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बढ़ती उम्र से जुड़ी न्‍यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है अल्‍जाइमर रोग, जानें क्‍यों है पार्किंसंस और डिमेंशिया से अलग

अन्य़ बीमारियां By अतुल मोदी , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Feb 22, 2019
बढ़ती उम्र से जुड़ी न्‍यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है अल्‍जाइमर रोग, जानें क्‍यों है पार्किंसंस और डिमेंशिया से अलग

अगर सरल शब्दों में कहा जाए तो यह बढ़ती उम्र से जुड़ी एक ऐसी न्यूरोलॉजिकल समस्या है, जो बहुत धीरे-धीरे इंसान को अपनी गिरफ्त में लेती है। मानव मस्तिष्क का वह हिस्सा जो हमारी यादों को संजोने का काम करता है, उम्र बढऩ

आपने कुछ ऐसे लोगों को ज़रूर देखा होगा, जो अकसर छोटी-छोटी बातें भूल जाते हैं और आसपास के लोग उनकी ऐसी आदतों का मज़ाक भी उड़ाते हैं, पर हमेशा इसे हंसकर टाला नहीं जा सकता। खासतौर पर 60 से अधिक उम्र वाले बुज़ुर्ग जब ज्य़ादा भूलने लगें तो स्थिति चिंताजनक है क्योंकि यह अल्ज़ाइमर्स का भी लक्षण हो सकता है। अगर सरल शब्दों में कहा जाए तो यह बढ़ती उम्र से जुड़ी एक ऐसी न्यूरोलॉजिकल समस्या है, जो बहुत धीरे-धीरे इंसान को अपनी गिरफ्त में लेती है। मानव मस्तिष्क का वह हिस्सा जो हमारी यादों को संजोने का काम करता है, उम्र बढऩे के साथ उसकी सेल्स सिकुडऩे लगती हैं, जिसका सीधा असर व्यक्ति की स्मरण-शक्ति पर पड़ता है। 

 

अल्ज़ाइमर्स होने पर ब्रेन के पेरीटल लोब के न्यूरॉन्स तेज़ी से नष्ट होने लगते हैं। ब्रेन का यह हिस्सा चीज़ों को देखकर समझने और उसके अनुरूप शरीर के सभी अंगों को कार्य करने का निर्देश देता है। जब इसके न्यूरॉन्स नष्ट होने लगते हैं तो व्यक्ति के हर कार्य और व्यवहार की गति धीमी हो जाती है क्योंकि उसका मस्तिष्क किसी भी निर्देश को सुनते ही तत्काल उसके अनुरूप प्रतिक्रिया देने में सक्षम नहीं होता। इसकी प्रमुख वजह यह है कि हमारे शरीर में एमिलॉयड नामक खास तरह का प्रोटीन पाया जाता है, जो कोशिकाओं के किनारे पर स्थित होता है और उन्हें आपस में जोडऩे का काम करता है। 

उम्र बढऩे के साथ कई बार ब्रेन में इसकी मात्रा बढ़ जाती है, जिससे उसके काम करने की गति धीमी हो जाती है और व्यक्ति के लिए बातें याद रखना मुश्किल हो जाता है। आमतौर पर 60 वर्ष की आयु के बाद लोगों में इसके लक्षण नज़र आते हैं, पर यह ज़रूरी नहीं है कि हर बुज़ुर्ग व्यक्ति को ऐसी समस्या हो। फिर भी उम्र बढऩे के बाद इसकी आशंका बढ़ जाती है। जीवनशैली की बढ़ती व्यस्तता और खानपान की आदतों में लापरवाही की वजह से कई बार मिडिलएज लोगों में भी अल्ज़ाइमर्स के लक्षण दिखाई देते हैं।

पार्किंसंस, डिमेंशिया और अल्ज़ाइमर में है फर्क 

अक्‍सर लोग पार्किंसंस, डिमेंशिया और अल्ज़ाइमर को एक ही बीमारी समझने की भूल कर बैठते हैं, पर वास्तव में ऐसा नहीं है। ये तीनों मस्तिष्क से जुड़ी अलग-अलग समस्याएं हैं। इनमें केवल यही समानता है कि ये तीनों बढ़ती उम्र की न्यूरोलॉजिकल डिज़ीज़ हैं। दरअसल पार्किंसंस में मांसपेशियों पर मस्तिष्क का नियंत्रण खत्‍म हो जाता है। इससे पीडि़त व्यक्ति के हाथ-पैरों या पूरे शरीर में कंपन की समस्या होती है। इसकी वजह से कई बार आवाज़ भी लड़खड़ाने लगती है। डिमेंशिया भी अल्ज़ाइमर्स की ही तरह याद्दाश्त से जुड़ी समस्या है, पर इसके लक्षण युवाओं या मिडिल एज के लोगों में भी नज़र आ सकते हैं। अगर सही समय पर उपचार शुरू न किया जाए तो कुछ वर्षों के बाद डिमेंशिया से पीडि़त लोगों को भी अल्ज़ाइमर्स हो सकता है। अत: डिमेंशिया को इस बीमारी का शुरुआती रूप भी कहा जा सकता है।

अल्‍जाइमर प्रमुख लक्षण

  • लोगों के नाम और चेहरे भूलना
  • अपनी ज़रूरी चीज़ों को इधर-उधर रखकर भूल जाना
  • घर से बाहर निकलने पर अपने परिचित रास्तों को भी पहचान न पाना
  • रोज़मर्रा के कार्यों के प्रति उदासीनता
  • सामाजिक जीवन से दूर रहने की कोशिश
  • तर्क करने की क्षमता कम होना
  • शॉर्ट टर्म मेमोरी लॉस यानी वर्तमान से जुड़ी छोटी-छोटी बातें बहुत जल्दी भूल जाना। मसलन फ्रिज का दरवाज़ा खोलने के बाद यह भूल जाना कि मुझे उससे क्या निकालना है?
  • आमतौर पर अल्ज़ाइमर्स के मरीज़ों को पुरानी बातें मसलन, स्कूल के दोस्तों के नाम और बचपन से जुड़े दिलचस्प अनुभव अच्छी तरह याद रहते हैं, पर ये वर्तमान से जुड़ी ज़रूरी सूचनाएं याद नहीं रख पाते।
  • ज्य़ादा गंभीर स्थिति में ऐसे मरीज़ अपने परिवार के सदस्यों को भी पहचानने में असमर्थ होते हैं।

कब होती है आशंका

वैसे तो बढ़ती उम्र अल्ज़ाइमर्स की सबसे प्रमुख वजह है ही, इसके अलावा भी कई ऐसी बातें हैं, जो इस समस्या को जन्म देती हैं। जीन्स की संरचना में होने वाली गड़बड़ी और आनुवंशिकता की वजह से भी ऐसी समस्या हो सकती है। इसी वजह से कई बार युवाओं में भी इसके लक्षण दिखाई देने लगते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययनों में यह पाया गया है कि पुरुषों की तुलना में स्त्रियों में इसकी आशंका अधिक होती है क्योंकि मेनोपॉज़ के बाद उनके शरीर में एस्ट्रोजेन हॉर्मोन की कमी हो जाती है। दरअसल यह हॉर्मोन स्त्रियों को युवा और सक्रिय बनाए रखने का काम करता है। इसकी कमी से भी उनमें अल्ज़ाइमर्स की आशंका बढ़ जाती है, पर यह ज़रूरी नहीं है कि मेनोपॉज़ के बाद सभी स्त्रियों को ऐसी समस्या हो। इसके अलावा हाइ ब्लडप्रेशर, थायरॉयड, डायबिटीज़ और हृदय रोग होने पर भी व्यक्ति की स्मरण शक्ति कमज़ोर हो जाती है। सिर में लगी गंभीर चोट या किसी दवा के साइड इफेक्ट से भी यह समस्या हो सकती है।

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बचाव एवं उपचार

  • स्वस्थ खानपान और सही जीवनशैली अपनाना बहुत ज़रूरी है क्योंकि डायबिटीज़, हाइ कोलेस्ट्रॉल, ब्लडप्रेशर और ओबेसिटी जैसी समस्याएं भी कई बार अल्ज़ाइमर्स का सबब बन जाती हैं।
  • ब्रेन के विभिन्न हिस्सों में ब्लड की सप्लाई कम होने से भी यह समस्या हो सकती है। नियमित योगाभ्यास और ध्यान भी इससे बचाव में मददगार हो सकता है।
  • इस समस्या से बचने के लिए दिमा$ग को एक्टिव रखना बहुत ज़रूरी है। हमेशा अपनी रुचि से जुड़े कार्यों में व्यस्त रहें। जहां तक संभव हो, अकेलेपन से बचने की कोशिश करें। आसपास के लोगों से मेलजोल बढ़ाएं।
  • सुडोकू और शतरंज जैसे गेम्स से भी दिमाग की अच्छी एक्सरसाइज़ होती है। ऐसी एक्टिविटीज़ को अपनी दिनचर्या में नियमित रूप से शामिल करें।
  • कभी-कभी कुछ बातें भूलना स्वाभाविक है, पर जब इस आदत की वजह से रोज़मर्रा की दिनचर्या प्रभावित होने लगे या इस बीमारी की फेमिली हिस्ट्री रही हो तो बिना देर किए किसी न्यूरोलॉजिस्ट से सलाह लें। ब्रेन के एमआरआइ या सीटी स्कैन के ज़रिये इस बीमारी का आसानी से पता लगाया जा सकता है। सेरिब्रो स्पाइनल फ्लूइड की जांच से भी ब्रेन की अवस्था का पता लगाया जाता है। अल्ज़ाइमर्स होने की स्थिति में दवाओं की मदद से ब्रेन के केमिकल्स को संतुलित रखा जाता है। इस समस्या को पूरी तरह दूर नहीं किया जा सकता, लेकिन इसके लक्षणों को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है।

खानपान की अहमियत

जब भी हम कोई बात भूल जाते हैं तो हमारे दोस्त हंसते हुए कहते हैं, बादाम खाया करो और इस सलाह को हम मज़ाक समझकर टाल देते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि बादाम और अख्खरोट का नियमित सेवन हमारी याद्दाश्त बढ़ाने में मददगार साबित होता है। इसके अलावा मछली में मौज़ूद ओमेगा-3 फैटी एसिड भी ब्रेन की सेहत के लिए बहुत $फायदेमंद होता है। अपने भोजन में हरी पत्तेदार सब्जि़यों को भी प्रमुख्खता से शामिल करें। खाने में ज्य़ादा घी-तेल का इस्तेमाल न करें। एल्कोहॉल और स्मोकिंग से दूर रहें क्योंकि इससे हृदय रोग और डायबिटीज़ की आशंका बढ़ जाती है, जिससे बाद में अल्ज़ाइमर्स भी हो सकता है। इसलिए हमेशा पौष्टिïक और संतुलित आहार अपनाएं।

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