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जानिए क्या है सुपर वूमेन सिंड्रोम और इससे निपटने के कुछ प्रभावी कदम

महिला स्‍वास्थ्‍य By मिताली जैन , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Dec 24, 2018
जानिए क्या है सुपर वूमेन सिंड्रोम और इससे निपटने के कुछ प्रभावी कदम

पिछले कुछ समय में कामकाजी महिलाओं में एक खास तरह की बीमारी देखने को मिल रही है, जिसका नाम है सुपर वुमन सिंड्रोम।

पिछले कुछ समय में कामकाजी महिलाओं में एक खास तरह की बीमारी देखने को मिल रही है, जिसका नाम है सुपर वुमन सिंड्रोम। यह एक ऐसा मानसिक अवसाद है, जिसमें महिला न सिर्फ खुद को हर मोर्चे पर परफेक्ट देखना चाहती है और ऐसा न कर पाने के कारण वह आत्मग्लानि से भर जाती है। लोग इस सुपर वुमन सिंड्रोम को बहुत अधिक सीरियसली नहीं लेते लेकिन यह कभी-कभी बहुत अधिक नुकसानदायक हो सकता है। तो चलिए जानते हैं इसके बारे में और इससे निपटने के कुछ प्रभावी कदमों के बारे में-

यह है सुपर वुमन सिंड्रोम

सुपर वुमन सिंड्रोम एक ऐसा सिंड्रोम है, जिसमें महिला घर परिवार व बाहर की जिम्मेदारियों को पूरा करने की जद्दोजहद में कुछ इस कदर व्यस्त हो जाती है कि उसके पास खुद को देने के लिए समय व उर्जा होती ही नहीं है। इतना ही नहीं, अगर महिलाएं किसी भी क्षेत्र में अपने लक्ष्यों को पूरा नहीं कर पाती, तो वह खुद को ही दोष देने लगती है। इतना ही नहीं, यह स्थिति कभी-कभी इतनी घातक हो जाती है कि महिला अवसाद में चली जाती है। 

सेरोटोनिन हो सकता है कारण

मैक्स हेल्थकेयर के मेंटल हेल्थ एंड बिहेवियर साइंस के डायरेक्टर डाॅ. समीर मल्होत्रा कहते हैं कि इस सिंड्रोम के लिए सेरोटोनिन की कमी भी एक मुख्य कारण बन सकती है। दरअसल, सेरोटोनिन एक बेहद महत्वपूर्ण ब्रेन केमिकल है, जो व्यक्ति की उदासी को दूर करके व मूड को अच्छा बनाकर उसे तनावग्रस्त होने से बचाता है। मस्तिष्क में सेरोटोनिन के स्तर को बढ़ाने के लिए दवाईयों का सहारा लिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त मसाज थेरेपी व धूप में बैठने भी सेरोटोनिन हार्मोन में वृद्धि होती है।

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आत्म-अनुशासन है जरूरी

डाॅ. समीर मल्होत्रा कहते हैं कि इस सिंड्रोम से बचने के लिए आत्म-अनुशासन मील का पत्थर साबित हो सकता है। जिस तरह महिला अपने घर-परिवार व आॅफिस के कार्यों के लिए समय निकालती है, ठीक उसी तरह खुद को नियमित रूप से समय देना शुरू करें। इस दौरान उन सब कामों को करें, जो आपको भीतर से खुशी देता हो। 

प्राथमिकताओं को करें सुनिश्चित

आज की भागदौड़ भरी जिन्दगी में हर व्यक्ति के जीवन में बहुत आपाधापी है। ऐसे में सुपर वुमन सिंड्रोम से बचने से निपटने के लिए प्राथमिकताओं को सुनिश्चित करना बेहद आवश्यक है। एक वक्त में हर काम कर पाना या हर फील्ड में परफेक्ट हो पाना किसी के लिए भी संभव नहीं है। इसलिए जिस वक्त पर जो चीज ज्यादा जरूरी है, उसे ही प्राथमिकता दें। उदाहरण के तौर पर, अगर आप अभी-अभी मां बनी हैं, तो यह समय पूरी तरह अपने बच्चे व मातृत्व को समर्पित करें। इस दौरान आॅफिस वर्क व उसकी टेंशन को खुद से दूर ही रखें।

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दिनचर्या में बदलाव

एक हेल्दी दिनचर्या स्वस्थ व अवसादमुक्त जीवन की ओर पहला कदम हो सकती है। इसके लिए अपनी दिनचर्या में कुछ आवश्यक बदलाव करें। मसलन, डेली लाइफ में व्यायाम को जगह दें। इससे मस्तिष्क में हैप्पी हार्मोन रिलीज होते हैं और आप खुद को अधिक उर्जावान व खुश महसूस करती है। इसके अतिरिक्त हेल्दी डाइट लें। सोने का समय सुनिश्चित करें। इस तरह के कुछ बदलाव न सिर्फ सुपर वुमन सिंड्रोम बल्कि कई तरह की मानसिक व शारीरिक बीमारियों से महिला का बचाव करते हैं।

उम्मीदों को करें सीमित

यह बेहद दुखद है कि भारतीय समाज में सिर्फ अन्य लोग ही नहीं, बल्कि महिला खुद भी स्वयं से कुछ ज्यादा ही उम्मीदें रखती हैं और उसके पूरा न होने पर सुपर वुमन सिंड्रोम जैसी मानसिक बीमारी से पीड़ित हो जाती है। इसलिए खुद को समझाएं कि एक आम इंसान होने के नाते आपकी अपनी भी कुछ सीमाएं हैं। आवश्यकता से अधिक कार्य तनाव का कारण बनता है और उन कार्यों का सफलतापूर्वक संपन्न न हो पाना अवसाद की स्थिति पैदा करता है। इसलिए अपने हिस्से उतना ही काम लें, जितना आपके लिए संभव हो और अगर आपका वर्कलोड अधिक हो तो मदद मांगने से बिल्कुल भी न हिचकिचाएं, फिर चाहे बात आॅफिस की हो या घर की। साथ ही ना कहना भी सीखें। अगर आपने यह गुण सीख लिया तो बहुत सी समस्याओं व बीमारियों से बेहद आसानी से बच जाएंगी।

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