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विदेश पढ़ने जा रहे हैं बच्चे, तो पेरेंट्स ऐसे स्वीकारें नए बदलावों को

परवरिश के तरीके By Rashmi Upadhyay , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग / Sep 17, 2018
विदेश पढ़ने जा रहे हैं बच्चे, तो पेरेंट्स ऐसे स्वीकारें नए बदलावों को

जब बच्चे छोटे होते हैं तो हर माता पिता चाहते हैं कि जल्द से जल्द उनके बच्चे बड़े हो जाएं। 

जब बच्चे छोटे होते हैं तो हर माता पिता चाहते हैं कि जल्द से जल्द उनके बच्चे बड़े हो जाएं। वहीं जब बच्चे 12वीं कर लेते हैं तो पेरेंट्स की चाहत होती है कि बच्चा जल्द से जल्द कॉलेज में दाखिला लें और आत्मनिर्भर हो जाए। लेकिन कभी कभी बच्चों का बर्ताव पेरेंट्स का निराश कर सकता है। जब बच्चे अपनी लाइफ में बिजी हो जाते हैं तो कभी कभी ये चीज पेरेंट्स को असुरक्षित कर देती है। यह चीजें अक्सर तब होती हैं जब बच्चा विदेश पढ़ने जाता है। बच्चे के बिना खाली घर अभिभावक को इतना ज्यादा परेशान करता है, जितना बच्चे की शैतानियां भी नहीं करती थीं। लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि परिवर्तन संसार का नियम है, इसलिए बेहतर यही है कि आप अपने जीवन में आये इस नये बदलाव को स्वीकारें और सहज रहने की कोशिश करें। 

बदलावों को स्वीकारें

जब बच्चा कुछ समय घर से बाहर रहता है तो उसके बर्ताव में बदलाव आना लाजमी है। इसलिए उनके ऐसे व्यवहार पर ओवर रिएक्ट करने के बजाय उन्हें प्यार से समझाएं। कई बार बच्चे गुस्से में तोडफ़ोड़ या मारपीट जैसे हिंसक व्यवहार करने लगते हैं। अगर कभी आपका बच्चा आपकी बात को नजरअंदाज करता है तो बिल्कुल भी परेशान हों। ऐसे समय में घबराने के बजाए या असुरक्षित महसूस करने के बजाए संयम से काम लें। जब बच्चा आत्मनिर्भर होता है या बाहर जाता है तो बहुत से लोगों के साथ उसका संपर्क होता है। ऐसी स्थिति में उससे बहस करने या डांटने के बजाए इस बात को मानें कि अब वह व्यस्त हो रहा है और उसकी पसंद-नापसंद का अधिकार उसके पास है। 

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नजरिया बदलना भी है जरूरी

चीजों को सही या गलत कहने से पहले यह जरूरी है कि आप सही नजरिया अपनाएं। कई बार आपके नजरिया की वजह से भी चीजें सही या गलत होती है। अगर आपको लगता है कि आपका बच्चा अब पहले जितनी आपकी बात नहीं मान रहा है या आपको प्राथमिकता देना कम कर रहा है तो बच्चे पर हावी होने के बजाय खुद व्यस्त रहना सीखें। आप चाहें तो कोई हॉबी क्लास ज्वाइन कर सकती हैं। अगर सालों से अपने दोस्तों से नहीं मिलीं हैं, तो उससे मिलने का समय निकालें। कहने का मतलब यह है बच्चे पर बिना बात का दबाव बनाने और अकेलापन महसूस करने से अच्छा है कि एक बार फिर से अपनी जिंदगी को जिंदादिली के साथ जीएं। अगर आप ऐसा करेंगी तो यकीन मानिये आपके बच्चे को भी इससे बहुत खुशी मिलेगी और जिंदगीभर आप उसके लिए एक आदर्श और मिसाल बनकर रहेंगी कि जिंदादिली के साथ कैसे जिया जाता है। 

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बच्चों को अच्छी बातें बताएं

केवल परिवार के साथ ही नहीं बल्कि आसपास के उन सभी लोगों के प्रति विनम्र व्यवहार अपनाना चाहिए, जो किसी न किसी भी रूप में हमारे मददगार होते हैं। मसलन घरेलू सहायक, ड्राइवर, सफाई कर्मचारी और सिक्युरिटी गार्ड आदि। बच्चे को समझाएं कि ये सभी लोग हमारी मदद करते हैं, इसलिए हमें इनके साथ प्यार से पेश आना चाहिए। उसमें ऐसी आदत विकसित करें कि वह ऐसे लोगों के लिए अंकल-आंटी या भैया-दीदी जैसे सम्मान सूचक संबोधनों का प्रयोग करे। अगर आप रोज़मर्रा के सामान खरीदने बाज़ार जाती हैं तो अपने बच्चे को भी अपने साथ लेकर जाएं। उसे सिखाएं कि अगर रास्ते में कोई परिचित अंकल-आंटी मिलें तो उन्हें नमस्ते ज़रूर करना चाहिए। इससे उसे सामाजिक व्यवहार सीखने में मदद मिलेगी। बच्चा चाहे कहीं भी रहे ये चीजें हमेशा उसके काम आएंगी। फिर चाहे वह विदेश ही क्यों न चले जाए।

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