कोरोना काल में ऑटो-इम्यून रोगों के मरीजों को रखना चाहिए इन बातों का ध्यान! नहीं तो हो जाएंगे इन रोगों का शिकार

Updated at: Aug 18, 2020
कोरोना काल में ऑटो-इम्यून रोगों के मरीजों को रखना चाहिए इन बातों का ध्यान! नहीं तो हो जाएंगे इन रोगों का शिकार

ऑटो-इम्यून रोगों के मरीजों को इस कोरोना काल में अपना विशेष ध्यान रखना चाहिए ताकि वे फिट रह सकें। 

 

Jitendra Gupta
अन्य़ बीमारियांWritten by: Jitendra GuptaPublished at: Aug 18, 2020

जब से कोरोना महामारी ने वैश्विक रूप लिया है तब से इम्यूनिटी यानी की रोगप्रतिरोधक क्षमता नाम के शब्द लोगों के बीच एक आम शब्द में तब्दील हो गया है। आलम ये है कि बड़े से लेकर बच्चे तक सभी इस घातक वायरस से अपने आप को बचाने के लिए इम्यूनिटी को बढ़ाने में लगे हुए हैं। कोरोना से लड़ने में इम्यूनिटी का मजबूत होना बहुत जरूरी है क्योंकि अभी तक कोई कारगर वैक्सीन नहीं विकसित हो पाई है। क्या आप जानते हैं कि कोई व्यक्ति ऑटो-इम्यून बीमारियों से पीड़ित हो सकता है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अति सक्रिय हो जाती है और शरीर के अपने ऊतकों पर ही हमला करने लगती है। एक वैश्विक अनुमान के अनुसार, हल्के, मध्यम से लेकर गंभीर ऑटो-इम्यून बीमारियों से लगभग 700 अरब लोग पीड़ित हैं।

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ये बीमारियां ऑटो-इम्यून रोगों में आम

सोरायसिस, सोरियाटिक अर्थराइटिस, एंकिलोसिंग स्पॉन्डिलाइटिस, रुमेटीइड अर्थराइटिस सबसे आम ऑटो-इम्यून स्थितियों में शामिल हैं। अधिकांश रोगियों को इम्यूनिटी बढ़ाने वाले सप्लीमेंट दिए जाते हैं, जो संक्रमण से लड़ने की संभावना को बढ़ा सकते हैं। ऑटोइम्यून बीमारियों से पीड़ित बुजुर्ग मरीजों में COVID-19 का अधिक खतरा होता है। हालांकि, डॉक्टर दवा को बंद नहीं करने या बदलने की सलाह बिल्कुल नहीं देते हैं क्योंकि यह स्थिति को भड़काने के कारण उनकी मौजूदा स्थिति को और खराब कर सकता है।

क्या कहते हैं मेडिकल एक्सपर्ट 

ऑटो इम्यून डिजीज में कई प्रमुख मेडिकल एक्सपर्ट रोगियों को अपने चिकित्सक के साथ नियमित रूप से संपर्क में रहने की आवश्यकता पर जोर देते हैं। इस मुश्किल दौर में ऐसा करना आपकी जिंदगी को बिना प्रभावित किए आगे बढ़ाने का बिल्कुल सही तरीका है। मौजूदा वक्त में मरीज फोन कॉल या वीडियो कॉल के माध्यम से डॉक्टर परामर्श कर सकते हैं।

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डॉक्टर को दिखाना बहुत जरूरी, बरतें ये सावधानियां 

सोरायसिस और एंकिलोसिंग स्पॉन्डिलाइटिस जैसी इन ऑटो-इम्यून बीमारी में से कुछ के उपचार में इंजेक्शन के माध्यम से दवाएं लेनी होती है, जिसके लिए डॉक्टर के पास जाने की जरूरत होती है। इस तरह के मरीज लॉकडाउन के कारण दवा को खुद नहीं ले सकते हैं या लंबे समय तक इलाज में देरी भी नहीं कर सकते हैं। उन्हें डॉक्टर से मिलने से डरना नहीं चाहिए, क्योंकि अधिकांश मेडिकल सेट-अप उचित सावधानी बरत रहे हैं। मरीजों को मास्क, दस्ताने, फेस शील्ड पहननी चाहिए और उनके पास हैंड सैनिटाइजर होना भी बहुत जरूरी है। 

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कोरोना से डरें नहीं बल्कि इलाज कराना जरूरी

कोरोना के डर से अगर आप डॉक्टर को दिखाने नहीं जा रहे हैं तो ये आपके लिए घातक साबित हो सकता है। अगर आपको डॉक्टर को दिखाने की आवश्यकता है तो किसी भी व्यक्ति को आस-पास के अस्पतालों और क्लीनिकों में जाने के लिए सभी सुरक्षा उपायों के साथ सोशल डिस्टेंसिंग मानदंडों का पालन करना चाहिए। कोरोना के डर के कारण उपचार में देरी नहीं होनी चाहिए। उपचार बंद करने से मौजूदा स्थिति बिगड़ सकती है और इससे ऑटो-इम्यून बीमारियों से जुड़े अन्य जटिलताएं जैसे हृदय रोग, इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज और यूवाइटिस हो सकती हैं।

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रोगियों को हो सकती है मानसिक परेशानी

कोरोना के डर और इलाज में देरी से अतिरिक्त मानसिक स्थिति और चल रही स्थिति से जुड़े तनाव से सोरायसिस और एंकिलोसिंग स्पॉन्डिलाइटिस जैसी ऑटो-इम्यून स्थिति और ज्यादा भड़क सकती है। एक्सपर्ट कहते हैं कि  सोरायसिस के मरीजों को लॉकडाउन के कारण तनाव और अवसाद का अनुभव हो सकता है। यह स्थिति को और भड़काने का कारण बन सकता है और जीवन की समग्र गुणवत्ता को कम कर सकता है। एक्सपर्ट रोगियों को ये सलाह देते हैं कि वे इन कोशिशों के दौरान रोग प्रबंधन के प्रति सकारात्मक और समग्र दृष्टिकोण रखें।ऑटो इम्यून डिजीज के रोगियों को सलाह   

मरीजों को तनाव से दूर रहना चाहिए, शराब की खपत से बचना चाहिए, और ऐसी चीजों से बचना चाहिए जो लक्षणों को बढ़ाते हैं। इसके अलावा ऑनलाइन परामर्श मरीजों को उपचार जारी रखने और डॉक्टर की सलाह का पालन करने में मदद करेगा। अब, यहां तक कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी टेलीकॉन्सेलेशन को आधिकारिक और कानूनी भी बना दिया है।

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