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अमेरिका और यूरोप की तर्ज पर भारतीय मरीजों के लिये बने 'कृत्रिम घुटने'

लेटेस्ट By एजेंसी , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Dec 07, 2013
अमेरिका और यूरोप की तर्ज पर भारतीय मरीजों के लिये बने 'कृत्रिम घुटने'

हाल ही में भारतीय मरीजों के लिए भी अमरीका और यूरोप की तर्ज पर कृतिम घुटनों का निर्माण किया गया है। खबर को पढ़ें और जानें।

भारतीयों में तेजी से बढ़ती घुटनों की समस्या के कारण अमेरिका और यूरोप के मरीजों की तर्ज पर अब भारतीय मरीजों के लिए भी कृतिम घुटनों का निर्माण किया गया है।

Artificial Knee For Indian Patients

अब घुटनों की समस्या से जूझ रहे भारतीयों को अमेरिका और यूरोप के मरीजों के हिसाब से बनाये गये कृत्रिम घुटनों से काम नहीं चलाना पड़ेगा। क्योंकि अब भारतीय मरीजों के लिये उनके घुटनों की बनावट के हिसाब से विशेष कृत्रिम घुटनों को विकासित कर लिया गया है।

 

भारतीय तथा शियाई लोगों के घुटने की बनावट तथा जीवन शैली को ध्यान में रखकर विकसित किये गये "एशियन नी" नामक यह कृत्रिम घुटने भारत में उपलब्ध हो चुके हैं। इस बारे में अपोलो अस्पताल के आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. राजू वैश्य कहते हैं कि "भारत के मरीजों (खास तौर पर आर्थराइटिस से ग्रस्त महिलाएं) के जोड़ पश्चिमी देशों के लोगों के घुटनों की तुलना में थोड़े छोटे होते हैं। वहीं भारत में उठने-बैठने की जो जीवनशैली है उसमें घुटने को अधिक से अधिक मोड़ने की जरुरत पड़ती है। ये नये कृत्रिक घुटने भारत के मरीजों की इन्हीं खास जरुरतों को पूरा करते है।"

 

 

साथ ही डॉ. वैश्य ने कहा कि हमारे देश में लोग भोजन करने से लेकर पूजा-पाठ करने तक ज्यादातर कामों के लिये घुटनों को पूरी तरह मोड़कर या पालथी मारकर बैठते हैं। और लगातार इस तरह से बैठने के कारण आर्थराइटिस जैसी घुटने की समस्यायें ज्यादा होती हैं। यही नहीं बैठने की इस शैली के कारण घुटनों की संरचना में भी आब बदलाव आ गया है। ऐसे में भारतीय मरीजों के लिये खास तौर पर बनाये गये ये "एशियन नी" से आर्थेपेडिक सर्जनों को काफी मदद मिलेगी और ये भारतीय मरीजों के लिये काफी मददगार साबित होंगे।

 

 

इस संदर्भ में आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. शिशिर कुमार बताते हैं कि भारतीय और एशियाई लोगों को विशेष प्रकार के घुटनों की जरूरत इसलिए होती है, क्योंकि इनके घुटने अमेरिकी एवं यूरोपीय लोगों के घुटने से अलग होते हैं। और जब अमेरिकी और यूरोपीय मरीजों के लिए बनाये गये इन परम्परागत घुटनों को भारतीय एवं एशियाई मरीजों को लगाया जाता है तो ये घुटने ठीक प्रकार से फिट नहीं बैठते। जिस कारण आपरेशन के बाद घुटने में दर्द, सूजन व ऐसी ही कुछ अन्य समस्यायें रहती हैं।

 

 

साथ ही इन नये कृत्रिम घुटने को प्रत्यारोपित करने के लिये घुटने की हड्डी को काटने या छीलने की जरुरत भी नहीं होती है। इनके प्रयोग से घुटने का बचाव होता है और घुटनों को लचीलापन भी मिलता है, और घुटने को पूरी तरह से मोड़ने में कोई परेशानी नहीं होती है। डाक्टरों के अनुसार मौजूदा समय में मोटापे एवं खराब जीवनशैली के चलते जिस तेजी से घुटने में आर्थराइटिस बढ़ रहा है, घुटने बदलने के आपरेशन भी बढ़ रहे हैं। मोटापे की बढ़ती समस्या के कारण न केवल अधिक उम्र के लोगों में बल्कि युवकों में भी घुटने एवं जोड़ो के आर्थराइटिस की समस्या बढ़ती जा रही है। जिस कारण 65 साल से कम उम्र के लोगों को भी घुटने एवं अन्य जोड़ों को बदलवाने के आपरेशन कराने पड़ रहे हैं।  

 

गौरतलब हो कि वर्तमान में पहले की तुलना में अधिक संख्या में युवा लोग घुटने एवं अन्य जोड़ बदलवाने के ऑपरेशन करा रहे हैं। शल्य चिकित्सा तकनीकों में सुधार और बेहतर इम्प्लांटो के विकास होने से आज घुटने बदलने के आपरेशन प हले की तुलना में ज्यादा कारगर और सुरक्षित हो गए हैं।

 

 

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