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भारत में बढ़ रहा है स्तन कैंसर का खतरा, म​हिलाएं शुरुआत से ही अपनाएं ये टिप्स

लेटेस्ट By Rashmi Upadhyay , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Feb 25, 2019
भारत में बढ़ रहा है स्तन कैंसर का खतरा, म​हिलाएं शुरुआत से ही अपनाएं ये टिप्स

स्तर कैंसर वर्तमान समय में ऐसी बड़ी बीमारी बनकर उभर रहा है जिसकी चपेट में हर 8 में से 1 महिला आ रही है। वैसे तो यह रोग दुनिया में तेजी से फैल रहा है लेकिन अगर इसका औसत निकाला जाए तो भारत में स्तन कैंसर के मरीजों की संख्या में भारी इजाफा हो रहा है।

स्तर कैंसर वर्तमान समय में ऐसी बड़ी बीमारी बनकर उभर रहा है जिसकी चपेट में हर 8 में से 1 महिला आ रही है। वैसे तो यह रोग दुनिया में तेजी से फैल रहा है लेकिन अगर इसका औसत निकाला जाए तो भारत में स्तन कैंसर के मरीजों की संख्या में भारी इजाफा हो रहा है। इसका कारण कहीं न कहीं महिलाओं में जागरुकता की कमी और बीमारी के शुरुआती लक्षणों की अनदेखी भी है। हमारे पास कई ऐसे टेस्ट और जांचें उपलब्ध हैं जिनके माध्यम से हम इस बीमारी का शुरुआत में ही पता लगा सकते हैं। नीति बाग स्थित राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर के मेडिकल ओंकोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. सज्जन राजपुरोहित का कहना है कि शरीर के किसी हिस्से में कोशिकाओं की असामान्य और अनियंत्रित वृद्धि को कैंसर कहा जाता है। लगातार बढ़ते रहने से इस टिश्यू के टुकड़े खून के रास्ते शरीर के अन्य हिस्सों में पहुंचते हैं और नई जगह पर विस्तार करने लगते हैं। इसे मेटास्टेसिस कहा जाता है। 

डॉ. राजपुरोहित के मुताबिक स्तन कैंसर के बारे में जानने के लिए शरीर रचना के बारे में जानना बहुत जरूरी है। स्तन शरीक का एक अहम अंग है। स्तन का मुख्य कार्य अपने दुग्ध उत्पादक ऊतकों (टिश्यू) के माध्यम से दूध बनाना है। ये टिश्यू सूक्ष्म वाहिनियों (डक्ट) के जरिये निप्पल से जुड़े होते हैं। इसके अलावा इनके चारों ओर कुछ अन्य टिश्यू, फाइब्रस मैटेरियल, फैट, नाड़ियां, रक्त वाहिकाएं और कुछ लिंफेटिक चैनल होते हैं, जो स्तन की संरचना को पूरा करते हैं। यहां यह जानना महत्वपूर्ण है कि ज्यादातर स्तन कैंसर डक्ट में छोटे कैल्शिफिकेशन (सख्त कण) के जमने से या स्तन के टिश्यू में छोटी गांठ के रूप में बनते हैं और फिर बढ़कर कैंसर में ढलने लगते हैं। इसका प्रसार लिंफोटिक चैनल या रक्त प्रवाह के जरिये अन्य अंगों की ओर हो सकता है।

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स्तन कैंसर के लक्षण

  • किसी स्तन में या बाहों के नीचे गांठ
  • किसी स्तन के आकार, आकृति या ऊंचाई में अचानक कोई बदलाव दिखना
  • स्तन या निप्पल का लाल हो जाना
  • स्तन से साफ या खून जैसे द्रव का बहना
  • स्तन के टिश्यू या त्वचा का ज्यादा समय तक सख्त बने रहना
  • स्तन या निप्पल की त्वचा पर कुछ अलग दिखना या अनुभव होना (डिंपल दिखना, जलन होना, लकीरें दिखना या सिकुड़न अनुभव होना)
  • स्तन का कोई हिस्सा बाकी हिस्सों से अलग दिखाई देना
  • स्तन की त्वचा के नीचे कहीं सख्त अनुभव होना

कितनी और कैसी हैं इसकी स्टेज

स्टेज 0 से शुरू होकर अलग-अलग स्टेज बीमारी की गंभीरता को दशार्ते हैं।

  • स्टेज 0 : दूध बनाने वाले टिश्यू या डक्ट में बना कैंसर वहीं तक सीमित हो और शरीर के किसी अन्य हिस्से, यहां तक कि स्तन के बाकी हिस्सों तक भी नहीं पहुंचा हो।
  • स्टेज 1 : टिश्यू का धीरे-धीरे विस्तार होने लगता है और यह आसपास के स्वस्थ टिश्यू को प्रभावित करने लगता है। यह स्तन के फैटी टिश्यू तक फैला हो सकता है और स्तन के कुछ टिश्यू नजदीकी लिंफ नोड में भी पहुंच सकते हैं।
  • स्टेज 2 : इस स्टेज का कैंसर उल्लेखनीय रूप से बढ़ता है या अन्य हिस्सों तक फैलता है। हो सकता है यह बढ़कर अन्य हिस्सों तक फैल चुका हो।
  • स्टेज 3 : कैंसर हड्डियों या अन्य अंगों तक फैल चुका हो सकता है, साथ ही बाहों के नीचे 9 से 10 लिंफ नोड में और कॉलर बोन में इसका छोटा हिस्सा फैल चुका होता है, जो इसके इलाज को मुश्किल बनाता है।
  • स्टेज 4 : कैंसर लिवर, फेफड़ा, हड्डी और यहां तक कि दिमाग में भी फैल चुका होता है।

खुद कैसे करें परीक्षण

  1. सभी महिलाओं को स्तन की आकृति, आकार, रंग, ऊंचाई और सख्ती में होने वाले बदलाव को सही तरह से समझने की जानकारी होनी चाहिए। किसी भी तरह का स्राव होने, स्तन, आसपास की त्वचा और निप्पल पर धारियां, निशान पड़ने या सूजन जैसी हर स्थिति पर ध्यान दें। खड़े होकर और लेटकर स्तनों का सही से परीक्षण करना चाहिए।
  2. 40 की उम्र के बाद ज्यादातर महिलाओं को वार्षिक स्क्रीनिंग मैमोग्राम कराना चाहिए। जिन महिलाओं में कैंसर का कोई पारिवारिक इतिहास हो उन्हें 20 साल की उम्र से ही हर 3 साल में जांच करानी चाहिए और 40 की उम्र के बाद हर साल जांच करानी चाहिए।
  3. हाई रिस्क वाली श्रेणी में आने वाली महिलाओं को थोड़ा कम उम्र से ही हर साल स्क्रीनिंग मैमोग्राम करवाना शुरू कर देना चाहिए।
  4. मैमोग्राम के अलावा अल्ट्रासाउंड भी कराई जा सकती है।
  5. अगर रिस्क ज्यादा हो तो स्तन कैंसर की जांच के लिए स्तन की एमआरआई भी कराई जा सकती है।

स्तन कैंसर से बचाव

  • स्तन कैंसर के कारण और रिस्क फैक्टर के बारे में इतनी जानकारी और जागरूकता के बाद निश्चित तौर पर बहुत से ऐसे रास्ते भी हैं जिनकी मदद से इससे बचना या इस बीमारी को टालना संभव हो सकता है।
  • शराब के कम सेवन के साथ व्यायाम और स्वस्थ आहार से निश्चित रूप से कैंसर फैलने की आशंका को कम किया जा सकता है।
  • स्तन कैंसर के हाई रिस्क फैक्टर वाली महिलाओं टेमोक्सिफिन का इस्तेमाल किया जाता है।
  • मीनोपॉज के बाद ऑस्टियोपोरोसिस के इलाज में प्रयोग होने वाली दवा एविस्टा (रेलोक्सिफिन) का इस्तेमाल भी स्तन कैंसर से बचाव के लिए किया जाता है।
  • हाई रिस्क वाली महिलाओं में कैंसर के प्रसार को रोकने के लिए ऑपरेशन के जरिये स्तन हटा दिया जाता है (इसे प्रीवेंटिव मास्टेक्टोमी) कहा जाता है।

क्या है इसका इलाज

डॉ. सज्जन राजपुरोहित ने कहा कि जैसा हर कैंसर में होता है, स्तन कैंसर में भी इलाज इसी आधार पर तय होता है कि बीमारी का पता किस स्टेज पर चला है। इलाज में कीमोथेरेपी, रेडिएशन और सर्जरी होती है। जैसा कि शुरू में कहा गया है कि अगर आप हाई रिस्क फैक्टर में हैं, तो लक्षणों की जांच करते रहें। बीमारी का जल्दी पता चलने से सर्वाधिक रिकवरी की उम्मीद रहती है।

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