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बोन कैंसर अब लाइलाज नहीं

लेटेस्ट By ओन्लीमाईहैल्थ लेखक , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Feb 04, 2013
बोन कैंसर अब लाइलाज नहीं

बोन कैंसर अब लाइलाज नहीं, नवीनतम तकनीकें बचा सकती हैं अंगों को : बोन कैंसर अब लाइलाज नही है, विशेषज्ञों ने ऐसा तरीका खोज निकाला है जिसकी मदद से समय रहते बोन कैंसर का पता लगा कर उसका इलाज किया जा सकता है।

बोन कैंसर यानी हड्डियों का कैंसर को अभी तक लाइलाज माना जाता था। इसका इलाज होता भी था तो इसमें मरीज के अंग काटने की नौबत आ जाती थी। लेकिन, विशेषज्ञों ने एक ऐसा तरीका ईजाद करने का दावा किया है जिसकी मदद से समय रहते बोन कैंसर का पता लगा कर उसका इलाज किया जा सकता है।

 
bone caner ab lailaaz nahi naveentam tacnike baca sakti hai ango koइन आधुनिक तकनीकों की मदद से बोन कैंसर के कारण होने वाली मृत्यु दर घटाने में भी काफी मदद मिली है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अब बोन कैंसर अर्थात ऑस्टियोसरकोमा के 80 से 90 फीसदी मामलों में, जो सर्जरी की जाती है, उसमें अंगों को काटना नहीं पड़ता।

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पहले बोन कैंसर वाले अंग को काटना ही इलाज माना जाता था। ताजा तकनीकों की मदद से समय पर इस बीमारी का पता लगने पर इसके 60 से 70 फीसदी मरीजों को अंग काटे बिना बचाया जा सकता है। बोन ट्यूमर हड्डियों में ही पैदा होता है और विकसित होता है। और नई तकनीकें मरीजों के लिए किसी वरदान से कम नहीं।


बोन कैंसर वाले करीब 35 फीसदी बच्चों को इस बीमारी का कारण यह ट्यूमर होता है। ऐसे बच्चों को बड़े होने पर भी बोन कैंसर होने की आशंका बनी रहती है। कैंसर की रोकथाम और इससे निपटने के लिए रणनीतियां बनाने और प्रयासों को और पुख्ता बनाने के लिए संयुक्त राष्ट्र, विश्व स्वास्थ्य संगठन, विभिन्न सरकारें और बड़े स्वास्थ्य संगठन हर साल चार फरवरी को विश्व कैंसर दिवस मनाते हैं।

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विश्व कैंसर दिवस की शुरुआत यूनियन फॉर इंटरनेशनल कैंसर कंट्रोल (यूआईसीसी) ने वर्ष 1933 में जिनीवा में की थी। इस साल विश्व कैंसर दिवस की थीम 'कैंसर क्या आप जानते हैं' है, जो कैंसर के बारे में व्याप्त भ्रांतियों और उन्हें दूर करने की जरूरत पर केंद्रित है।

डॉक्टर कपूर ने कहा है कि कई मरीजों को जब इस बीमारी का पता चलता है, तब तक यह बीमारी अंतिम अवस्था में पहुंच चुकी होती है और प्रभावित अंग को काटने के अलावा और कोई चारा नहीं रहता। यह बीमारी लाइलाज नहीं है, लेकिन आज भी हड्डियों से जुड़ी तकलीफ को लोग गंभीरता से नहीं लेते और शुरू में इस समस्या का पता ही नहीं चल पाता।

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नवीनतम तकनीकों में प्रोस्थेसिस का उपयोग प्रमुख है। इसकी मदद से उस हड्डी को ही हटा दिया जाता है, जहां कैंसर वाला टयूमर बनता है। डॉक्टर तिवारी के अनुसार, एक अन्य तकनीक है एक्स्ट्राकारपोरियल रेडियोथैरेपी एंड रीइम्प्लान्टेशन। इस तकनीक में टयूमर हटाने के बाद, उस हड्डी को निकाल कर रेडियोथैरेपी दी जाती है। इस दौरान मरीज एनेस्थीसिया के असर के कारण बेहोश रहता है। रेडियोथैरेपी के बाद हड्डी फिर से यथास्थान पर लगा दी जाती है।

 

 

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ओन्लीमाईहैल्थ लेखक
Source: ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभागFeb 04, 2013

इस जानकारी की सटीकता, समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर सम्भव प्रयास किया गया है हालांकि इसकी नैतिक जि़म्मेदारी ओन्लीमायहेल्थ डॉट कॉम की नहीं है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्देश्य आपको जानकारी मुहैया कराना मात्र है।

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