सकते हैं। इसलिए किसी भी आपात स्थिति के लिए तैयार रहना बहुत जरूरी है। एक मोटे अनुमान के अनुसार भारत में 5 से 11 वर्ष के आयुवर्ग में अस्थमा से पीड़ित बच्चों की संख्या 10 से 15 फीसदी के बीच है। हालांकि, अभी भी हजारों पेरेंट्स ऐसे हैं, जिन्हें इलाज के सही तरीकों की जानकारी नहीं है।

इनहेलेशन थेरेपी में सांस की नली में सूजन आने पर बहुत थोड़ी मात्रा में, करीब 25 से 100 माइक्रोग्राम कार्टिकोस्टेरॉइड्स की जरूरत होती है, लेकिन जब यह दवाई के माध्यम से मौखिक रूप से आंतों के रास्ते मरीजों में पहुंचती है तो दवाई की बहुत ज्यादा मात्रा, करीब 10 हजार माइक्रोग्राम मरीज के शरीर में पहुंचती है, पर इस दवाई का केवल थोड़ा सा हिस्सा ही फेफड़ों तक पहुंचता है। इसका मतलब यह है कि जब अस्थमा की मरीज कोई गोली या टैबलेट खाता है तो अपनी जरूरत से 200 गुना अधिक दवाई लेता है। इससे मरीजों की सेहत पर खराब असर पड़ता है।"

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टैबलेट और सिरप से ज्यादा कारगर है इन्हेलेशन थेरेपी

बाल और नवजात शिशु रोग विशेषज्ञ सीतांशु श्रीवास्तव ने कहा, “अस्थमा के इलाज में टैबलेट और सिरप काफी कम प्रभावी होते हैं।  इससे शरीर के बाकी हिस्सों पर भी गैरजरूरी रूप से साइड इफेक्‍ट पड़ता है। जब अस्थमा की दवाई और सिरप लिया जाता है तो मरीज की शरीर की जरूरत से ज्यादा 40 गुना दवाई उसके शरीर में पहुंचती है। यह दवा उन दूसरे अंगों में भी प्रवेश कर जाती है, जहां इसकी जरूरत नहीं है। 

इनहेलेशन थेरेपी में कार्टिकोस्टेरॉइडड्स सीधे शरीर में पहुंचते हैं। अस्थमा के लक्षणों को काबू में करने के लिए सही मात्रा में कार्टिकोस्टेरॉइड्स देने की जरूरत होती है। अस्थमा के इलाज के लिए ली जाने वाली दवाएं पहले खून में घुल-मिलकर शरीर के विभिन्न अंगों या फेफड़े तक पहुंचती है। इसलिए, अस्थमा के मरीजों के लिए इनहेलेशन थेरेपी सर्दियों के मौसम को बिना किसी परेशानी के बेहतर तरीके से बिताने के लिए एक साधारण और आसान सोल्यूशन है। 

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