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पीरियड्स के दिनों क्‍यों होती है महिलाओं में प्रीमेनस्ट्रियल डिस्फोरिक डिसऑर्डर, जानें इसके कारण व लक्षण

महिला स्‍वास्थ्‍य By सम्‍पादकीय विभाग , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Feb 01, 2011
पीरियड्स के दिनों क्‍यों होती है महिलाओं में प्रीमेनस्ट्रियल डिस्फोरिक डिसऑर्डर, जानें इसके कारण व लक्षण

एक रिसर्च के अनुसार पीरियड्स से पहले के दिनों में स्त्रियों की मनोदशा कुछ ऐसी होती है कि वे आत्महत्या तक कर सकती हैं, आइए जानें कैसे।

 

एक रिसर्च के अनुसार पीरियड्स से पहले के दिनों में महिलाओं की मनोदशा कुछ ऐसी होती है कि वे आत्महत्या तक कर सकती हैं। हालांकि ऐसा बहुत कम होता है, लेकिन उलझन भरे ये दिन लगभग हर लडकी के लिए भारी होते हैं। उन खास दिनों से पहले बिना वजह डिप्रेशन और टेंशन महसूस होती है। मेडिकल भाषा में इसे प्री मेंस्ट्रुअल डिस्फोरिक डिसॉर्डर यानी पीएमडीडी कहा जाता है। इन दिनों में मूड स्विंग्स के अलावा दर्द, कुछ खास खाने-पीने की इच्छा आम होता है। साधारण भाषा में इस स्थिति को प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम या पीएमएस भी कहते हैं।

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रिसर्च की मानें तो इसका असर इमोशनल डिसॉर्डर के रूप में ज्यादा सामने आता है। प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम मेंस्ट्रुअल साइकिल या हार्मोंस में गडबडी के कारण नहीं, बल्कि हार्मोंस में बदलाव के कारण होता है। पीएमएस के दायरे में कई शारीरिक और भावनात्मक उतार-चढाव आते हैं जो मेंस्ट्रुअल साइकिल के लगभग 5 से 11 दिन पहले से दिखाई देना शुरू हो जाते हैं। पीरियड्स शुरू होने के साथ स्थिति धीरे-धीरे सुधरती है। पीएमएस ब्ल्यूज में अकसर स्त्रियों का सामान्य जीवन थम-सा जाता है। साइकिल के सेकंड हाफ में ये समस्याएं बढ जाती हैं। इस दौर में डिप्रेशन चरम पर होता है जिसमें आत्महत्या तक का खयाल आ सकता है।

इसके कारण

रिसर्च के बावजूद इसके सही कारणों का फिलहाल पता नहीं लगाया जा सका है। माना जाता है कि प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम का स्त्री के सामाजिक, सांस्कृतिक, जैविक और मनोवैज्ञानिक पक्षों से संबंध होता है। पीएमएस आम तौर पर उन स्त्रियों में पाया जाता है-

  • जिनकी उम्र 20 से 40 वर्ष के बीच हो
  • जिनके बच्चे हों
  • जिनके परिवार में अवसाद का इतिहास हो
  • लगभग 50-60 प्रतिशत स्त्रियों में सिवियर पीएमएस के अलावा मनोवैज्ञानिक समस्याएं भी दिखती हैं।

पीएमएस के लक्षण

पीएमएस के लक्षण शारीरिक और मानसिक दोनों ही हो सकते हैं। सिरदर्द, एडियों में दर्द, पैरों व हाथों में सूजन, पीठ में दर्द, पेट के निचले हिस्से में भारीपन व दर्द, स्तनों में ढीलापन, वजन बढना, एक्ने, नॉजिया, कॉन्सि्टपेशन, रोशनी और आवाज से चिढ और पीरियड्स के दौरान दर्द जैसी कुछ शारीरिक परेशानियां देखने को मिल सकती हैं। इसके अलावा बेचैनी, असमंजस, ध्यान लगाने में परेशानी, निर्णय लेने में कठिनाई, भूलने की समस्या, अवसाद, गुस्सा, खुद को नीचा देखने की प्रवृत्ति आदि भी पीएमएस के लक्षण हैं।

कैसे हो डाइग्नोसिस

हालांकि पीएमएस के लिए कोई लैब टेस्ट्स या फिजिकल इग्जामिनेशन नहीं हैं, लेकिन मरीज की हिस्ट्री, पेल्विक इग्जामिनेशन और कुछ केसों में मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से पता लगाया जा सकता है कि स्त्री इस बीमारी से ग्रस्त है या नहीं।

इलाज

  • व्यायाम और डाइट में हल्के-फुल्के बदलाव करने से पीएमएस के प्रभावों से छुटकारा मिलता है। इसके अलावा अपनी एक डेली डायरी मेंटेन करें जिसमें अपने लक्षणों का ब्यौरा दर्ज करें। इस डायरी को कम से कम तीन महीने मेंटेन करें ताकि डॉक्टर पीएमएस की सही तरह से डायग्नोसिस और इलाज कर सके।
  • न्यूट्रिशनल सप्लीमेंट्स का सेवन बढाएं।
  • नमक, चीनी, एल्कोहॉल और कैफीन का सेवन कम करें।
  • डॉक्टर की राय से एंटी-बायटिक्स, एंटी-डिप्रेसेंट्स व पेन किलर्स ले सकती हैं।

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