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Autism Awareness Day 2019: न्यूरो-साइकोलॉजिकल रोग है ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर, जानें क्‍या है उपचार

अन्य़ बीमारियां By अतुल मोदी , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Apr 01, 2019
Autism Awareness Day 2019: न्यूरो-साइकोलॉजिकल रोग है ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर, जानें क्‍या है उपचार

ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर एक न्यूरो-साइकोलॉजिकल विकार है जो मस्तिष्क के सामान्य काम को बाधित करता है। कोई व्यक्ति खुद के साथ-साथ दूसरों को किस तरह लेता है और उनसे संवाद कैसे करता है, इस पर एएसडी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। ऑटिज्म का स्पेक्ट्रम व्या

वृद्धि से जुड़े सबसे आम विकार के बारे में जागरुकता बढ़ाने के लिए 2008 में संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएन) ने 2 अप्रैल को वर्ल्ड ऑटिज्म अवेयरनेस डे (World Autism Awareness Day) के रूप में मनाने का फैसला किया है। 2019 के लिए यूएन ने "असिस्टिव टेक्नोलॉजीज, एक्टिव पार्टिसिपेशन" थीम को अपनाया है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि ऑटिज्म डिसऑर्डर स्पेक्ट्रम (एएसडी) वाले लोगों को किफायती दरों पर सहायक तकनीकों तक पहुंच प्राप्त हो सके। ताकि वे अपने बुनियादी मानवाधिकारों का इस्तेमाल कर सकें और अपने समुदायों के जीवन में पूरी तरह से भाग ले सकें। 

सहायक प्रौद्योगिकियों का उपयोग अक्सर ऑटिज्म पीड़ित व्यक्तियों के लिए संचार में सहायता और उसे बढ़ाने के लिए किया जाता है, उनकी बोलने की क्षमता की परवाह किए बिना। हालांकि, उच्च लागत, उपलब्धता, कम जागरुकता और प्रशिक्षण के कारण सहायक प्रौद्योगिकियों का उपयोग एक चुनौती है। 

WorldAutismAwarenessDay 

ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी) क्या है? 

ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर एक न्यूरो-साइकोलॉजिकल विकार है जो मस्तिष्क के सामान्य काम को बाधित करता है। कोई व्यक्ति खुद के साथ-साथ दूसरों को किस तरह लेता है और उनसे संवाद कैसे करता है, इस पर एएसडी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। ऑटिज्म का स्पेक्ट्रम व्यापक है जैसे कि व्यवहार में परिवर्तन। इसके लक्षण सामाजिक व्यवहार के हल्के नुकसान से लेकर अधिक गंभीर कार्यात्मक हानि के हो सकते हैं। इसका कोई एक कारण नहीं है।

कुछ शुरुआती व्यवहार परिवर्तनों में शामिल हैं: 

  • समझने में समस्या कि उन्हें क्या 'कहा' गया है
  • नाटकीयता और नकल का खराब कौशल
  • सामाजिक चर्चा के दौरान समस्या
  • दोहराव वाला व्यवहार
  • उनके नाम पर कोई प्रतिक्रिया नहीं
  • लोगों के साथ सामाजिकता में दिलचस्पी न होना
  • आंखों के संपर्क या शारीरिक संपर्क से बचना
  • भावनाओं को समझने में मुश्किलों का सामना करना  
  • बनाने विश्वास करने वाले खेल में शामिल होना 

एएसडी वाले लोग अन्य लोगों से थोड़ा अलग होते हैं। वे गले लगाने (कडलिंग) का विरोध करते हैं और अपने स्वयं के स्थान में रहना पसंद करते हैं। वे अपने संदेश को अलग-अलग स्वरों में रोबोट जैसा व्यक्त करते हैं। वे अकेले रहना पसंद करते हैं, क्योंकि उनके लिए जो संदेश दिया गया है, उसे समझना थोड़ा मुश्किल होता है। इस वजह से यह अक्सर अवसाद और अलगाव का कारण बन सकता है।

चूंकि पहले तीन वर्षों में बच्चे के मस्तिष्क का 80 प्रतिशत विकास होता है, यह महत्वपूर्ण है कि ऑटिज़्म या एएसडी की पहचान जल्द से जल्द की जाए; नतीजों का प्रबंधन उन लोगों में ज्यादा बेहतर किया जा सकता है जिनमें समस्या को पहले डायग्नोज कर लिया जाता है। 

ऑटिज्म या एएसडी की स्क्रीनिंग 

ऑटिज्म व्यवहार के लक्षण अक्सर प्रारंभिक चरण में दिखाई देते हैं, लेकिन जागरुकता न होने से ज्यादातर , लक्षण उपेक्षित रहते हैं। 18 महीने से अधिक उम्र के बच्चों में एएसडी के लक्षण आसानी से देखे जा सकते हैं।

ऑटिज्म के लिए स्क्रीनिंग या मूल्यांकन के दो भाग हैं:

1: विकासात्मक माइलस्टोन और कार्यात्मक पहलुओं के संबंध बच्चे का नियमित मूल्यांकन जिसमें शामिल हैं - मोटर स्किल्स (जैसे बैठना, चलना आदि), बोलने का कौशल एवं भाषा तथा सामाजिक (परिवार, अजनबियों आदि से बातचीत), सुनने या दृष्टि में कमी आदि।

  • 6 महीने की उम्र से पहले सभी बच्चों की सुनने की क्षमता का परीक्षण करना चाहिए और बाल रोग विशेषज्ञों द्वारा न्यूनतम 9 महीने, 18 महीने और 24 महीने की उम्र में बच्चे की वृद्धि का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
  • नेत्र रोग विशेषज्ञ द्वारा 3 वर्ष की आयु में दृष्टि की जाँच की जानी चाहिए।

यदि इन क्षेत्रों में कोई समस्या है, तो आपका डॉक्टर जरूरत पड़ने पर फॉलोअप और आगे के प्रबंधन का सुझाव देगा।

2: ऑटिज्म या एएसडी का विशिष्ट प्रश्नावली-आधारित मूल्यांकन। ऑटिज्म को डायग्नोज करने के लिए कोई लैब टेस्ट या जांच नहीं है। इसकी पहचान परिवार, साथियों के प्रति उनके व्यवहार और उनकी संवाद शैली आदि के विस्तृत मूल्यांकन के आधार पर किया जाता है। कई प्रश्नावली उपलब्ध हैं, जिसमें आप अपने बच्चे के बारे में जवाब देते हैं तो उनके बारे में प्रारंभिक स्कोर दे सकती हैं। 

सबसे स्वीकृत एम-चैट प्रश्नावली है, जिसका सामाना हर माता-पिता को तब करनी चाहिए जब उनका बच्चा 18 महीने का हो जाए। इसे 2 साल की उम्र में दोहराना चाहिए। यदि स्कोर अधिक है, तो जितनी जल्दी हो सके एक डेवलपमेंट पीडियाट्रिशियन से संपर्क करना न भूलें।

बिना घबराए विशेषज्ञों की मदद लेना महत्वपूर्ण है क्योंकि ऑटिज्म के हल्के रूपों को शुरुआती व्यवहार थैरेपी के साथ अच्छी तरह से मैनेज किया जा सकता है। 

भारत में सामाजिक प्रभाव 

भारत में एएसडी से पीड़ित लगभग 30 लाख लोग हैं। संख्याओं के अनुसार हर 100 बच्चों में से 1 में ऑटिज्म पाया जाता है। विश्व स्तर पर यह 160 बच्चों में एक है। हालांकि, पश्चिमी देशों की तुलना में भारतीयों में एएसडी के बारे में जागरुकता काफी कम है।

भारत में विकलांग लोग बहिष्कृत हैं। सामाजिक तौर पर इसे कलंक ही माना जाता है जिससे बच्चे और माता-पिता दोनों के लिए इससे जूझना चुनौतीपूर्ण बन जाता है। 

एएसडी वाले बच्चों में अलग-अलग व्यवहार पैटर्न होते हैं। उन्हें विशेष देखभाल और प्यार की आवश्यकता होती है। चूंकि इसका इलाज आसान नहीं है, इसलिए माता-पिता को धैर्य रखने की आवश्यकता है। लेकिन ऑटिज्म वाले लोग कई मामलों में वयस्क होकर स्वतंत्र जीवन जीने और अपनी पारिवारिक भूमिका को पूरा करने में सक्षम होते हैं।

ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर का उपचार 

एएसडी के लिए कोई निदानात्मक उपचार नहीं है, सभी उपचार या मैनेजमेंट निम्नलिखित क्षेत्रों में सुधार करने के लिए किया गया है:

  • बच्चे के सामाजिक कामकाज और खेलने के कौशल में सुधार  
  • उसके संचार कौशल में सुधार  
  • अनुकूली कौशल में सुधार
  • नकारात्मक व्यवहार में कमी लाना 
  • अकादमिक कामकाज और अनुभूति को बढ़ावा देना

ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर का उपचार व्यक्ति की स्थिति और विभिन्न आवश्यकताओं पर निर्भर करता है। वे बोलने और व्यवहार को बेहतर के लिए चिकित्सा के पूरी तरह से विभिन्न स्वरूपों को अपना सकते हैं, और ऑटिज़्म से जुड़ी किसी भी प्रकार की चिकित्सा स्थितियों का मैनेजमेंट करने के लिए दवाएं भी अलग-अलग होती हैं।

उपचार एक विशेषज्ञ के अधीन होना चाहिए जैसे कि डेवलपमेंट पीडियाट्रिशियन, न्यूरोलॉजिस्ट या मनोवैज्ञानिक या कोई अन्य विशेषज्ञ, जो टीम में आवश्यक हो। उपचार अपने दम पर करने का प्रयास न करें, क्योंकि विशेषज्ञ उपचार के तहत एएसडी में जल्दी लाभ साबित हुआ है। 

व्यवहार उपचार में शामिल हैं: 

एप्लाइड बिहेवियरल एनालिसिस:

यह उपचार आपके बच्चे को सकारात्मक और नकारात्मक व्यवहार के बीच अंतर सिखाता है। नकारात्मक व्यवहार को कम करने पर ध्यान केंद्रित होता है।

डेवलपमेंटल, व्यक्तिगत अंतर, संबंध-आधारित दृष्टिकोण (डीआईआर):

इस तरह के उपचार को फ़्लोर टाइम कहा जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें आपको अपने बच्चे के साथ खेलने और उसकी पसंद की गतिविधियों को करने के लिए जमीन पर बैठना पड़ता है।

यह आपके बच्चे की भावनात्मक और बौद्धिक क्षमता में वृद्धि का समर्थन करता है, जिससे उन्हें यह सीखने में मदद मिलती है कि भावनाओं को कैसे व्यक्त किया जाए।

पिक्चर एक्सचेंज कम्युनिकेशन सिस्टम:

यह उपचार विभिन्न वस्तुओं के माध्यम से प्रश्न पूछने और संवाद के दौरान आपके बच्चे की सहायता करने के लिए पिक्चर कार्ड के बजाय प्रतीकों का उपयोग करता है। जानकारी को सहजता से प्रदान किया जाता है ताकि वे ज्यादा से ज्यादा सीख सके। 

ऑक्यूपेशनल थेरेपी:

इस तरह के उपचार से आपके बच्चे को जीवन कौशल सीखने में मदद मिलती है जैसे कि खुद खाना खाना और खुद कपड़े पहनना, नहाना और दूसरों से जुड़ने का तरीका समझना। वे जो क्षमता सीखते हैं, वह उन्हें स्वतंत्र रूप से जीने में सहायता करने के लिए होती है।

सेंसरी इंटिग्रेशन थेरेपी:

यदि आपका बच्चा उज्ज्वल प्रकाश, बाध्य ध्वनि या स्पर्श होने की सनसनी से आसानी से परेशान हो जाता है, तो यह उपचार इस तरह की सेंसेशन से निपटने में सुविधा प्रदान करेगा।

एएसडी को पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता है, लेकिन अच्छा उपचार और देखभाल वास्तव में जीवन स्तर में सुधार करने में मदद कर सकती है। 

यह लेख डॉकप्राइम डॉट कॉम की सीनियर कंसल्‍टेंट डॉक्‍टर बिनिता प्रियम्बदा से हुई बातचीत पर आधारित है। 

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